छात्रों के बहुमुखी विकास में बाधा है ऑनलाइन एजूकेशन


एक आंकड़े के मुताबिक हिंदुस्तान में 90 फीसदी विद्यार्थियों की पहुंच अभी भी इंटरनेट और कंप्यूटर तक नहीं है। जिन बच्चों के पास कंप्यूटर या स्मार्ट फोन नहीं है ऐसे बच्चों के अवसाद में जाकर आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सूचनाएं भी मिलती रहती हैं। एक सभ्य समाज में इस तरह का अभाव विचलित करने वाली है।


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मत-विमत Updated On :

कोविद-19 के कहर ने पूरी दुनिया को अपने तौर-तरीकों को बदलने पर मज़बूर कर दिया है। हमारे बच्चे और युवाओं की एक पीढ़ी जो अपने भविष्य को संवारने और देश की नुमाइंदगी के लिए तैयार हो रही है, मौजूदा परिस्थिति में वे इस स्थिति में आ गए हैं जहां निराश और आलस्य के शिकार हो रहें हैं। स्कूल से लेकर कॉलेज तक के छात्र घंटों ऑनलाइन क्लासेज के दौरान बड़े बैकबोर्ड के बजाय छोटी सी स्कीन पर अपना ध्यान केंद्रित करने को मजबूर हैं। स्कूल में क्लास के दौरान शिक्षकों से एक-एक करके संवाद, दोस्तों के साथ मस्ती, छोटे मोटे विवाद ,बहस में पड़ने और उससे निपटने की क्षमता का अभ्यस्त होने उनके व्यक्तित्व का विकास होता है। घर में कैद रहने की स्थिति छात्रों के बहुमुखी विकास को प्रभावित करने वाली है।

कहते हैं बच्चों की दुनिया जितनी हसीन होती है उतनी ही संवेदनशील भी होती है। हम उम्र के साथ में खेलना, खाने की छुट्टी में पॉट लॉक करना एक साथ रचनात्मक कार्य उस बफरिंग का काम करती है जो इस सामाजिक अलगाव में हो पाना मुश्किल है, जिसका अंजाम ये होता है की ऑनलाइन कक्षाओ के लिंक अक्सर लीक हो जाते हैं जिसकी वजह से कभी-कभी इन लिंक का गलत इस्तेमाल कर फेक लोग इन कक्षाओ में गैर जरुरी चीज़ें साझा कर देते है। जिससे आम तौर पर शिक्षक और बच्चों को शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। एक आंकड़े के मुताबिक हिंदुस्तान में 90 फीसदी विद्यार्थियों की पहुंच अभी भी इंटरनेट और कंप्यूटर तक नहीं है। जिन बच्चों के पास कंप्यूटर या स्मार्ट फोन नहीं है ऐसे बच्चों के अवसाद में जाकर आत्महत्या जैसा कदम उठाने की सूचनाएं भी मिलती रहती हैं। एक सभ्य समाज में इस तरह का अभाव विचलित करने वाली है।

आज-कल की पीढ़ी इतनी जागरूक है कि वो इंटर के बाद अपनी दिशा खुद तय करने में सक्षम है। यह अच्छा है कि वो हमारी पीढ़ी की तरह अपनी पिछली पीढ़ियों के कहे पर आश्रित नहीं है। और अपनी दिमागी कसरत से अपना भविष्य तय करना चाहते है। जबकि आज से ढाई-तीन दशक पहले ऐसा बिल्कुल नहीं था। आज शिक्षा का तेज़ी से व्यापारीकरण एक संशय पैदा करता है। किसी ने तो यहां तक दावा किया कि मैनेजमेंट की पढ़ाई शिक्षा के साथ अब तक का किया गया सबसे बड़ा फ्राड है।

शिक्षण संस्थानों के प्रति सरकार की उदासीनता हमारी भावी पीढ़ी के लिए एक भितरघात साबित हो रही है। उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों का तो अरसे से बहुत बुरा हाल है। जिसकी वजह से दिल्ली एक एजूकेशनल हब बन कर उभरा। उत्तर प्रदेश औऱ बिहार के छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए दिल्ली जैसे महानगरों की तरफ रूक किया। पहले जो विद्यार्थी मेडिकल-इंजीनिरिंग नहीं कर पाते वो दिल्ली की तरफ देखते थे। लेकिन पिछले दिनों जिस तरह की तस्वीर दिल्ली के संस्थानों में देखने को मिली वो देख कर अभिभावकों की रूह कांप जाती होगी।
आज सरकारी शिक्षा और निजी शिक्षा दोनों दोषपूर्ण स्थिति में पहुंच गए हैं। कहीं पर अनुशासन और पठन-पाठन का भाव है तो कहीं पर शिक्षा इतनी महंगी है कि आम आदमी ऐसे कॉलेजों-संस्थानों में अपने बच्चों का एडमिशन नहीं करा सकता है। ऐसे में मजबूरन ढेर सारे अभिभावकों को अपने को बच्चों को प्राइवेट यूनिवर्सिटीज के हवाले करना पड़ता है जो शिक्षा देने नहीं पैसा उगाहने की दुकानें हैं। इस महंगी शिक्षा का अंजाम ये होगा की बच्चे अपनी पढाई के लिए क़र्ज़ लेंगे और उन कर्ज़दारों के एजेंडे उन्हें चबा जायेंगे। ऐसे छात्रों के पाश अपनी अगली पीढ़ी को देने के नाम पर कुछ नहीं होगा।