अक्षय ऊर्जा संयंत्र चरम प्राकृतिक आपदाओं के परिप्रेक्ष्य में चुनौतियां


नेशनल साइक्लोन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट (एनसीआरएमपी) के अनुसार, भारत प्राकृतिक खतरों, खासकर भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूस्खलन की चपेट में है। आंध्रप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, पांडिचेरी, और गुजरात चक्रवात आपदाओं के लिए अधिक संवेदनशील हैं। इनमें से अधिकांश क्षेत्र अक्षय ऊर्जा स्रोतों, विशेष रूप से सौर और पवन, से समृद्ध हैं।


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जलवायु परिवर्तन का प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट है, जैसा कि हाल ही में अम्फान महाचक्रवात के दौरान देखा गया है, जो पूर्वी तट पर हमला करने वाले सबसे भयंकर तूफानों में से एक था। भारत को और अधिक चरम मौसम की घटनाओं के लिए तैयार रहना चाहिए।

ये कहना है पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय, भारत सरकार के सचिव और मौसम विज्ञानी एम राजीवन का। वे कहते हैं कि भारत में पहले की तुलना में अत्यधिक तीव्रता के साथ चरम मौसम की घटनाएं देखी जाएंगी। (28 मई, 2020, इकोनॉमिक टाइम्स )

राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (एनडीआरएफ) के प्रमुख का कहना है कि सुपर साइक्लोन अम्फान दो दशकों में बंगाल की खाड़ी में विकसित होने वाला सबसे तीव्र चक्रवाती तूफान था। (26 मई, 2020 टाइम्स ऑफ इंडिया)। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के प्रमुख मृत्युंजय महापात्र ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि भारत पर ग्लोबल वार्मिंग का बहुत प्रभाव है। जलवायु परिवर्तन होने के साथ, चरम मौसम की घटनाएं अधिक हो जाएंगी। (7 जनवरी, 2020, इकोनॉमिक टाइम्स)

आई एमडी ने कहा था महाराष्ट और गुजरात दक्षिण-पूर्व एकदम दबाव वाले क्षेत्र के रूप में पूर्व-चक्रवात के अलर्ट पर हैं और पूर्व-मध्य अरब सागर से सटे क्षेत्रों में जून 3 के नजदीक चक्रवाती तूफान निसर्ग के तेज होने की संभावना है, वही हुआ। मुंबई इससे प्रभावित हो चुका है। यह 1891 के बाद मुंबई शहर में आने वाला पहला इतना प्रबल चक्रवात है।

नेशनल साइक्लोन रिस्क मिटिगेशन प्रोजेक्ट (एनसीआरएमपी) के अनुसार, भारत प्राकृतिक खतरों, खासकर भूकंप, बाढ़, सूखा, चक्रवात और भूस्खलन की चपेट में है। आंध्रप्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, पांडिचेरी, और गुजरात चक्रवात आपदाओं के लिए अधिक संवेदनशील हैं। इनमें से अधिकांश क्षेत्र अक्षय ऊर्जा स्रोतों, विशेष रूप से सौर और पवन, से समृद्ध हैं। 9 गीगावॉट की सौर ऊर्जा क्षमता पहले ही इन राज्यों में स्थापित हो चुकी है।

ऐसा नहीं है कि हमें इस विषय में चेतावनियां नहीं मिल रही हैं। रीवा अल्ट्रामेगा सोलर पावर पार्क गत वर्ष जुलाई में असाधारण रूप से भारी बारिश और अति तीव्र हवाओं से क्षतिग्रस्त है। एक तरफ इसका अनुमानित कारण था जल-प्रवाह का पिछले 50 साल के प्रतिमानों को पार कर जाना, इस क्षति का एक कारण नदी के बहाव वाले इलाकों में सोलर पैनल का लगाना भी बताया गया। दूसरी तरफ राजस्थान की एक सौर परियोजना में गत वर्ष मई में एक तूफान में 1000 से अधिक मॉड्यूल क्षतिग्रस्त हुए।

पिछले वर्ष आए चक्रवात फनी के कारण भी सौर ऊर्जा संयंत्रों-जमीन पर स्थापित एवं रूफटॉप-को भारी क्षति पहुंची थी। इसलिए प्रासंगिक सवाल यह है कि क्या हमारे सौर ऊर्जा संयंत्र अतिविनाशकारी चक्रवात, गंभीर तूफानों और अकस्मात आयी हुई बाढ़ के लिए तैयार हैं, विशेषतः इन क्षेत्रों में ? यहां पर दो प्रश्न उठते हैं, (1) हालांकि सौर पीवी मॉड्यूल और सिस्टम के गुणवत्ता मानक मौजूद हैं, क्या मौजूदा मानक इन मौसमी चरम घटनाओं से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए पर्याप्त हैं और (2) मौजूदा मानकों का सौर सयंत्रों की स्थापना के समय कितनी गंभीरता से पालन किया  जाता है?

आम तौर पर भारत में सौर ऊर्जा संयंत्रों के विभिन्न संघटक जैसे पीवी मॉड्यूल, इनवर्टर, विद्युत घटकों और केबलों से संबंधित निर्धारित मानक मौजूद हैं। जहां तक उनके स्ट्रक्चर्स का सवाल है, उनके भी मटीरियल और कोटिंग के संदर्भ में न्यूनतम मानक निर्धारित हैं। जो चीजें अनुपस्थित हैं वे हैं मॉउंटिंग स्ट्रक्चर्स की डिजाइन एवं सौर सयंत्रों की स्थापना के लिए मानक और बेस्ट प्रैक्टिसेज, विशेषकर जलवायु सम्बंधित इन चरम घटनाओं के सन्दर्भ में। 

भारत में कुछ निश्चित विंडलोड्स के आधार पर डिजाइन किए जा रहे सौर सयंत्रों की संरचनाओं का आश्वासन तो दिया जाता है परन्तु किस विशेष क्षेत्र के लिए कितने अधिकतम विंड लोड के लिए स्ट्रक्चर्स डिजाइन किये जाएँ, या फिर उनका वास्तव में पालन किया जा रहा है या नहीं, ऐसे महत्वपूर्ण फैसले सौर डेवेलपर्स के व्यक्तिगत विवेक पर अधिक निर्भर करते हैं ना कि किन्हीं निर्धारित मापदंडों अथवा किसी नियामक ढांचें पर। आज वाणिज्यिक सच्चाई यह है कि हर स्तर पर सौर संयंत्रों की लागत को कम करने के दबाव के कारणवश परियोजना की गुणवत्ता के साथ समझौता करने की संभावनाएं बढ़ती जा रही हैं। 

बहु-मेगावाट सौर पार्कों में, सामग्रियों के चयन का आधार क्या है, उससे समग्र परियोजना लागत पर एक बड़ा असर पड़ता है। इसलिए हमारे लिए चिंताएं दोगुनी हो जाती हैं। सर्वप्रथम हमारे देश में सौर ऊर्जा संयंत्रों के लिए निर्धारित मानक और प्रक्रियाएं या तो उतनी व्यापक नहीं हैं-विशेषकर चरम प्राकृतिक घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में- और जिन क्षेत्रों में हैं भी वहां पर भी उन मानकों की व्यक्तिगत विवेचनाओं की संभावनाओं को अनदेखा नहीं किया जा सकता। दूसरे, स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब डिजाइन इंजीनियरिंग और स्थापना के लिए उचित एवं क्षेत्र-विशिष्ट गुणवत्ता मानदंड के बिना केबल सौर बिजली उत्पादन की कीमत अंतिम एवं एकमात्र लक्ष्य बन जाती है।

परन्तु आज हकीकत यह है कि इस क्षेत्र से जुड़े सभी साझेदारों का केंद्र बिंदु सौर बिजली का टैरिफ रह गया है। हालांकि उत्पादन की लागत कम से कम करने का ध्येय अत्यंत प्रसंशनीय है, उतना ही आवश्यक है सयंत्रों की सक्षमता जल्दी जल्दी होने वाले इन संकटकारी प्राकृतिक विपदाओं से उत्पन्न क्षति से निपटने की। आखिरकार इन सभी संयंत्रों का जीवनकाल 20-25 वर्षों का माना जाता है। अतः जब हम अक्षय ऊर्जा के राष्ट्रीय लक्ष्यों की बात करेंगे तब उन लक्ष्यों में गुणवत्ता और संयंत्रों के पूर्णकालीन उपलब्धता के शामिल होने की भी बहुत आवश्यकता है। इसका मतलब है कि ना केवल इस विषय में अनिवार्य मानक और सर्वोत्तम प्रैक्टिसेज लागू की जाएं अपितु स्वतंत्र निरीक्षण द्वारा इन्हें सुनिश्चित भी किया जाए।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2020 के अनुसार विश्व में जलवायु परिवर्तन से होने वाली चरम घटनाओं से सबसे अधिक प्रभावित होने वाले दस राष्ट्रों में भारत पांचवें स्थान पर है। यह एक प्रकार से विरोधाभास ही कहा जाएगा कि जिन प्रोद्योगीकियों का उपयोग हम जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को रोकने के लिए बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए भी अविलम्ब उपायों की आवश्यकता है जिससे कि जलवायु परिवर्तन-जनित चरम प्राकृतिक घटनाओं से उनकी क्षति को न्यूनतम बनाया जा सके।

(लेखक, दि एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टिट्यूट में वरिष्ठ निदेशक सोशल ट्रांसफार्मेशन हैं।)