कोविड संकट के दौरान एक स्वच्छ वायु एजेंडे को पूरा करना: अवसर और चुनौतियां


राज्य सरकारों और नगरपालिकाओं द्वारा राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना और 15वें वित्त आयोग द्वारा दिए गए नए अनुदान का निरंतर और प्रभावी रूप से उपयोग करने की आवश्यकता है। निधियों का उपयोग सार्वजनिक सेवाओं, जैसे अपशिष्ट प्रबंधन और सार्वजनिक परिवहन, और सरकारी एजेंसीज की क्षमता में सुधार, के लिए अंततः होना चाहिए।


भास्कर ऑनलाइन भास्कर ऑनलाइन
मत-विमत Updated On :

शिबानी घोष और संतोष हरीश 
कोविड-19 महामारी ऐतिहासिक रूप से विघटनकारी रही है। इसके लगातार फैलते जाने से विश्व में मृत्यु और पीड़ा बढ़ रही है, जिसका निकट भविष्य में कोई अंत नज़र नहीं आ रहा है। महामारी के प्रभावों से संघर्ष करते हुए, हमें ये याद रखना चाहिए की भारत में वायु प्रदूषण से होने वाली दीर्घकालिक मृत्यु और रुग्णता कोविड-19 की तुलना में अधिक है। वायु प्रदूषण कोविड-19 जैसे संक्रमणों के जोखिम को भी बढ़ाता है। लॉकडाउन के प्रतिबंधों के कारण स्वाभाविक रूप से वायु की गुणवत्ता में सुधार आया है, लेकिन यह सुधार अस्थायी है। जैसे ही आर्थिक गतिविधियां फिर से शुरू होंगी, वायु प्रदूषण का संकट भी पुनः लौट आएगा। लेकिन अब हमारे समे एक महत्वपूर्ण सवाल है- क्या स्वच्छ वायु ले लिए आर्थिक गतिविधियों को रोकना वांछनीय है ? क्या वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सामाजिक एवं आर्थिक उथल-पुथल अनिवार्य है? हमारे विश्लेषण के अनुसार तो नहीं। महामारी ने वायु प्रदूषण का अधिक प्रभावी ढंग से जवाब देने और मौजूदा प्रयासों में तेज़ी लाने के लिए हमारे सामने नए रास्ते खोल दिए हैं। साथ ही, हमें उन नई चुनौतियों से सावधान रहने की जरूरत है जो महामारी हमारे वायु प्रदूषण को कम करने के प्रयासों के सामने लाएगी। 

कोविड-19 की तरह, वायु प्रदूषण भी भारत में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट पैदा कर रहा है। इसके प्रभाव तुरंत दृष्टिगोचर नहीं होते हैं, लेकिन समय के साथ संचित होते हैं। हेल्थ इफ़ेक्ट इंस्टिट्यूट के अनुसार  भारत में एक वर्ष में लगभग 12 लाख लोगों की समय पूर्व मृत्यु का कारण वायु प्रदूषण है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार इसका दुष्प्रभाव शरीर के लगभग सभी अंगों पर पड़ता  है। इसका प्रभाव जन्मपूर्व से ही शुरू हो सकता है और ऐसे जोख़िम का परिणाम आजीवन देखा जा सकता है। प्रदूषक तत्व कई अलग-अलग कारकों के माध्यम से वायुमंडल में उत्सर्जित और निर्मित होते हैं – कोई एक स्रोत, कोई एक एजेंसी जिम्मेदार नहीं है। प्रत्येक स्रोत के द्वारा निर्मित प्रदूषण को कम करने के लिए एक सतत्, बहु-वर्ष, संभवतः बहु-दशक, प्रयास और कई संरचनात्मक परिवर्तनों की आवश्यकता है। 

हमारे विश्लेषण के अनुसार महामारी के कारण वायु प्रदूषण में कमी लाने के लिए कई अवसर सामने आते है। इनमे से कुछ नए समाधानों को बढ़ावा देते हैं, और कुछ मौजूदा प्रयासों में तेज़ी लाते हैं। हमने कुछ एसे अवसरों की पहचान की है।    

पहला, गरीब कल्याण योजना पैकेज में शामिल तीन एलपीजी सिलेंडरों का आधार लेते हुए गरीब परिवारों को सामाजिक सुरक्षा पैकेज के हिस्से के रूप में एलपीजी सब्सिडी को शामिल करना सबसे महत्वपूर्ण अवसरों में से एक है। घर के अंदर के प्रभाव के अलावा, घरेलू प्रदूषण स्रोत बाहरी प्रदूषण जोख़िम का एक सबसे बड़ा योगदानकर्ता हैं। बढ़ी हुई और बेहतर लक्षित सब्सिडी प्रदान करना महत्वपूर्ण क़दम होगा ताकि गरीब परिवार एलपीजी का उपयोग खाना पकाने के लिए प्राथमिक ईंधन के रूप में कर सकें।

दूसरा, श्रम बाधाओं के कारण पंजाब और हरियाणा में धान की खेती में कमी देखी जा रही है जिसके कारण कृषि अवशेषों को खुले में जलाने की प्रक्रिया में भी सम्भवतः कमी देखी जाएगी। सरकार को इस बदलाव को बढ़ावा देना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसानों के लिए विकल्प (जैसे मक्का, कपास) वास्तव में व्यवहार्य हों। तीसरा, पुराने कोयला बिजली संयंत्रों को उपयोगनिवृत्त करना ताकि नए या कम प्रदूषण फैलाने वाले संयंत्र विद्युत की मांग के बड़े हिस्से को पूरा कर सकें, और इस क्षेत्र में वित्तीय संकट को सम्भावित रूप से कम किया जा सके। 

अंत में, राज्य सरकारों और नगरपालिकाओं द्वारा राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना (NCAP) और 15वें वित्त आयोग द्वारा दिए गए नए अनुदान का निरंतर और प्रभावी रूप से उपयोग करने की आवश्यकता है। उदाहरणतः निधियों का उपयोग सार्वजनिक सेवाओं, जैसे अपशिष्ट प्रबंधन और सार्वजनिक परिवहन, और सरकारी एजेंसीज की क्षमता में सुधार, के लिए अंततः होना चाहिए। 

लेकिन हमें आर्थिक सुधार और “ईज ऑफ डूइंग बिजनेस” की आवश्यकता का हवाला देते हुए पर्यावरण संरक्षण के उपायों और नीतियों को कमजोर करने वाले सरकारी फैसलों से सावधान रहने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, वर्तमान में विचाराधीन “ड्राफ़्ट पर्यावरण संघात निर्धारण अधिसूचना 2020” देश की वायु गुणवत्ता पर व्यापक प्रभाव डालेगा। यह पर्यावरण अनापत्ति प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान कर देता है, प्रभाव मूल्यांकन जांच की प्रक्रिया से गुज़रने वाले परियोजनाओं और गतिविधियों की श्रेणियों को भी कम कर देता है। ये लोक परामर्श की प्रक्रियाओं पर काफी हद तक अंकुश लगाता है, और इसमें प्रस्तावित उल्लंघनों से निपटने की प्रक्रिया अवैध है। और ये पर्यावरणीय अपराधियों को प्रभावी ढंग से बहुत कम या बिना किसी जुर्माने के क्षमा कर देने की अनुमति देगा।

2015 के उत्सर्जन मानकों का पालन करने में विफल रहे बिजली संयंत्रों की समय सीमा के विस्तार का सरकार द्वारा मौन समर्थन, एक दूसरा उदाहरण है। गैर-अनुपालन के कारण स्वास्थ्य लागत को अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है, और अनुपालन में देरी के लिए महामारी अब एक और आधार नहीं बन सकती है। अंत में, प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों से निगरानी, निरीक्षण और प्रवर्तन डेटा में अधिक पारदर्शिता का आह्वान अधिक जरूरी है ताकि दिन-प्रतिदिन नियमन में कमजोरियों को अनदेखा नहीं किया जा सके।

इसके प्रभावों के पैमाने को देखते हुए, कोविड-19 महामारी ने उचित रूप से एक तत्काल प्रतिक्रिया को आकृष्ट किया है। अब जब पूरा देश कोविड महामारी के समजिक और आर्थिक प्रभावों से उभरने की कोशिश में जुटा है, हमें याद रखना चाहिए की वायु प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिस पर तत्पर प्रयास करना अत्यावश्यक है।

(लेखक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली, के फेलो हैं।)