विश्व पर्यावरण दिवस : प्रकृति पर ‘कब्जा’ जमाने से नहीं होगा पर्यावरण संरक्षण


प्रकृति पर कब्जा करना मानव का पुरुषार्थ गिना जाने लगा। दुनिया में मानवीय विकास के लिए जंगलों की सफाई की जाने लगी। बड़े पैमाने पर जानवरों की हत्या की गई। बड़े बड़े पुल बनाए गए। नदियों पर बांध बना दिए गए। यहां तक कि विकास के क्रम में अनुपयुक्त मानव की भी बड़े पैमाने पर हत्या की गई।


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मत-विमत Updated On :

पर्यावरण दिवस पर पूरी दुनिया में बड़े-बड़े कार्यक्रम आयोजित करने की परिपाटी रही है। चूकि इस बार कोरोना महामारी का खतरा है इसलिए कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जा रहे हैं लेकिन गंभीर विमर्श तो हो ही रहा है। इस दिवस का मतलब पर्यावरण का संरक्षण है। पर्यावरण के संरक्षण का मतलब यह है की दुनिया में जो प्राकृतिक विविधता है उसको बचा कर रखना। 

दरअसल, मानव ने विकास क्रम में कभी ध्यान ही नहीं दिया कि वह जिस प्रकार से विकास कर रहा है उससे प्रकृति को भयंकर क्षति पहुंच रही है। आधुनिक चिंतकों ने प्रकृति पर विजय को ही विकास समझ लिया और यहीं से गड़बड़ी प्रारंभ हो गई। पश्चिम के चिंतकों ने प्रकृति को एक स्त्री के रूप में देखा। जिसके बांह मरोड़ने से वह अपने सारे रहस्यों को उगल देगी। इस चिंतन के विकसित होते हैं दुनिया भर में प्रकृति पर कब्जे का अभियान प्रारंभ हो गया। नित नए विज्ञान ने प्रकृति के रहस्य को खोजना प्रारंभ किया। 

इस क्रम में प्रकृति पर कब्जा करना मानव का पुरुषार्थ गिना जाने लगा। दुनिया में मानवीय विकास के लिए जंगलों की सफाई की जाने लगी। बड़े पैमाने पर जानवरों की हत्या की गई। बड़े बड़े पुल बनाए गए। नदियों पर बांध बना दिए गए। यहां तक कि विकास के क्रम में अनुपयुक्त मानव की भी बड़े पैमाने पर हत्या की गई। यानी यह तय किया गया कि मानव जहां चाहेगा वहां पानी होगा, जहां चाहेगा वहां वन होगा, जहां चाहे वहां हवा होगी, जहां चाहे वहां सूर्य की रोशनी पहुंचेगी, जहां चाहे वहां बारिश होगी, जहां चाहे वहां खेती होगी और मनुष्य जहां चाहेगा वह स्थान बंजर हो जाएगा। 

बर्फ की बारिश से लेकर रेगिस्तान तक का प्रबंधन मानवीय सोच का अंग बन गया। अंततोगत्वा ऐसा होने लगा कि जीवन जीने के लिए जो तत्व चाहिए उसमें ही कमी आने लगी। इसके बाद जब मनुष्य को मनुष्यता पर खतरा महसूस होने लगा तो अब यह चिंतन सामने आया है कि मानव को जीवन जीने के लिए और आने वाली पीढ़ी को जीवित सुरक्षित भविष्य प्रदान करने के लिए पर्यावरण का संरक्षण जरूरी है।

विकास भारती, बिशुनपुर के सचिव पद्मश्री अशोक भगत कहते हैं कि वनवासी समाज जो बहुत ही व्यवस्थित थे और अन्य समाज की अपेक्षा आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर एवं संगठित थे, उनको आधुनिक विकास ने  अपने पारंपरिक व्यवसाय और व्यापार से अलग किया और नौकर बनाया। आदिवासियों को कृषि से अलग कर दिया। दूसरा आदिवासियों को पशुपालन से अलग किया और तीसरा जनजातीय समाज में जो आर्टिजन टेक्नोलॉजी थी उसको खत्म करने की पूरी कोशिश की। 

आदिवासी समाज में लोहा गलाने की कटनी से लेकर वस्त्र बनाने तक की तकनीक विकसित थी जिसे आधुनिक रूप रंग देने के बजाय बड़ी चालाकी से उन्हें अपने काम से अलग कर दिया। जो आदिवासी अपने स्थान पर मालिक थे उनको विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों में ले जाकर नौकरी पर रखवा दिया। अगर सचमुच में जनजातीय क्षेत्र में विकास करना है तो जनजातियों की प्रकृति के अनुकूल उनको प्रशिक्षित करके विकसित किया जा सकता है।  

पद्मश्री परशुराम मिश्रा कहते हैं कि चक्रीय विकास का मतलब विकास का चक्र है। पश्चिमी सोच के अनुसार विकास रैखिक होता है यानी एक रेखा पर सतत बढ़ता है लेकिन यह विकास कभी भी सस्टेनेबल नहीं होता है। इसमें कहीं न कहीं ब्रेक लग जाता है और विकास अवरुद्ध हो जाता है। चक्रीय विकास से विकास की निरंतरता बनी रहती है। परशुराम मिश्रा ने अपने जीवन में कई प्रकार के प्रयोग किए। रांची के पास ओरमांझी में उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों को एकत्रित कर लगभग 400 एकड़ में निजी जंगल का निर्माण करवाया। जंगल के माध्यम से उन्होंने हजार से अधिक ग्रामीणों को लाह की खेती का प्रशिक्षण दिया। आज ग्रामीण लाह की खेती करके बहुत ही बढ़िया पैसा कमा रहे हैं। 

दरअसल, परशुराम मिश्रा मिट्टी जांच पदाधिकारी रहे। चंडीगढ़ में मिट्टी जांच इंस्टिट्यूट में निदेशक थे। उनके जिम्मे शिवालिग पहाड़ से मिट्टियों के कटाव और सुखना लेक में निक्षेप के जमाव से छुटकारा दिलाने का काम लगाया गया था। उसी क्रम में उन्होंने सुखो माजरी नामक गांव को विकसित किया था। वहां उन्होंने सतत विकास यानी सस्टेनेबल डेवलपमेंट के कई प्रयोग किए। इसी प्रकार के ग्राम विकास के छोटे-छोटे कई प्रयोग झारखंड में किए। वह प्रयोग फलीभूत हो रहा है।सतत विकास की अवधारणा सचमुच भारतीय अवधारणा है। अगर सचमुच में भारत जैसे देश का विकास करना है तो उसका रास्ता यही होना चाहिए।  

इस विषय पर कई जगह कई ढंग से काम हो रहे हैं। हिंदू चिंतन को मानने वाले अब इस बात को लेकर एकमत हो रहे हैं की विविधता से ही भारत का विकास संभव है। इस बात को लेकर आदिवासी जनजातीय समाज में भी जबरदस्त तरीके से लोग सोचने लगे है। आदिवासी चिंतन यह कहता है की प्रकृति जिसमें वृक्ष, नदी, तालाब, सूर्य, चंद्रमा, यह जो प्रकृति के प्रत्यक्ष रूप है, जिसके द्वारा हमें भोजन मिलता है, संरक्षण मिलता है, यही हमारा भगवान और इस पर अगर किसी प्रकार का कोई आक्रमण होता है तो हमारी जीवन पद्धति पर, हमारे जीवन जीने की शैली पर आक्रमण होता है। 

आदिवासी चिंतन की सबसे पहली अवधारणा है कम खर्च में अधिक से अधिक खुश रहना। दूसरी अवधारणा है प्रकृति के (चर-अचर) के साथ एकात्म भाव विकसित करना। तीसरी अवधारणा, अगली पीढ़ी को बेहतर पृथ्वी प्रदान करना और चौथी अवधारणा है दुनिया भर के लिए खुशी की कामना करना। इस प्रकार की अवधारणा किसी न किसी रूप में हिंदू चिंतन का अंग है। यदि सचमुच प्रकृति को और पर्यावरण को बचाना है तो हमें देसी एवं भारतीय चिंतन को आत्मसात करना पड़ेगा। आधुनिकता जरूरी है विज्ञान भी जरूरी है लेकिन प्रकृति पर कब्जा करने का विज्ञान मानवीय सभ्यता को विनाश की ओर ले जाएगा इसलिए कोरोना महामारी ने हमें सतर्क होने के लिए कहा है नहीं सतर्क हुए तो विनाश अवश्यंभावी है।