गुरुद्वारा में लंगर के लिए सरकारी अनुदान पर दिल्ली के सिख समाज में विवाद


जंतर-मंतर पर देश भर से आते प्रदर्शनकारियों के लिए बिना -किसी
भेदभाव के हम हजारों लोगों के लिए लंगर भेजते रहे,पर कभी सरकारी मदद नहीं मांगी।



दिल्ली सिख गुरुद्वारा कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा के द्वारा गुरद्वारों में लंगर छकने के लिए आ रहीं बेरोजगार संगत को दिल्ली सरकार द्वारा अनुदान देने की दी गई सलाह पर विवाद हो गया है। कमेटी के पूर्व अध्यक्ष मनजीत सिंह जीके ने सिरसा को लंगर की पवित्र मर्यादा से न खेलने की नसीहत दी है। दरअसल सिरसा ने अपने वीडियो संदेश के जरिए बुधवार को किए टविट के माध्यम से दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को कोरोना के फैलाव के बाद बेरोजगार हुए लोगों के लंगर छकने के लिए गुरद्वारों में आने का हवाला देते हुए उक्त बेरोजगारों को सरकारी सहायता उनके बैंक खातों के जरिए देने की गुहार लगाई थी। ‘जागो’ पार्टी के अध्यक्ष जीके ने इस मसले पर मीडिया को जारी अपनी प्रतिक्रिया में कहा की सिख इतिहास में कोरे सिरसा ने सुर्खियों में रहने की अपनी आदत से मजबूर होकर एक बार फिर भयंकर भूल कर दी है।केजरीवाल से लंगर छकने वाली संगत के नाम पर सरकारी अनुदान मांगना,एक प्रकार से कमेटी के द्वारा 5 शताब्दी पुरानी लंगर मर्यादा के आर्थिक तौर पर असक्षम होने या कमेटी प्रबंधकों के वैचारिक दिवालिया होने के प्रतीक जैसा है।

जीके ने दावा किया की सिरसा ने सिख इतिहास नहीं पढ़ा है,इसलिए बादशाह अकबर के द्वारा गुरु घर में लंगर चलाने के लिए जागीरें दान करने की गुरु अमरदास जी को गई पेशकश को, गुरु साहिब के द्वारा ठुकराने के बारे सिरसा को पता नहीं है। क्योंकि गुरु साहिब का तर्क था कि गुरु का लंगर संगत की नेक और धर्म की कमाई से ही चलेगा,ना की सरकारी खजाने से। जीके ने खुलासा किया की गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पूरब को मनाते समय भी सिरसा ने स्विगी और जोमैटो के द्वारा खाने की कि जाती होम डिलीवरी की तर्ज पर गुरद्वारा बंगला साहिब के लंगर की होम डिलीवरी की योजना लांच की थी,पर हमारे विरोध करते ही योजना वापिस ले ली थी।

जीके ने दावा किया कि सिरसा का नाम इतिहास में दिल्ली कमेटी के ऐसे पहले प्रधान के तौर पर दर्ज हो गया है,जो की आपदा के समय गुरद्वारों के लिए सरकारी मदद खोजता है,जबकि आज तक आपदा के समय सरकारें ही गुरद्वारों से मदद मांगती आई है। मेरे कमेटी अध्यक्ष रहते उत्तराखंड व जम्मू में आई बाढ़ के समय एनडीआरएफ ने हमारे से सैलाब पीड़ितो के लिए लंगर की मदद माँगी थी। इसी तरह ही दिल्ली में यमुना नदी के किनारे पर रहते लोगो के लिए भी भारी वर्षा की स्थिति में कमेटी हर वर्ष लंगर भेजती रही है। जंतर-मंतर पर देश भर से आते प्रदर्शनकारियों के लिए बिना किसी भेदभाव के हम हजारों लोगों के लिए लंगर भेजते रहे,पर कभी सरकारी मदद नहीं मांगी। जीके ने साफ कहा की लंगर ना जीके का है ना सिरसा का, यह संगत की माया से चलने वाला गुरु का लंगर है। इसलिए संगत को लंगर छकाने के लिए कमेटी को ऐसी लचारगी दिखाना शोभा नहीं देता।

सिरसा के द्वारा गुरद्वारों में 15 दिन पुराने विदेशी पर्यटकों को ही प्रवेश देने के दिए गए तुगलकी आदेश पर भी जीके ने सवाल उठा दिए। जीके ने पूछा की सिरसा ने इस बात की जाँच करने के लिए क्या सिस्टम स्थापित किया है ? जबकि विदेशी तो दूर बड़ी संख्या में चीन व यूरोप में रहने वाले भारतीय प्रवासी नागरिक भी भारत वापिस आ गए है। जीके ने सिरसा को खबरों में रहने की अपनी आत्ममुग्धता को  बरकरार रखने के लिए कमेटी व स्कूल स्टाफ को वेतन मिलने में हो रही देरी पर चुप्पी तोड़ने की सलाह भी दी।