इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्त्री हिंसा


कुछ समय पहले घटी गुवाहाटी की उस अश्लील घटना को याद कीजिए जिसमें चार-पांच लड़के पार्टी से लौटी लड़की के कपड़े फाड़ते बार-बार दिखाए जा रहे थे, लोग आंखें गढ़ाए अपने बहन-बेटी  के पास बैठे यह सब देख रहे थे।



इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्त्री का हिस्सा दिन  पर दिन जितना बढ़ता जा रहा है उसके प्रति हिंसा भी उतनी ही बढ़ती जा रही है। याद कीजिए, क्या आपके ध्यान में कोई ऐसा धारावाहिक, कोई ऐसा चैनल आ रहा है जिसमें स्त्री न हो या उसकी कोई भूमिका न हो। संसद में स्त्री के लिए तैंतीस प्रतिशत आरक्षण पता नहीं कब होगा, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो जन्म से ही वहां स्त्री का लगभग अस्सी प्रतिशत आरक्षण है। क्या स्त्री को दिखाए बगैर कोई समाचार नहीं सुनाया या दिखाया जा सकता है, स्त्री हमारे चैनल की अनिवार्य जरूरत है।

कुछ समाचार चैनल तो केवल उनके सुंदर मुखड़ों के कारण ही देखे जाते हैं। चैनल मालिक भी ये जानते हैं – स्त्री पत्रकार की योग्यता में कुछ कमीबेशी हो तो वो भी उसके सुंदर मुखड़े के सामने नजरअंदाज कर दी जाती है। एक जमाने में दूरदर्शन समाचार में सलमा सुलतान की साडि़यां और उसके जूड़े के फूल ही ज्यादातर लोग देखते थे, बाद में गिल साहब आए तो उन्होंने दूरदर्शन के मोटे थुलथुल चेहरों की विदाई कर दी कि आपके मनशा चेहरे देखकर लोग बोर हो गए हैं।

विदेशों में कुछ ऐसे समाचार चैनल हैं जिनमें समाचार वाचिका अपने वस्त्रों को धीरे-धीरे उतारती  समाचार वाचन करती है और अंत में तो वह लगभग निर्वस्त्र हो जाती है। इस तरह दर्शक उस समाचार चैनल को अंत तक देखते हैं वर्ना् इतने चैनल हैं कि झट हम बोर होकर दूसरे-तीसरे चैथे चैनल पर शिफ्ट हो जाते हैं।

हमारे यहां ऐसी स्थिति अभी नहीं आई है लेकिन आनेवाली है। सावधान हो जाईए। वह दिन दूर नहीं जब दर्शक सूचना और अश्लील मनोरंजन एक साथ चाहेगा और चैनल उसको दिखने में शर्माएंगें नहीं। हमारे कुछ चैनलों ने सूचना और अश्लील मनोरंजन एक साथ बांटने का काम शुरू कर  रखा है। राखी सावंत, मल्लिका सेहरावत आदि को इसीलिए समाचारों के बीच में बैठाया जाता है और बाॅलिवुड के कार्यक्रमों और फिल्मों की अश्लील क्लिपें दिखाई जाती हैं। यहां तक कि समाचार में भी  – आईए। हम आपको दिखाते हैं उस रात निर्भया के साथ क्या हुआ।  कहके आपको बलात्कार के प्रति घृणा नहीं, सनसनी और अश्लील आनंद परोसा जाता है।

कुछ समय पहले घटी गुवाहाटी की उस अश्लील घटना को याद कीजिए जिसमें चार-पांच लड़के पार्टी से लौटी लड़की के कपड़े फाड़ते बार-बार दिखाए जा रहे थे, लोग आंखें गढ़ाए अपने बहन-बेटी  के पास बैठे यह सब देख रहे थे। टेलीविजन कैमरे अपराधी को नहीं, लड़की को दिखा रहे थे। फिर नाट्यरूपांतर करके आप और उसकी इज्जत उतारते हैं। निर्भया बलात्कार कांड के बाद तो जैसे टी वी चैनलों में बलात्कार और सत्री के प्रति हिंसा की घटनाओं को दिखाने की तो जैसे होड़ लग गई है, जो चैनल खेलिए – उसमें यही सब।

इसमें कोई दो राय नहीं कि 16 दिसम्बर के इस जघन्य कृत्य के बाद मीडिया ने जिस तरह की जागरूकता दिखाई उससे इस कांड को देशभर में चर्चित बना दिया और समाज के हर वर्ग ने इसकी निंदा की, लेकिन इसके बाद से तो जैसे हर चैनल यह कहने लगा कि श्श्बलात्कार लाओ  – दिखाओ श्श् – वीआईपी का बलात्कार ज्यादा बिकता है, झूठे -सच्चे किस्से गढ़े जाने लगे। हमारे कई बुजुर्गो ने तो ऐसे चैनल देखना ही छोड़ दिया यहां तक कि अखबार पढ़ना भी उन्होंने छोड़ दिया। जो अखबार उठाओं वहीं सब।

निर्भया के माता-पिता का एक्स्क्लूसिव इंटरव्यू लाओ, उस लड़के – पुरूष मित्र को पकड़ लाओ, एक-एक ब्यौरा पूछा। आसाराम बापू वाली लड़की के माॅं-बाप को पकड़ लाओ – सनसनी पैदा करो – उस रात क्या हुआ – बापू ने बुलाकर सब कपड़े उतार दिए – उस रात उस अंधेरी गुफा में क्या हुआ। यह सब क्या है। पहले हिन्दी फिल्मों में बहन-बेटी का बलात्कार दिखाया जाता था – वह तो दर्शक सिनेमाहाल के अंधेरे में बैठकर देख लेता था – आज यह सब हमारे ड्राईगरूम में परोसा जा रहा  है। हम कोई प्रतिरोध नहीं करते । उल्टे चैनलों की टीआरपी बढ़ाने में योगदान करते हैं। कुछ समय पहले रांची के डीजीपी – पुलिस महानिदेशक की बलात्कार की घटना तो टीवी ने स्टिंग आपरेशन में साफ-साफ दिखा ही दी थी। उस लड़की का क्या यह दोबारा बलात्कार नहीं है।  एक बार वास्तव में दुबारा स्क्रीन पर। टेलीविजन का कैमरा भी स्त्री – देह के साथ छेड़छाड़ करता है। उसे अश्लीलता के साथ दिखाता है।

आजकल सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने टी वी पर फिल्मों में गुटखे, तंबाकू, धूम्रपान, शराब इत्यादि का सेवन करते हुए दिखाने पर एक चेतावनी लिखने का आदेश दिया है कि इससे कर्क रोग – कैंसर होता है। हर दृश्य पर यह लिखना अनिवार्य है चाहे वह कितनी ही पुरानी फिल्म क्यों न हो। फिल्मों में भी शुरू में यह लिखा आता है। बाद में दर्शक भूल जाते हैं और फिल्म खत्म होते ही ठेके पर पहुंच जाते हैं। अब हर चैनल में, हर फिल्म में बलात्कार की घटनाएं दिखाते समय यह लिखना अनिवार्य करना पड़ेगा कि ऐसा न करें – इससे फांसी की सजा हो सकती है।

आज मीडिया ने स्त्री को मुखर बनाया है। वह अपने निजी जीवन, निजी प्रसंगों को कैमरे के सामने लाने में संकोच नहीं करती है। आमिर खान के सत्यमेव जयते ने भी कुछ ऐसी ही तथाकथित तल्ख सच्चाईयों को हमारे सामने रखा था।  इमोशनल अत्याचार में सब होता है। पश्चिम के चैनलों में आफरा विनफ्रे के शो में यह सब होता है लेकिन भारत में भी  बिग बाॅस आदि में यह सब हो रहा है। लिव इन पार्टनर अपने पार्टनरों का कच्चा चिटठा खोल रहे हैं । अपने आनंद और सेक्स प्रसंगों को दर्शकों-श्रोताओं के साथ शेयर करते हैं।

विज्ञापनों में तो यह काम धड़ल्ले से हो रहा है। धारावाहिक बेडरूम की अन्र्तकथाएं परोस रहे हैं। स्वास्थ्य यहां तक कि योगा  के कार्यक्रम भी अश्लील पोशाकों और मुद्राओं के कारण देखे जा रहे हैं। स्त्री ही स्त्री पर हिंसा कर रही है। टेलीविजन पूरी तरह एक स्त्री के एकता कपूर के के कब्जे में हैं और वह ही महिलाओं पर हिंसा और अश्लीलता दिखाने में सबसे आगे हैं। डर्टी पिक्चर और सनी लियोनी वाली फिल्म इसका उदाहरण है।

हमारा रेडियों कुछ हद तक इससे बचा हुआ है ? क्यों उसे कुछ बेचने की मजबूरी नहीं है । इसलिए आकाशवाणी पर कुछ समय तक बलात्कार, हत्या, छेड़छाड़ कीं  खबरे देना वर्जित था। हमें प्रधानमंत्री और सरकार से ही फुर्सत नहीं है। लेकिन 16 दिसंबर की घटना के बाद से हमारे यहां भी स्थितियां बदल गई हैं। आए दिन ऐसी खबरे आ रही हैं पर हम फिर भी बार-बार बलात्कार-बलात्कार नहीं कहते, थोड़ा संयत होकर दुष्कर्म पर आ जाते हैं – हालांकि कानून में बलात्कार ही है और उसी की सजा व्याख्यायित है, दुष्कर्म की नहीं। हम फिर भी संयत हैं। आसाराम बापू, आसाराम बापू नहीं चिल्लाते। चैनल जिस तरह हाथ धोकर इन बाबाओं के पीछे पड़े हैं। इन्हें देवता बनाने वाले भी यह ही चैनल है और दानव बनाने वाले भी।

रेडियो के एफ एम चैनल जबसे निजी हाथों में गया है, वहां से भी तरह-तरह की अश्लील आवाजें और सिसकारियां सुनाई देने लगी हैं। रातविरात और दिन में भी अश्लीलताएं परोसा जा रही हैं।  एफ एम में निजी प्रेम प्रसंग सिसकारें और चटखारे लेकर सैक्सी आवाज में परोसे जाते हैं ताकि लोग उन्हीं की बाते सुनें, चैनल से चिपके रहे। हरदम कुछ न कुछ अश्लील-अश्लील बोलते रहना उनकी मजबूरी है। दूरदर्शन पर पुराने धारावाहिकों की वापसी किस ओर संकेत कर रही है। लोगबाग अन्य चैनलों पर परोसी जा रही अश्लीलताएं देखकर ऊब चुके हैं। वे फिर बुनियाद की ओर लौट रहे हैं। लेकिन टेलीविजन अपनी  बुनियाद की ओर कब लौटेगा ? लूसी शो कितना स्वस्थ मनोरंजन था।

आजकल हर चैनल कम से कम कपड़ों में स्त्री को दिखाने की होड़ में लगा है। यह भी स्त्री पर हिसा है। गांव-गांव में लड़कियों के पहनावे बदल गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की हाफ पैंट और नेकर गांव में भी जल्द पहुंचने वाली हैं। हमारे पहनावे, हमारे रहन-सहन, यहां तक कि हमारे परंपराएं तक बदल गई हैं। हम तिलक और सगाई में भी डीजे होने लगे हैं और अन्नप्राशन के भी कार्ड छपने लगे हैं। लड़की की शादी में भी घरवालों को रिटर्नगिफ्ट देने की परंपरा चल पड़ी है। बंगाल में धोती अब दुर्लभ हो गई है। केरल में जरूर बची है लुंगी। हमारे पिताओं को भी अब धोती और पगड़ी बांधना नहीं आता है।

अंध-विश्वास के प्रति जागरूक करने का काम मीडिया का है लेकिन आज वह अंधविश्वास फैलाने में मददगार हो रहा है। गणेशजी के दूध पीनेवाली घटना याद कीजिए। केदारनाथ विपदा के समय आज तक जैसे चैनल पर पुण्यप्रसून वाजपेयी जैसे प्रखर पत्रकार ने उमा भारती की इस दलील पर पूरा प्रोग्राम कर दिया कि वहां अम्बा देवी को इस बार प्रसन्न नहीं किया तो यह आपदा आई।

हमारे कितने चैनल शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम दिखाते हैं – कितने समाचार चैनलों में शास्त्रीय नृत्य या संगीत या कलाप्रदर्शनी या संग्रहालय के बारे में कुछ बताया जाता है। केवल डीडी भारती कभी कभी खजुराहों से नृत्य समारोह की लाईव कवरेज करता है पर कितने लोग उसे देखते हैं। ऐसा नहीं कि इन कार्यक्रमों को देखनेवाले नहीं हैं। आखिरकार जुबिन मेहता के कश्मीर कंसर्ट को कितने लोगों ने नहीं देखा या रेडियो पर नहीं सुना। हमारे कई श्रोता आज भी संगीत और नृत्य का अखिल भारतीय कार्यक्रम आने पर रेडियो बंद कर देते हैं।

उपभोक्तावाद और विलासिता में हम कुत्सित आनंद लेने लगे हैं। हम आधुनिक होने के साथ-साथ अंधविश्वासी होने लगे हैं। हम रोमांच और चमत्कार के दास बनते जा रहे हैं । हमारे परिवार टूट रहे हैं। विवाहेतर संबंध, लिव इन रिलेशनशिप हमारी दिनचर्या हो गए हैं। ग्लैमर और फैशन की अंधाधुंध हौड़ में हम अपने घरों को अनावश्यक चीजों का अजायबघर बनाते जा रहे हैं। मिथ्या और असत्य ही हमारे सामने सच और वास्तविक कहकर परोसा जा रहा है।

स्टिंग आपरेशन भी आयोजित होने लगे हैं । वीभत्स घटनाओं को संस्कृति कहकर परोसा जाता है।  कारपोरेट कल्चर सपनों के सब्जबाग दिखाकर हमको लूट रहा है। अनावश्यक महत्वाकांक्षाएं हमारे मध्यमवर्ग को आत्महंता बना रही है। विकृत मनोरंजन के माध्यम से सांस्कृतिक प्रवृत्तियों को बढ़ावा  दिया जा रहा है। नायक खलनायक और खलनायक नायक बनाकर पेश किए जा रहे हैं। आतंक का भी श् ग्लैमरीकरण श्  किया जा रहा है। मिशनरी मीडिया आज व्यापारीकरण और धंधाकरण में बदल गया है। गंदा है पर धंधा है कहकर छुटकारा पा लिया जाता है। केवल लाभअर्जन प्रमुख उद्देश्य हैं।

सूचना टैक्नालोजी और मीडिया देव से दानव में बदल गया है। कुछ स्कूलों में बच्चों पर फेसबुक पर प्रतिबंध लगाना पड़ा है। मुज्जफरपुर दंगों में सोशल मीडिया की दानवी शक्ति ने कैसा विस्फोट कर डाला-सबने देखा है। इंटरनेट पर अश्लील तस्वीरें देखकर कितनी ही लड़कियों ने आत्महत्या कर ली – यह भी तो हिंसा है। छोटे-छोटे बच्चे श् पोर्नसाइटें श् खोलकर बैठ जाते हैं और बलात्कार कर रहे हैं क्योंकि उनके लिए फांसी की सजा नहीं है केवल तीन साल का बालसुधारगृह है। हमारी स्वयंसेवी संस्थाओं के पास कितने चैनल हैं और उनके मुद्दों पर कौन फोकस कर रहा है। कोई नहीं।