आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए…


‘आप जैसा कोई’ के गीतकार फारूक कैसर काफी समय से बॉलिवुड में छाए हुए थे और यह गीत उनके आखिरी शाहकारों में था। इसके उलट ‘फुलौरी’ के रचनाकार सुंदर पोपो बहोरा ट्रिनिडाड के भजननुमा बैठक-गाना से शुरू करके बहुत लंबी यात्रा तय कर आए थे और इस गाने के जरिये उन्होंने दुनिया भर के भारतवंशियों को एक सूत्र में बांध दिया था।


चंद्रभूषण मिश्र
मत-विमत Updated On :

इतिहास दशकों के हिसाब से नहीं चलता, लेकिन ठीक सन 1980 में हमें दो ऐसे गाने सुनाई पड़े, जिन्हें सुनकर लगा कि यह शायद दस-दस साल पर ही बदलता होगा। इनमें एक था पाकिस्तानी गायिका नाजिया हसन का गाया कुर्बानी फिल्म का गाना ‘आप जैसा कोई मेरी जिंदगी में आए’ और दूसरा कंचन-बाबला का ‘फुलौरी बिना चटनी कइसे बनी’।

दोनों का स्टाइल मिलता-जुलता सा था। मजबूत डिस्को एलिमेंट के अलावा इनमें एक देसी रवानी भी थी। बाद में पता चला कि यह सांगीतिक एकता कोई संयोग नहीं थी। ‘कुर्बानी’ का संगीत कल्याणजी-आनंदजी ने दिया था, जबकि ‘फुलौरी’ छानने वाले बाबला इन्हीं संगीतकार बंधुओं के छोटे भाई थे। दोनों गानों का खेल अलग होता था इनके बोल यानी गीत से।

‘आप जैसा कोई’ के गीतकार फारूक कैसर काफी समय से बॉलिवुड में छाए हुए थे और यह गीत उनके आखिरी शाहकारों में था। इसके उलट ‘फुलौरी’ के रचनाकार सुंदर पोपो बहोरा ट्रिनिडाड के भजननुमा बैठक-गाना से शुरू करके बहुत लंबी यात्रा तय कर आए थे और इस गाने के जरिये उन्होंने दुनिया भर के भारतवंशियों को एक सूत्र में बांध दिया था।

‘फुलौरी बिना चटनी’ के बोल बहुत कम श्रोताओं की समझ में आए थे और ऐसा ही किस्सा इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियों से लदे ‘आप जैसा कोई’ के साथ भी था। लेकिन फुलौरी के लिरिक्स की कुछ लाइनें यहां देना जरूरी है, ताकि गाने में जाहिर होने वाले समाज का जायजा लिया जा सके।

‘आय वेंट सांग्रे ग्रांदे टु मीट लाल बिहारी/ आय पुल आउट माय चौधारी ऐंड टेक आउट तेधारी…मी ऐंड माय डार्लिंग वाज फ्लाइंग इन अ प्लेन/ द प्लेन कैच अ फायर ऐंड वी फाल इनसाइड द केन।’ गीत के कई शब्दों का मतलब समझ में नहीं आता। ‘माय’ का उच्चारण अमेरिकी अश्वेत आबादी की तरह ‘मेह’ है। लेकिन असल चीज है गाने का माहौल।

छुप-छुप कर किसी बीच पर मिल रहे प्रेमी-प्रेमिका का अचानक हवाई जहाज पर पहुंच जाना, जहाज का आग पकड़ लेना और जलते जहाज से हमारे इस प्रिय जोड़े का सीधे गन्ने के खेत में जा पड़ना! यह अंग्रेजी में गाई जा रही भोजपुरी है, जिसे अटलांटिक के पश्चिमी छोर पर वेस्ट इंडीज कहलाने वाले इलाके के सारे देशों ट्रिनिडाड-टोबैगो, सूरीनाम, जमैका और ब्रिटिश गुयाना-फ्रेंच गुयाना में लोगबाग करीबियन हिंदुस्तानी जुबान या ‘ऐली-गैली’ के नाम से भी जानते हैं।

आजकल हम भारत से बाहर रह रहे भारतीयों के बारे में बात करते हैं तो तुरंत दिमाग में अमीर और कामयाब ‘एनआरआई’ की तस्वीर उभरती है। इनमें ज्यादातर अमेरिका और ब्रिटेन में रहते हैं। कुछ शायद संयुक्त अरब अमीरात के दुबई जैसी सुपर-रिच जगहों में भी। इनमें ज्यादातर डॉक्टर, इंजीनियर, प्रफेसर और साइंटिस्ट हैं। अरबपति व्यापारी भी पिछले कुछ वर्षों से इस सूची का अंग बनने लगे हैं।

लेकिन भारतीयों की एक कहीं बड़ी आबादी ब्रिटिश राज में और उससे भी पहले भारत में मौजूद फ्रांसीसी और डच उपनिवेशों में गुलाम या गिरमिटिया मजदूर बनाकर हजारों मील दूर के इलाकों में ले जाई गई, जहां पिछले दो सौ वर्षों में जैसे-तैसे करके उसने अपनी एक समृद्ध संस्कृति रची।

कुछ समय पहले ये लोग भारतीय संस्कृति के नक्शे पर भी अपनी मजबूत छाप छोड़ने में सफल हुए थे, लेकिन अफसोस कि नब्बे के दशक से भारत पर बढ़े एनआरआई प्रभाव ने इन भारतवंशियों को- जिन्हें हम संक्षिप्त नाम पीआईओ से भी जानते हैं- अचानक हमसे दूर कर दिया।

1980 में आया ‘फुलौरी बिना चटनी’ दरअसल भारत पर भारतवंशी सांस्कृतिक प्रभाव का एक सुंदर नमूना था। उस समय हम क्रिकेट में दो वेस्ट इंडियन बल्लेबाजों रोहन कन्हाई और एल्विन कालीचरण के दीवाने हुआ करते थे। सुनील गावस्कर ने अपने बेटे का नाम लिली के मानमर्दक रोहन कन्हाई के कलात्मक खेल से प्रभावित होकर ही रखा था।

लेकिन भारतवंशियों का सबसे ज्यादा असर तब साहित्य के दायरे में देखा जा रहा था, जहां मॉरिशस के उपन्यासकार अभिमन्यु अनत के उपन्यास हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में धारावाहिक छप रहे थे। यह चीज आम हिंदुस्तानी के दिल के इतने करीब थी कि ‘लाल पसीना’ कई लोगों को किसी भारतीय कथाकार की ही रचना लगती रही है।

मैंने इसे पढ़ना शुरू किया तो बीच-बीच में हैरान हो जाता था। भाषा लगभग वैसी ही थी, जैसी हम लिखते-बोलते हैं मगर माहौल अलग था और संबंधों का स्वरूप समझने में अड़चन आती थी। ऐसी अड़चन टॉल्स्टॉय और दोस्तोएव्स्की के अनुवाद पढ़ने में भी आती थी, पर उसे हम विदेशी माहौल की बातें मानकर दरकिनार कर देते थे। यहां मामला अलग था।

आप गंवई माहौल वाला एक हिंदी का उपन्यास पढ़ रहे हैं, जहां तीखी धूप में स्कर्ट पहने गन्ना काट रही एक मां अपने बेटे को ‘तीन बुतिकिया’ बजार (फ्रेंच में बुतिक यानी दुकान) से किसी कोला की बोतलें पकड़ लाने को बोल रही है! यह व्यतिक्रम समझने के लिए अपनी नजर हिंद महासागर के पार ले जाने की क्षमता मेरे अंदर होनी चाहिए थी।

हमारी समस्या यही है कि अंग्रेजीदां प्रवासी भारतीयों को हम चापलूसी की हद तक अपने दिल के करीब मान लेते हैं। लेकिन बात जब भारतवंशियों की आती है- भारत से पांच-दस-पंद्रह हजार मील दूर फिजी, मॉरिशस और वेस्ट इंडीज के देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों की- तो उन्हें अपने ही विस्तार की तरह देखना चाहते हैं।

उनकी सभ्यता-संस्कृति, उनके दुख-सुख, उनके संघर्ष, को जानने के ईमानदार जतन हमारी तरफ से बिल्कुल नहीं हो पाते। कई दूसरी भाषाओं के शब्दों के घालमेल और नागरी लिपि की लगभग अनुपस्थिति के बावजूद वे काफी हद तक हमारी ही जुबान बोलते हैं। लेकिन मामला जब उनकी जुबान समझने का आता है तो हम शुद्धतावादी हो जाते हैं।

याद रहे, संस्कृति का सौदा कभी एकतरफा नहीं होता। भारतवंशियों के भाषिक प्रयोगों और उनकी जिंदगी की स्वतंत्र लयकारी को अगर हम भाषिक शुद्धतावाद को एक तरफ रखकर जानने-समझने की कोशिश करेंगे तो इससे न सिर्फ हमारी भाषा-संस्कृति का विस्तार होगा, बल्कि थोड़ा बड़प्पन भी आएगा, जिसकी आज हमें बहुत ज्यादा जरूरत है।