जनजातीय लोक साहित्य का ज्यादा से ज्यादा अनुवाद सामने आना चाहिए : जानकी प्रसाद शर्मा

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नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय अनुवाद दिवस के अवसर पर साहित्य अकादेमी द्वारा आज बृहस्पतिवार को एक कार्यक्रम का आयोजन आभासी मंच पर किया गया। कार्यक्रम का विषय था अंतरभाषायी अनुवाद और राष्ट्रीय एकता । इस अवसर पर बोलते हुए प्रख्यात गुजराती अनुवादक प्रोफेसर आलोक गुप्त ने कहा कि भारत में अनुवाद की एक समृद्ध परंपरा हमेशा मौजूद रही है और उसमें बड़ा बदलाव अंग्रेजों के आने के बाद आया । उन्होंने कई प्राचीन धार्मिक पुस्तकों जैसे भगवतगीता, रामायण, महाभारत आदि के उदाहरण देकर कहा कि इनके अनेक भाषायी अनुवादों ने पूरे देश को एक सूत्र में बाँधे रखा।

उन्होंने 19वीं शताब्दी के अंत में औद्योगीकरण के बाद साहित्य के क्षेत्र में आए बदलाव को रेखांकित करते हुए कहा कि अनुवाद का कोई विकल्प नहीं है । मलयालम अनुवादिका प्रोफेसर के. वनजा ने कहा कि अनुवाद एक सांस्कृतिक प्रक्रिया है जो दो भाषाओं और दो संस्कृतियों के बीच घटित होती है। उन्होंने कई विदेशी पुस्तकों के उदाहरणों से समझाया कि किसी भी भाषा की सार्वभौमिक रचना हर कहीं एक तरह का संदेश सभी संस्कृतियों तक पहुँचाती है।

उन्होंने वर्तमान में उपन्यासों को राष्ट्रीय रूपक मानते हुए उनके ज्यादा से ज्यादा अनुवाद किए जाने की बात कही जिससे राष्ट्रीय एकता को बल मिले। उर्दू हिंदी के जाने-माने अनुवादक डॉक्टर जानकी प्रसाद शर्मा कहा कि हम देश के हर रंग और सुगंध को अनुवाद के माध्यम से महसूस कर सकते हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जनजातीय लोक साहित्य, जोकि बहुत समृद्ध है, का भारतीय भाषाओं में ज्यादा से ज्यादा अनुवाद सामने आना चाहिए जिससे कि वास्तविक भारत को पहचान मिल सके।

उन्होंने अनुवाद को भारतीय भाषाओं की शब्द संपदा बढ़ाने वाला मानते हुए कहा कि हमें अनुवाद के महत्व को और व्यापक रूप में स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने अनुवाद को भाषाई क्षेत्रवाद को तोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के प्रतीक के रूप में भी देखा।