ये जो छोटे से लम्हे हैं…


हजारों साल पहले बुद्ध ने कहा है कि जन्म लिए हो तो दर्द मिलेगा। सुख की तरह दुख और दर्द जीवन का स्थायी हिस्सा है। इसलिए भोक्ता भाव नहीं, द्रष्टा भाव पैदा करो। सुख में ना तो बहुत आह्लादित हो और ना ही दुख में बहुत आहत। ऐसा करोगे तो कष्ट कम होगा और जिंदगी आसान गुजरेगी।


समरेंद्र सिंह
मत-विमत Updated On :

माचिस फिल्म का गाना है – छोड़ आए हम वो गलियां। संपूर्ण सिंह गुलजार ने लिखा है। इसकी आखिरी लाइनें हैं – “एक छोटा सा लम्हा है, जो खत्म नहीं होता, मैं लाख जलाता हूं, ये भस्म नहीं होता।”

ये जो छोटे से लम्हे हैं ना- ये कमाल के होते हैं। कभी-कभी दिलो-दिमाग से चिपक जाते हैं। फिर छूटते नहीं हैं। मिटते भी नहीं हैं। भस्म भी नहीं होते। और हमें रोक लेते हैं। वक्त अपनी रफ्तार से गुजरता चला जाता है। गुजरते वक्त के निशान हमारे जिस्म, जेहन और जिंदगी पर उभरते चले आते हैं। लेकिन हम उसी लम्हे में कैद हो कर रह जाते हैं।

हजारों साल पहले बुद्ध ने कहा है कि जन्म लिए हो तो दर्द मिलेगा। सुख की तरह दुख और दर्द जीवन का स्थायी हिस्सा है। इसलिए भोक्ता भाव नहीं, द्रष्टा भाव पैदा करो। सुख में ना तो बहुत आह्लादित हो और ना ही दुख में बहुत आहत। ऐसा करोगे तो कष्ट कम होगा और जिंदगी आसान गुजरेगी।

बुद्ध बनना बहुत मुश्किल है। इतना मुश्किल की हजारों साल में अनगिनत लोग आए और गए – दूसरा बुद्ध पैदा नहीं हुआ। मोह-माया से ऊपर उठना कतई आसान नहीं। इसलिए मेरे जैसे साधारण लोगों की जिंदगी तो कुछ खास लम्हों में गुजरती है। उन चुनिंदा बेशकीमती या फिर खौफनाक लम्हों के बीच जो गुजरा, उस वक्त का कोई खास महत्व नहीं है। वो बस यूं ही गुजरता है, जैसे कोई बादल बिना बरसे हवा के झोंके के साथ गुजर जाता है। धरती और आकाश के बीच कहीं विलुप्त हो जाता है।

हम सभी चाहें तो अपनी जिंदगी के उन लम्हों की पहचान कर सकते हैं, जो हमें तोड़ रहे हैं, खंडित कर रहे हैं। अपने तरीके से गढ़ रहे हैं, तराश रहे हैं। सबकुछ कर रहे हैं, बस छोड़ नहीं रहे। छोड़ देते, खत्म हो जाते तो हमारा बहुत बड़ा भार उतर जाता। हम अपनी मंजिलों की ओर मुड़ जाते। वो सपने जो हमने – अपने लिए देखे थे। वो जिंदगी – जिसे और जैसे जीने का वादा था। वो राह जो अब भी हमारा इंतजार कर रही है। और हम उसका।

हम इंसानों की तरह ही कुछ लम्हें मुल्क के माथे पर भी चिपक जाते हैं। वो छूटते नहीं। अंगारा बन कर धधकते रहते हैं। वो पूरी तरह शोक भी नहीं मनाने देते, ना ही जश्न। जैसे अपने ही भीतर से कोई ठहाका लगाते हुए कहता है कि शोक और जश्न दोनों पर तुम्हारा पूरा अधिकार नहीं है। तुम्हें तो जो मिलेगा- वो आधा-अधूरा होगा। खालीपन का अहसास – तुम्हारे जीवन की नियति है। वैसे भी तुम एक खंडित मुल्क के निवासी हो।

तुम्हारे जीवन में दर्द का एक टुकड़ा ठहरा हुआ रहेगा। दिल से रिसते लहू की एक लकीर खिंचती चली जाएगी। अमावस की एक रात ठहरी रहेगी हमेशा। ऐसा नहीं हो – इसका उपाय सीधा है। स्वीकार करना। लेकिन बेचैनी इतनी है कि स्वीकार करें भी तो कैसे?