लव जिहाद का सवाल और टीना डाबी का हाल


टीना डाबी ने न सिर्फ विवाह किया बल्कि अपने नाम के साथ खान भी जोड़ लिया। लेकिन साल भर के भीतर ही दोनों के संबंधों में खटास आनी शुरु हो गयी। दोनों ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से एक दूसरे को दूर कर दिया। टीना ने खान भी अपने नाम से हटा दिया। उसी समय ये संकेत मिल गया था कि दोनों के बीच सबकुछ ठीक नहीं रहा।


संजय तिवारी
मत-विमत Updated On :

शुक्रवार को राजस्थान से दो खबरें एक साथ आईं। पहली ये कि 2015 की आईएएस टॉपर रही टीना डॉबी खान ने अपने शौहर अतहर आमिर उल शफी खान से तलाक के लिए जयपुर की अदालत में अर्जी दिया है। दूसरी खबर ये कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने ट्वीट करके लव जिहाद के खिलाफ भाजपा सरकारों द्वारा प्रस्तावित कानून का विरोध किया है।

अपने ट्वीट में अशोक गहलोत ने लिखा है कि- “लव जिहाद भाजपा द्वारा निर्मित एक शब्द है जिसे भारत को विभाजित करने और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने के लिए प्रयोग किया जाता है। शादी निजी स्वतंत्रता का मामला है। इसलिए इस स्वतंत्रता के हनन के लिए बनाया जानेवाला कोई भी कानून असंवैधानिक होगा और कानून की किसी अदालत में ठहर नहीं सकेगा। मोहब्बत में जिहाद के लिए कोई जगह नहीं।”

अशोक गहलोत ट्वीट करने से पहले अपने ही राज्य में तैनात आमिर टीना की प्रेम कहानी को समझ लिए होते तो ऐसा ट्वीट करने से पहले जरूर सोचते कि मोहब्बत में जिहाद के लिए कोई जगह नहीं होती लेकिन मोहब्बत ही जिहाद हो तो?

टीना डाबी 2015 की आईएएस टॉपर थीं। उन्हीं के साथ आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण करनेवाले अतहर आमिर खान को टीना से मोहब्बत हो गयी। टीना ने मात्र 22 साल की उम्र में आईएएस की परीक्षा उत्तीर्ण कर लिया था। इसलिए हो सकता है वो शादी विवाह के लिए तैयार न रही हों। इसलिए अतहर आमिर की तरफ से दो बार प्रस्ताव मिलने के बाद भी उन्होंने विवाह के लिए हां नहीं कहा। लेकिन जब अतहर आमिर खान उनसे शादी के लिए अड़ा ही रहा तो 2018 में टीना डाबी ने धर्म समाज सबसे ऊपर उठकर आमिर से विवाह कर लिया।

उन्होंने न सिर्फ विवाह किया बल्कि अपने नाम में टीना डाबी के साथ खान भी जोड़ लिया। लेकिन साल भर के भीतर ही दोनों के संबंधों में खटास आनी शुरु हो गयी। दोनों ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से एक दूसरे को दूर कर दिया। टीना ने खान भी अपने नाम से हटा दिया। उसी समय ये संकेत मिल गया था कि दोनों के बीच सबकुछ ठीक नहीं रहा। खबरें तो यहां तक सामने आई कि दोनों ने अलग अलग रहने का फैसला कर लिया है।

खबरों के मुताबिक टीना डाबी अलग होने की जिद पर आ गयी थीं जबकि अतहर आमिर का परिवार चाहता था कि ये रिश्ता किसी तरह बचा लिया जाए। संभवत: इसी कारण अलगाव के बाद भी दोनों तलाक के लिए अदालत नहीं गये। अदालत गये अब करीब एक साल बाद नवंबर 2020 में। इसका मतलब है कि इस बीच मान मनौव्वल और समझौते की कोशिशें होती रहीं जो अंतत: विफल हो गयीं।

सवाल ये उठता है कि दोनों के बीच ऐसा क्या हुआ कि दोनों का संबंध दो साल में ही समाप्ति की ओर अग्रसर हो गया? स्पष्ट तौर पर कुछ कहना मुश्किल है। न तो टीना डाबी ने इस मामले में सार्वजनिक रूप से कुछ कहा है और न ही अतहर आमिर ने। लेकिन कयास लगाया जा सकता है कि संभवत जिस वैचारिक खुलेपन के माहौल में टीना डाबी पली बढ़ी उसका उन्हें अभाव दिखा। इस्लाम एक बंद निकाय की तरह है और इस बंद निकाय में महिलाओं की स्थिति बद ही नहीं बदतर है। ऐसे में हो सकता है टीना डाबी जैसी पढी लिखी और प्रगतिशील सोच की लड़की के लिए सामंजस्य बिठा पाना मुश्किल हुआ।

यहां एक बात और गौर करने लायक है। टीना डाबी जो कि राजस्थान में तैनात हैं इसी साल जब उन्होंने कार्यालय में प्रवेश किया तो विधिवत पूजा पाठ करवाया था। जब उन्होंने आईएएस टॉप किया था तब उन्हें अंबेडकरवादी विचारों से प्रभावित बताया गया था। सवाल ये है कि उनके व्यवहार में अचानक ये बदलाव क्यों आया? क्या उनका ये धार्मिक रुझान अतहर के परिवार में बिताये सालभर का नतीजा था?

आमतौर पर खुले विचारों वाले या फिर नास्तिकता की हद तक स्वतंत्र सोच रखनेवाले नौजवान शादी के लिए धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं का ध्यान नहीं रखते। हमारे देश में प्रगतिशील विचारधारा के नाम पर व्यक्ति को एक स्वतंत्र ईकाई के तौर पर ही परिभाषित किया जाता है। यहां तक कि हमारा संविधान भी राज्य और व्यक्ति के बीच में किसी अन्य व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता।

बच्चा जब तक नाबालिग है तब तक राज्य की संपत्ति है। उसके मां बाप भी संवैधानिक रूप से सिर्फ उसके गार्जियन की ही हैसियत रखते हैं। वही बच्चा बड़ा हो जाए तो वह अपना मालिक आप हो जाता है। अब राज्य उसका गार्जियन बन जाता है। इस संवैधानिक व्यवस्था में व्यक्ति न तो परिवार का हिस्सा माना जाता है और न ही समाज का।

लेकिन ये संवैधानिक सिद्धांत है। व्यावहारिक स्तर पर क्या ऐसा होना संभव है? नहीं। व्यावहारिक स्तर पर व्यक्ति परिवार, समाज का हिस्सा है और शादी विवाह उसकी सामाजिक व्यवस्था का ही हिस्सा है। यह राज्य व्यवस्था और संवैधानिक व्यवस्था के बीच ऐसा टकराव है जो तब सामने आता है जब किसी मामले में सामाजिक टकराव की स्थिति बनती है। जैसे इस समय लव जिहाद के मामले में भारत में उत्पन्न हो रही है।

अशोक गहलोत जो कह रहे हैं वह संवैधानिक व्यवस्था है। लेकिन क्या भारत में परिवार, जाति और धर्म का उन्मूलन हो चुका है जो हर नागरिक अपने आप को सिर्फ राज्य की संपत्ति मान ले? ऐसा है नहीं। सिद्धांत को व्यवहार बनाना भारत जैसे सामाजिक देश में संभव नहीं है। भारत में आई तमाम सरकारों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि राज्य और समाज को हमेशा टकराव की स्थिति में ही क्यों रखा जाए? क्या इनके बीच सामंजस्य नहीं बनाया जा सकता?

अगर संवैधानिक रूप से परिवार को मान्यता दे दी जाए तो ऐसी अनेक सामाजिक समस्याओं का अंत हो सकता है। राज्य के लिए जरूरी है कि वो अपने असीमित अधिकार को सीमित करे और समाज को उसकी शक्तियां संवैधानिक रूप से वापस करे, वरना लव जिहाद इस देश को सामाजिक रूप से निगल जाएगा। जिस अंतर्धामिक और अंतर्जातीय विवाह को राजनीतिक लोग समाधान मानकर प्रस्तुत करते हैं, असल में वही समस्या बन जाता है। और जिसके लिए समाज का मन मानस तैयार न हो उसको वैधानिक बनाकर भी सरकारें क्या हासिल कर लेंगी?

ये सारे उपाय सामाजिक समरसता के लिए जरूरी हैं लेकिन इसी सोच का अगर दुरुपयोग होने लगे तो क्या उस दुरुपयोग को रोकने का उपाय नहीं होना चाहिए? इसी सवाल पर अशोक गहलोत जैसे राजनेताओं को विचार करना चाहिए ताकि टीना डाबी और अतहर आमिर खान जैसे लोग सिर्फ इसलिए अलग न हो जाएं कि आखिरकार उनका धर्म आड़े आ गया।