मंडी हाउस : लेखक-पत्रकार व रंगकर्मियों का मक्का मदीना


मंडी हाऊस के चाय कार्नर पर जेर ए बहस तेज थी। उस समय कांग्रेसी किस्म के व्यवस्था समर्थक पत्रकार हमारे निशाने पर रहते। उस दौर में कांग्रेसी पत्रकार कहलाना एक गाली जैसा था। जो स्थिति आजकल भगवा देशभक्त पत्रकारों की हो गयी है। उस समय सत्ता प्रतिष्ठान समर्थक पत्रकार हम लोगों को दोएम दर्जे का मानते थे। जैसे आज भक्त पत्रकार मानते हैं।


वीरेंद्र सेंगर
मत-विमत Updated On :

कल से ही मंडी हाउस की स्मृतियां धमा-चौकड़ी मचाए हैं। किस्सा-कोताह इतना कि अपन 1986 में बगैर किसी प्लानिंग के दिल्ली कूद आए थे। रविवार वाले वरिष्ठ पत्रकार राजकिशोर जी ने कोलकाता से परिवर्तन पत्रिका निकाली थी। कम संसाधनों में उसे रविवार की टक्कर का बनाना चाहते थे। दिल्ली में अलग से रिपोर्टर रखने की हैसियत नहीं थी। बोले थे, रिटेनर संवाददाता बन जाओ। बन गया। राजकिशोर भारी लिक्खाड़ थे। बेहतरीन पत्रकार लेखक थे। शुरू हो गयी गाड़ी। एक एक अंक में तीन चार स्टोरी लिखवा लेते। एक तरह से आधी मैगजीन हमीं दोनों भर देते। इसी चक्कर में पूरी दिल्ली मथ ड़ाली।

उन दिनों लेखक, पत्रकारों व सांस्कृतिक रुझान वालों के लिए रोज की मक्का मदीना मंडी हाउस ही था। हम जैसे फक्कड़ नव उदित पत्रकारों के लिए यह जगह बड़े सुकून वाली होती। अक्सर श्रीराम सेंटर के पास वरिष्ठ पत्रकार आनंद स्वरूप वर्मा जी की मंडली जुटती थी।किसी न किसी जन आंदोलन की बात चलती। वर्मा जी के नेतृत्व में लखनऊ से निकले चर्चित साप्ताहिक में काम कर चुका था। हम वर्मा की चहेते थे। वही संरक्षक की भूमिका में थे। धीरे धीरे उनकी प्रगतिशील मंडली दोस्त बन गयी। पत्रकारिता भी करता और जन आंदोलनों में शिरकत भी करता। भागदौड़ के लिए सस्ती सुलभ डीटीसी बस थी। कंधे पर एक झोला होता। पूरी दिल्ली को नापने का हौसला रहता।

कभी नाटक देखने का भी चस्का लग गया था। वह दौर ऐसा था, जिसमें जेएनयू वाले नामी लोग भी आते थे। वे नामी जरूर थे, लेकिन हमारी तरह उनके पास भी नामा नहीं होता। चिल्लर पूलकर चाय पीते। चाय पर चाय चलती रहती। वर्मा जी आते तो समोसा का दौर भी। सारे समय अमेरिकी सम्राज्यवाद से लेकर बिहार, तेलंगाना और यूपी की बढ़ती सांप्रदायिक सियासत आदि पर बहस होती रहती।

ये अलग तरह की मंडली थी। मोटे तौर पर वाम रुझानों वाली। कांग्रेस का दौर था। सत्ता संस्थानों में उसी की धमक थी। अयोध्या का मामला भी सुलगने लगा था। कांग्रेस राज में ही विवादित ढांचे का ताला खुलवाया गया था। राजीव गांधी का दौर था। उनके आसपास चंडाल चौकड़ी जम गयी थी। सैद्धांतिक विचलन जारी था। कांग्रेस ने हिंदू कार्ड बेशर्मी से खेलना शुरु किया था। फिर तो संघ परिवार ने खेला ही पलट दिया। मंडी हाऊस के चाय कार्नर पर जेर ए बहस तेज थी। उस समय कांग्रेसी किस्म के व्यवस्था समर्थक पत्रकार हमारे निशाने पर रहते। उस दौर में कांग्रेसी पत्रकार कहलाना एक गाली जैसा था। जो स्थिति आजकल भगवा देशभक्त पत्रकारों की हो गयी है। उस समय सत्ता प्रतिष्ठान समर्थक पत्रकार हम लोगों को दोएम दर्जे का मानते थे। जैसे आज भक्त पत्रकार मानते हैं।

सत्ता पक्ष के करीबी पत्रकारों को बहुत अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। कोई किसी मंत्री का करीबी होता, तो उसे संशय की नजर से देखा जाता था। आज तो पांसा पलट गया है। आप सत्तासुरों के जितने नजदीक हैं, वही आपकी मेरिट बन गयी है।

उन दिनों मंडी हाउस एरिया में साहित्यकारों की आमद बहुत थी। जेएनयू वाले कामरेड कवि गोरख पांडेय भी कभी कभी झोला लटकाए आ जाते थे। हम सब के बहुत चहेते थे। उस दोपहर में हल्की बरसात थी। गोरख भाई शायद किसी का इंतजार कर रहे थे। देखा, तो लपक कर मिले। बात होती रही। लेकिन उनकी निगाहें किसी को तलाश रही थी। पूछा क्या किसी का वेसब्री से इंतजार कर रहे हैं कामरेड? वे कुछ सकुचाए थे। उनके मुंह से इतना ही निकला था। मौसम खराब है शायद वो न आए। वो कौन थी या था? मैंनें नहीं पूछा क्योंकि वे वरिष्ठ थे। पता नहीं उस दिन वो कुछ उदास थे। चाय पर चर्चा चली। हम लोग पेड़ के चबूतरे में बैठ गये। इसी बीच उन्होंने झोले से एक कागज निकाला। मेरी उत्सुकता बढ़ी। वे बोले, साथी आप भी मेरी तरह ठेठ गांव की पृष्ठभूमि से आए हो। सो एक रोमांटिक कविता शेयर करता हूं। चौंकने की बारी मेरी थी। क्रांति के कवि और रोमांटिक कविता।वे भांप गये थे। बोले, साथी! मैं भी कामरेड के अलावा एक इंसान भी हूं। क्या मुझे प्रेम करने या रोमांटिक कविता लिखने का अधिकार नहीं है? अदंर का दर्द छलक आया। उनकी आंखें नम थीं। इन्हीं नम आंखों के साथ उन्होंने तीन रोमांटिक कविताएं सुनायीं। जिनमें प्रेम भी था। मजबूरियां भी थीं। कवि प्रेमिका से कहता है, तुम्हारे लिए ये सब सहज है। मेरे लिए नहीं। क्योंकि मैं कामरेड पहले हूं। इंसान बाद में। थोड़ा कुरेदा, तो बोले! साथी ये कविता कुछ साथियों को ही सुनायी है। वर्ना साथी कामरेड कह देंगे की कामरेड गोरख का वैचारिक विचलन हो रहा है। वे बुर्जुआ भावनाओं में फंस रहे हैं। मैने खूब हौसला बंदी की। चलने लगे, तो सकुचाते हुए बोले, रोमांटिक कविता के बारे में आनंद यानी वर्मा जी को मैं न बताऊं।

कुछ समय बाद ही मनहूस खबर मिली की कैंपस के आवास में ही उन्होंने आत्महत्या कर ली। चर्चाएं ये भी रहीं की वे किसी सुंदर स्त्री से मन ही मन प्रेम करते थे। वे उससे बोल भी पाए थे या नहीं। कोई पुख्ता तौर पर नहीं जान सका। लेकिन वे महीनों से डिप्रैशन में जरूर थे। अंत में अपनी ही वैचारिक जकड़न का शिकार हो गये। मंडी हाउस में अब वह पेड़ भी नहीं रहा, जहां कामरेड ने दिल की कविता सुनायी थी। वो चबूतरा भी विकास की भेंट चढ़ गया और गोरख भाई ! जैसा जहीन लोक कवि भी। सैल्यूट गोरख भाई! आप बहुत याद आते हैं ! नमन !

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)