रेप पर सवाल, पाकिस्तान में बवाल


गुजरावाला रेप मामले में ऐसे तर्क भी उठ रहे हैं कि आखिर इस्लाम के मुताबिक रेप कहा किसे जाए? इस्लामिक कानूनों के मुताबिक अगर कोई महिला रेप का आरोप लगाती है तो उसे ही ये साबित करना होता है कि उसके साथ जोर जबर्दस्ती से शारीरिक संबंध बनाया गया।


संजय तिवारी
मत-विमत Updated On :

पाकिस्तान में एक्सप्रेसवे को मोटरवे कहा जाता है। लाहौर मोटरवे पर बीते मंगलवार 10 सितंबर की रात एक महिला अपने बच्चे के साथ गुजरावाला लौट रही थी। रास्ते में गुज्जरपुरा के पास उसकी गाड़ी में पेट्रोल समाप्त हो गया। वो गाड़ी खड़ी करके सोच ही रही थी कि क्या करें तभी हाथों में हथियार लिए दो लोग प्रकट होते हैं। गनप्वाइंट पर उस औरत और उसके बच्चे का अपहरण करके पास के खेत में ले जाते हैं और उसके बच्चे के सामने उस औरत से बलात्कार करते हैं।

यह मामला पाकिस्तान में इतना उछला कि बलात्कार पर बहस खड़ी हो गयी। नये पुराने सभी तथ्य और तर्क सामने आने लगे। इन बहसों में इमरान खान की पार्टी पीटीआई की नेशनल एसेम्बली मेम्बर शान्दना गुलजार ने एक ऐसा आरोप लगाया जिसने इस बहस को विवाद में बदल दिया। गुलजार ने एक टीवी शो के दौरान एक रिसर्च ग्रुप “वॉर आन रेप”  के एक रिसर्च के हवाले से कहा कि पाकिस्तान में 82 प्रतिशत रेप के मामले में लड़कियों और महिलाओं का रेप उसके परिवार के ही लोग करते हैं। जैसे, बाप, चाचा, चचेरे भाई, या फिर घर में ही आने जानेवाले रिश्तेदार। रेप के इन मामलों में पुलिस में शिकायत नहीं की जाती और अगर गर्भ में बच्चा ठहर जाए तो गर्भपात करवाकर मामले का रफा दफा कर दिया जाता है। गुलजार का यह आरोप इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वो स्वंय सत्ताधारी दल से जुड़ी हुई हैं।

यहां ये सवाल खड़ा होता है कि असल में शान्दना गुलजार जिसे रेप कह रही हैं क्या इस्लाम में उसे रेप कहा जाता है? इस्लाम में महिलाओं को सेक्स ऑब्जेक्ट के अलावा और किसी रूप में स्वीकार नहीं किया जाता। इस्लाम में दूध के रिश्तों के अलावा किसी से भी निकाह की इजाजत होती है। जैसे एक मुस्लिम अपने भाई की लड़की से निकाह तो नहीं कर सकता लेकिन अपने बेटे का निकाह अपने भाई के बेटी से कर सकता है। कुरान में अध्याय चार की आयत नंबर 22-23-24 मुसलमानों के निकाह से संबंधित दिशानिर्देश हैं। इन आयतों का मुस्लिम स्कॉलर अपने हिसाब से परिभाषा करते हैं। जैसे सलफी इस्लाम की सबसे महत्वपूर्ण यूनिवर्सिटी मिस्र की अल अजहर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अजेन अल शेरसावी ने 2014 में एक विवादित बयान दिया था कि मुस्लिम अपनी बेटी से निकाह कर सकता है। सोशल मीडिया पर उनकी बहुत निंदा हुई लेकिन न तो उनने अपना बयान वापस लिया और न ही मुस्लिम मौलवियों ने इसे खारिज किया। 2007 में असम के जलपाईगुड़ी में अफजुद्दीन नामक व्यक्ति ने अपनी सगी बेटी से निकाह कर लिया था। उसने उस समय कहा था कि ऐसा उसने इस्लाम की रिवायत के मुताबिक ही किया है।

हालांकि ऐसी घटनाएं इक्का दुक्का हैं लेकिन निकाह हलाला जैसी रिवायतों के होने के कारण इस्लाम में औरत के शोषण और दमन का रास्ता कभी बंद नहीं होता। भारत में एक मुस्लिम द्वारा हलाला के नाम पर अपनी ही बहू से निकाह कर लेने पर जब बहुत विवाद हुआ तब उस समय जाकिर नाईक ने कहा था कि इस्लाम में रेप जैसी कोई अवधारणा नहीं है। इस्लाम में सिर्फ निकाह है। उनके मुताबिक अरबी में संबंध बनाना भी निकाह है और शादी भी निकाह है। संबंध बनाने के लिए जरूरी नहीं है कि निकाह किया जाए। इसलिए उन्होंने बहू और श्वसुर के शारीरिक संबंध बनाने को सिर्फ संभोग वाला निकाह करार दिया था और माना था कि श्वसुर ऐसा कर सकता है।

निश्वित रूप से गुजरावाला रेप मामले में ऐसे तर्क भी उठ रहे हैं कि आखिर इस्लाम के मुताबिक रेप कहा किसे जाए? इस्लामिक कानूनों के मुताबिक अगर कोई महिला रेप का आरोप लगाती है तो उसे ही ये साबित करना होता है कि उसके साथ जोर जबर्दस्ती से शारीरिक संबंध बनाया गया। इसके लिए एक या फिर चार गवाह जुटाने की जिम्मेवारी महिला पर ही होती है कि वह शरीयत के मुताबिक बलात्कार को साबित कर सके। ऐसे में मानवीय पक्ष अपने आप किनारे हो जाते हैं। आज संसार में महिलाओं के अधिकारों को लेकर जिस तरह से जागृति आ रही है और दुनिया के हर देश उसे संरक्षा और सुरक्षा देने के लिए कड़े कानून बना रहे हैं तब इस्लाम में असली बहस ये है कि रेप कहा किसे जाए? आधुनिक कानूनों और शरीयत के बीच इतना टकराव है कि अगर मुसलमान आधुनिक कानूनों को मानता है तो शरीयत सामने खडी होती है और शरीयत के हिसाब से चले तो आधुनिक समाज से तालमेल नहीं बैठता है।

पाकिस्तान के ही पंजाब प्रांत में दो तीन साल पहले घरेलू हिंसा को लेकर एक कानून पारित हुआ था जिसमें महिलाओं को ये अधिकार दिया गया था कि उनके साथ होनेवाले उत्पीड़न के खिलाफ वो पुलिस में शिकायत कर सकती हैं। मुस्लिम मौलवी और मौलानाओं ने इसका कड़ा विरोध किया क्योंकि इस्लाम में अपने उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत करने का मुस्लिम महिला को कोई अधिकार ही नहीं है। उल्टे शरीयत के मुताबिक औरतों को मारना पीटना जायज है। जब औरत को मारना पीटना, उसे सजा देने का अधिकार इस्लाम किसी मुसलमान को देता है तो फिर इसके खिलाफ कोई कानून कैसे बन सकता है? पाकिस्तान में महीनों इस पर बवाल हुआ लेकिन आखिरकार कानून बचा रहा और मुल्ला मौलवी भी शांत होकर बैठ गये।

देखना ये है कि ताजा माहौल में पाकिस्तान के इस्लामिक स्कॉलर और मुल्ला मौलवी रेप को लेकर उठे बवंडर से अपने आप को कैसे बचाते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और लेख व्यक्त विचार निजी हैं।)