राजा मूर्खता का खेला करता है, प्रजा इसे धर्म मानकर गले लगा लेती है…


एक अप्रैल को राष्ट्रीय त्यौहार घोषित किया जाए,तो टुकड़े टुकड़े गैंग स्यापा करने लगेगा। मेरा सुझाव है कि ये मांग नागरिक समाज की ओर से आए। इससे आजादी गैंग उछल कूद नहीं कर पायेगा। वर्ना ये गैंग हमारी हर सनातन परंपरा का विरोध करता है, प्रगतिशीलता के नाम पर। हमारे लोकप्रिय चौकीदार की असली डिग्री पूछता है। उनके बताए पर भ्रम फैलाता है। गद्दार कहीं का!


वीरेंद्र सेंगर
मत-विमत Updated On :

आज एक अप्रैल है। लोग इसे मूर्ख बनने या बनाने का दिन मानते हैं। मूर्खता का साल में महज एक दिन। ना बाबा न बाबा! दुनिया होगी इतनी तंग दिल? हम तो परंपरा से उदार हैं। सो मूर्खता को भी सहज भाव से सहजते हैं। इसे अब जीवन शैली का पर्याय मान लेते हैं। हम विश्व गुरु बनने जा रहे हैं। सो पहले देश के अंदर गुरु घंटाल बनना लाजमी है। जब देश घंटाल बनेंगे, तो ही दुनिया में हमारा डंका बजना लाजमी है। हमें गर्व है कि हम साल भर एक अप्रैल ही मनाते हैं। राजा मूर्खता का खेला करता है और हम इसे प्रजा धर्म मानकर गले लगा लेते हैं। राष्ट्र धर्म के प्रति इतना समर्पण ! मेरी आंखों में आंसू आ जाते हैं ! मजबूत होते राष्ट्र धर्म से!

है हमारा कोई मुकाबला? अक्लमंदी में तो वैश्विक प्रतिस्पर्धा है। सो हमने मूर्खता में चैंपियनशिप ले ली। 70 साल में ऐसा कभी नहीं हो पाया। तो बजाओ थाली, ताली। हम इसे वैश्विक सम्मान देंगे। मूर्खता का कजिन बुद्धिमानी सदियों से राज करती आयी है। ये गैर इंसाफी है। सामाजिक न्याय का तकाजा है कि उपेक्षित, शोषित को भी अवसर मिले। 70 साल में खांग्रेस ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। अब अंत्तोदय वाली सरकार है। जो भी उपेक्षित है, उसे आगे लाना है। जो हासिए में पड़ा है, उसकी सुध लेनी है। इससे बिचौलियों में खलबली है। वे न्यू इंडिया के खिलाफ भ्रम फैला रहे हैं। जैसे कि किसानों को भ्रमित कर रहे हैं। मानते ही नहीं!

एक अप्रैल को राष्ट्रीय त्यौहार घोषित किया जाए, तो टुकड़े टुकड़े गैंग स्यापा करने लगेगा। मेरा सुझाव है कि ये मांग नागरिक समाज की ओर से आए। इससे आजादी गैंग उछल कूद नहीं कर पायेगा। वर्ना ये गैंग हमारी हर सनातन परंपरा का विरोध करता है, प्रगतिशीलता के नाम पर। हमारे लोकप्रिय चौकीदार की असली डिग्री पूछता है। उनके बताए पर भ्रम फैलाता है। गद्दार कहीं का!

ये एक तरह से बहुसंख्यकों का अपमान है। हमारे श्रेष्ठ दाढ़ी मुनियों ने क्या किसी विश्वविद्यालय से डिग्री ली थी? नहीं न? फिर भी वे पूज्य रहे। किसी ने उनके निजी जीवन के बारे में सवाल आज तक नहीं किया। देश इनका कृतज्ञ है। लेकिन आज अजीब पागलपन है। टुकड़े टुकड़े गैंग वैश्विक हो चला है। वो दुनिया में देश को बदनाम कर रहा है। इनको भला देशद्रोही न कहा जाए, तो और क्या कहा जाए? मक्खन मार के। बहुसंख्यक आम आदमी हैं, इनकी उपेक्षा करके अल्पसंख्यकों को तरजीह देना धर्म सम्मत भी नहीं है। इतना भर ही तो कहा जा रहा है। इतने भर से लिब्रो गैंग हल्ला मचाता है कि लोकतंत्र खतरे में है।

इस मामले में पहाड़ के लोग इतने नहीं बिगड़े। मैं खासतौर पर उत्तराखंड के कुमाऊं की बात कर रहा हूं। नैनीताल के उप नगर और गांव शुद्धता के दौर में लौट रहे हैं। मैं महीनों से इस इलाके में प्रवास कर रहा हूं। तमाम किल्लतें हैं। फिर भी मोदी जी के प्रति आस्था आम आदमी में अटल है। कहते हैं, भाजपा के सारे लोग बेईमान हो सकते हैं। संघ के लोग पाखंडी हो सकते हैं। राज्य का सीएम मूर्खानंद हो सकता है। लेकिन अवतार पुरुष अकल्याणकारी नहीं हो सकता। जो शख्स मां से भी देश के के लिए मोहमाया न पाले, उसकी नीयत पर सवाल उठाने वाला कोई अधर्मी ही हो सकता है? ये सवाल यहां के आम लोग आज भी धड़ल्ले से करते हैं।

यहां के बहुसंख्यक सरल हैं। इन्हें टुकड़े टुकड़े गैंग मूर्ख कह सकता है। ये तो भारतीय परंपरा का अपमान हुआ। सो वे तथाकथित मूर्खता को भी अपनाने को उद्धत लगते हैं। महज एक अप्रैल को ही नहीं। अपने अवतारी के लिए वे मूर्ख दिवस को हमेशा के लिए अंगीकार करने को तैयार हैं। ये गहरे अनुभव की बात है।

कल ही सैर करने निकला था। वो दाढ़ी वाला मस्ताना मिला था। उसने सूरज ढलने का भी इंतजार नहीं किया था। टुन्न था। पहले भी मिल चुका था। उसने मिलते ही चैलेंज दिया। हिम्मत हो, तो देश चर्चा की जाए। मैंनें हाथ जोड़ लिए। लेकिन वो नहीं माना। बोल पड़ा, तुम टुकड़े टुकड़े गैंग वाले हो या तो बहस करो या दारू के पैसे निकालो ! मैंने सफाई दी,सै र करने निकला हूं, सो पैसे नहीं हैं। वो बोला जेब में बिस्कुट तो होंगे। जो तुम उस साले कलुवा कुत्ते के लिए लाते हो।

दरअसल, मैं घूमने जाता हूं तो मस्ताना के पड़ोस में काले कुत्ते से जरूर मिलता हूं। दो-चार महीने के गैप के बाद भी वो पहचान लेता है। खूब लाड़ जताता है। कूदता है। फिर बिस्कुट का इतंजार करता है। ग्लूकोज वाले बिस्किट का वो दीवाना है। एक दिन मस्ताना मिला था। सुबह से ही टुन्न। बोला, बिस्कुट साले कालू को नहीं दोगे, मुझे दो। मैंनें उसे समझाया। वो कुत्ता है। बिस्कुट न मिले, तो दुखी होगा। मस्ताना जिद्द पर आ गया। बोला, मैं कुत्ते से बड़ा कुत्ता हूं। उससे ज्यादा भूखा हूं। बताओ! कुत्ते को वरीयता मिलेगी या मुझ गरीब को!

बेशक वो पिये था। लेकिन उसने धर्म संकट खड़ा कर दिया। मैंने कहा, मस्ताना तुम्हें कैसे पता है कि तुम कालू से ज्यादा भूखे हो? उसने कहा परीक्षा ले लो। बिस्कुट जमीन में डाल दो। कालू स्वाभिमानी है, वो नीचे गिरा हुआ नहीं खाता। बादशाह मिजाज का है। वो न खाए तो मैं ले लूं? उसका सवाल था। मैंनें ग्लूकोज बिस्कुट का पैकेट खोलकर सडक़ में डाल दिया। मस्ताना भी था और कालू भी। कालू ने मेरी हरकत को गुस्से से देखा और बिस्कुट सूंघा तक नही। मस्ताना ने उठा लिए। एक साथ चारों हबक लिए।

एक पल में ही सब हो गया। मेरी आंख में आंसू थे। मस्ताना ने ठहाका लगाया। सर! इंसान कुत्ते से ज्यादा कमीना निकला। कम्पटीशन में उसे हरा दिया। फिर भी आप रो पड़े। मैंने मस्ताना को गले लगा लिया। अपने साथ ले आया। चलते चलते मस्ताना आपबीती बताया गया। वो इंटरमीडिएट पास है। एक दुर्घटना में मां बाप मारे गये थे। वो भी घायल हुआ था। बाद में जन सेवा का चस्का लगा। कांग्रेसी चंपू बन गया। स्थानीय विधायक का खास चमचा बना तो मुफ्त की दारू मिलने लगी।

बाद में कांग्रेस से मन भर गया। 2014 में मोदीजी का भक्त बना। चुनाव तक सब मिलाता रहा। बाद में वह तीखे सवाल करने लगा। इसे अनुशासनहीनता माना गया। शराबी तो था ही। पार्टी से निकाल दिया गया। सो और पीने लगा। चचेरे भाइयों ने भी निकाल दिया। उसके मूल नाम का अस्तित्व भी जाता रहा। लोग उसे मस्ताना नाम से पुकारने लगे। मस्ताना मजदूरी करता है और पी जाता है। मस्ती में सियासत के लोगों पर गीत बनाता है। तुकबंदी करता है। जोर जोर से गाता है। साथ साथ कुत्ते और बच्चे चलते रहते हैं।

मस्ताना कबीर वाणी बोलता रहता है। हम जैसे लोगों को प्रकृति का नजारा भी दिखाता है। साथ ही मजेदार कमेंट्री भी करता है। उसी की प्रेरणा से पिछली शाम पहाड़ से निकलता ये सूरज सा चांद दिखा, तो बेटी रितम ने इसे मोबाइल में कैद कर लिया। मेरे दिमाग में कालू और मस्ताना का बिस्कुट कांड चमक पड़ता है। आखिर, इन अच्छे दिनों के लिए कौन गुनहगार है? क्या हम और आप भी? सोचिएगा जरूर !

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)