मौजूदा किसान संसद और देश के किसान आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि


आजादी के बाद के दौर में इतने लम्बे समय तक चलने वाला यह संभवतः पहला किसान आंदोलन भी बन गया है। इस आंदोलन में शामिल किसान पहले ठंड, उसके बाद चिलचिलाती धूप वाली गर्मी और अब बरसात का कहर भी झेलने के लिए तैयार बैठे हैं।



देश की राजधानी दिल्ली की चारों दिशाओं से लगे उत्तर प्रदेश, हरियाणा और हरियाणा से लगे पंजाब राज्य के किसान केंद्र सरकार के तीन विवादास्पद किसान कानूनों के खिलाफ पूरे देश के किसानों का प्रतिनिधित्व करते हुए विगत 7 महीने से भी अधिक समय से शांतिपूर्ण धरने पर हैं। किसानों के ये धरने इन पड़ोसी राज्यों से  दिल्ली प्रवेश करने वाले तीन प्रमुख द्वारों सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर में आयोजित किये जा रहे हैं।

पिछले साल 2020 के सितम्बर के महीने में देश की संसद ने कोरोना कहर के चरम में रहने के दौरान तीन किसान विरोधी विधेयक पारित किये थे, उसके बाद ही किसान आन्दोलन का सिलसिला शुरू हो गया था। देश के किसान दिल्ली और दिल्ली के पड़ोसी राज्यों की मदद से दिल्ली के रामलीला मैदान अथवा ऐसे ही किसी सार्वजनिक स्थल पर सरकार के इन कानूनों के खिलाफ रैली का आयोजन करना चाहते थे, ताकि किसान अपनी बात कह सकें। इसके लिए देश भर के किसानों ने बहुत ही संयमित और अनुशासित अंदाज में दिल्ली की तरफ आना शुरू किया, लेकिन केंद्र की सरकार ने किसानों को दिल्ली प्रवेश करने की इजाजत नहीं दी, तो ऐसे में ये किसान गाजीपुर, सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर ही धरने पर बैठ गए।

यहां यह जानना भी जरूरी होगा कि देश के किसी इलाके से दिल्ली में प्रवेश करने के लिए उत्तर प्रदेश और हरियाणा के रास्ते ही आना पड़ता है। दिल्ली तीन तरफ से हरियाणा और एक तरफ से उत्तर प्रदेश से घिरी हुई है। इस सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण जानकारी यह भी है कि दिल्ली एक पूर्ण स्वायत्त राज्य नहीं, बल्कि एक केंद्र शासित क्षेत्र है, जिसे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली कहा जाता है। दिल्ली का संचालन पूरी तरह से केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन होता है और केंद्र द्वारा नियुक्त किये गए दिल्ली के उप राज्यपाल के पास दिल्ली के निर्वाचित  मुख्यमंत्री से कहीं अधिक प्रशासनिक अधिकार हैं और दिल्ली की अपनी पुलिस भी नहीं है। दिल्ली पुलिस सीधे केन्द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है।

बहरहाल ! नवम्बर 2020 से किसानों का यह शांतिपूर्वक धरना जारी है। आजादी के बाद के दौर में इतने लम्बे समय तक चलने वाला यह संभवतः पहला किसान आंदोलन भी बन गया है, इस अवधि में किसान आन्दोलनकारियों ने कड़ाके की ठंड का भी सामना किया और चिलचिलाती धूप वाली गर्मी का भी और अब बरसात का कहर भी झेलने को तैयार बैठे हैं, लेकिन मौसम के अलग-अलग थपेड़ों को सहज तरीके से सहने के साथ ही ये किसान अपने और दुःख – सुख भी यहीं आपस में मिल-जुल कर महसूस कर रहे हैं। लोहड़ी, बैसाखी, गुरु पूरब, होली, दीपावली, ईद, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, क्रिसमस और रक्षाबंधन सरीखे सभी राष्ट्रीय और धार्मिक पर्व भी ये किसान इन्हीं धरना स्थलों पर मनाते रहे हैं और यहीं इन किसानों को अपने उन साथियों को अंतिम विदाई भी देनी पड़ी, जो संघर्ष के दौरान किसी न किसी वजह से दम तोड़ गए थे।

किसानों ने धरना स्थलों को ऐसे जीवंत कर्म स्थलों में बदल दिया है, जहां केवल नारेबाजी और भाषणबाजी ही नहीं होती, बल्कि प्रेस कांफ्रेंस करके किसान अपना सन्देश संचार माध्यमों के जरिये देश-दुनिया तक पहुंचाते भी हैं। इतना ही नहीं, आन्दोलनकारी  किसानों की युवा पीढ़ी ने यहीं से यूट्यूब चैनल, साप्ताहिक समाचार पत्र और डेली न्यूज बुलेटिन प्रकाशित और जारी करने की व्यवस्था भी कर दी है। आन्दोलन में शरीक होने वाले लोगों और उनका हालचाल पूछने धरना स्थल पर आने वाले सभी लोगों को समय के हिसाब से चाय – नाश्ता और भोजन कराने के लिए लंगर की व्यवस्था भी है। आम जरूरत की छोटी-मोटी खरीदारी की व्यवस्था भी अस्थायी बाजार के माध्यम से यहां हो जाती है। समय-समय पर आंदोलनकारी किसान तरह-तरह के अंतरराष्ट्रीय दिवसों का आयोजन भी यहाँ कर लेते हैं, चाहे वह महिला दिवस ही क्यों न हो। ऐसे अवसरों पर उस दिन धरने का प्रभार महिलाओं को सौंप दिया जाता है। इसी तरह कई बार किसान संसद भवन के आसपास भी धरना प्रदर्शन करते रहते हैं।

किसान आन्दोलन को समय और अवसर के अनुरूप अलग-अलग तरीके से प्रस्तुत और प्रदर्शित करने की श्रृंखला के तहत ही गाजीपुर, सिंघु और टिकरी बॉर्डर पर धरना दे रहे आन्दोलनकारी किसानों ने किसान संसद के नाम से विरोध प्रदर्शन का एक नया और नायाब तरीका भी ईजाद कर लिया है। इसके तहत भारतीय संसद के मौजूदा मानसून सत्र के समानान्तर संसद भवन से दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित जंतर-मंतर में किसान संसद का आयोजन किया जाता है। निर्धारित कार्यक्रम के मुताबिक किसान संसद उसी समय पर और उतनी ही अवधि के लिए आयोजित की जायेगी, जितने समय और अवधि के लिए संसद के मानसून सत्र की योजना बनाई गयी है।

इस लिहाज से देखें, तो किसान संसद का आयोजन विगत 19 जुलाई से अगस्त की 13 तारीख यानी 13 अगस्त तक होना चाहिए, क्योंकि संसद सत्र का आयोजन इसी सत्र के बीच होना है। गौरतलब यह भी है की संसद के मानसून सत्र की शुरुआत 19 जुलाई से हुई थी और इसका समापन 13 को इसलिए भी होना है, क्योंकि 15 अगस्त को देश की आजादी की 75वीं सालगिरह के अवसर पर होने वाले कार्यक्रमों के लिए किए जाने वाले सुरक्षा इंतजामों के चलते संसद सत्र का संचालन व्यवहारिक रूप से भी संभव नहीं हो सकता।

दिल्ली की सुरक्षा व्यवस्था के लिए जिम्मेदार दिल्ली पुलिस, केन्द्रीय अर्ध सैनिक बल और गुप्तचर एजेंसियों ने किसान आदोलनकारियों को संसद के मानसून सत्र की पूरी अवधि के लिए तो जंतर मंत्र पर किसान संसद के आयोजन की अनुमति नहीं दी, लेकिन किसान आन्दोलन के अब तक के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को देखते हुए उनको विगत 22 जुलाई से 9 अगस्त के बीच 19 दिन की अवधि के लिए जंतर मंतर में किसान संसद के आयोजन की सशर्त अनुमति अवश्य दे दी। इन शर्तों में पहली शर्त यह है कि किसान संसद में दो सौ से अधिक किसान किसी भी हालत में वहां मौजूद न हों।

सुरक्षा बलों की दूसरी शर्त यह है कि किसान संसद में शामिल होने वाले किसान धरना स्थलों से ही जंतर मंतर आएं और संसद का समापन होने पर वापस धरना स्थल पर ही चले जाएं। किसान संसद में भाग लेने के लिए जंतर – मंतर आने वाले किसान किसान संसद शुरू होने के निर्धारित समय सुबह के 11 बजे से कुछ मिनट पहले ही वहां आएं और संसद के समापन के समय शाम 5बजे के तुरंत बाद ही वहाँ से चले भी जाएं। जंतर मंतर पर किसान संसद के लिए किसानों के आने – जाने की व्यवस्था निर्धारित बसों से ही की जाए तथा पुलिस की निगरानी में ही किसानों को वहां लाने और वापस ले जाने की व्यवस्था हो। इन नियमों का पालन करते हुए विगत 22 जुलाई से दिल्ली के जंतर – मंतर पर विशेष किसान संसद का आयोजन विधिवत किया जा रहा है।

पहले दिन गुरुवार को किसान संसद की कार्रवाई अनन्य कारणोंवश निर्धारित समय 11 बजे से करीब डेढ़ घंटे के बाद शुरू हो सकी, लेकिन उस दिन किसान संसद का समापन निर्धारित समय शाम 5 बजे ही हुआ और उसके बाद किसान अपनी संसद के अगले कार्य दिवस की तैयारियों के सिलसिले में वापस धरना स्थल पर चले गए। किसी तरह का कोई व्यवधान नहीं आया, तो किसानों के जंतर मंतर आने – जाने, वहां संसद की बैठकों का आयोजन करने का यह सिलसिला 9 अगस्त तक जारी रहेगा।

संयोग से 9 अगस्त की तारीख का देश की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी गजब का नाता है। यह वही तारीख है, जब 1942 में महात्मा गाँधी के आह्वान पर देश में, अंग्रेजों भारत छोड़ो, आन्दोलन की शुरुआत हुई थी। इस किसान आन्दोलन की एक खास बात यह भी है कि इसमें सिर्फ किसानों की परेशानियों से जुड़े मुद्दे ही उठाये जाते हैं और सरकार से उन मुद्दों को हल करने की मांग की जाती है। इस संसद की कार्यवाही का संचालन करने के लिए बाकायदा सदन के अध्यक्ष ( स्पीकर ) और उपाध्यक्ष ( डिप्टी स्पीकर ) की नियुक्ति भी की गई है।

उत्तर और दक्षिण भारत में किसान आंदोलन क्यों फैले?

कृषक आन्दोलन उत्तर भारत के साथ ही दक्षिण भारत में भी इसलिए फैले, क्योंकि महाराष्ट्र के पूना एवं अहमद नगर जिलों में साहूकार किसानों का शोषण कर रहे थे। इसके साथ ही सरकार ने रैय्यतवाड़ी व्यवस्था के अंतर्गत करों की दरों को बढ़ा दिया था। अमेरिका में नागरिक युद्ध की समाप्ति के समय बढ़ाये गये कर जब युद्ध समाप्ति के उपरान्त भी कम नहीं किये गए, तब किसानों का गुस्सा बढ़ा। इसी समय दिसंबर सन् 1874 में एक सूदखोर कालूराम ने किसान (बाबा साहिब देशमुख) के खिलाफ अदालत से घर की नीलामी की डिक्री प्राप्त कर ली। इस पर किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया। इसमें महाजन, साहूकारों के दुकान से सामान खरीदना, उनके घर काम करना तथा उनके खेतों में काम करने से किसानों ने इनकार कर दिया।

इस आंदोलन को शांत करने के लिए सरकार ने दक्कन कृषक राहत अधिनियम द्वारा किसानों को साहूकारों के विरुद्ध संरक्षण दिया। तब यह आंदोलन शांत हुआ। इसी तरह बिहार में तिनकठिया प्रणाली के खिलाफ शुरू हुए विरोध का भी अपना अलग ही महत्व है। यह आन्दोलन इसलिए शुरू हुआ, क्योंकि तिनकठिया प्रणाली के तहत चम्पारण के किसानों से अंग्रेज बागान मालिकों ने एक अनुबंध करा लिया था, जिसके अंतर्गत किसानों को जमीन के 3 ध् 20वें हिस्से पर नील की खेती करना अनिवार्य था। 19वीं शताब्दी के अंत में रासायनिक रंगों की खोज और उनके प्रचलन से नील के बाजार समाप्त हो गए। परन्तु बागान मालिकों ने नील की खेती बंद कराने के लिए किसानों से अवैध वसूली की।

इस आंदोलन में स्थानीय नेताओ ने गांधी जी को आमंत्रित किया। गांधी जी के आने के बाद यह आंदोलन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। सरकार तथा बागान मालिकों को किसानोंका पक्ष सुनना पड़ा। सरकार ने इस आंदोलन को शांत करने के लिए एक आयोग का गठन किया, जिसमंे गांधी जी को भी सदस्य बनाया गया और बागान मालिक अवैध वसूली का 25 प्रतिशत वापस करने पर विवश हो गए।

इसी कड़ी में मोपला किसान विद्रोह, खेड़ा किसान सत्याग्रह जैसे अनेक किसान आन्दोलन समय – समय पर होते रहे हैं। इन आन्दोलनों के माध्यम से किसानों की अपनी समस्याओं पर ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व की दूसरी समस्याओं पर भी चिंता व्यक्त की गयी थी और उनके समाधान की मांग तत्कालीन सरकारों से की गयी थी, जिनमें काफी हद तक सफलता भी मिली थी। उसी पृष्ठभूमि में जब आज के किसान आन्दोलन की तरफ नजर दौड़ाते हैं, तो ऐसा लगता है कि औपनिवेशिक काल की विदेशी और प्राचीन सामंती सरकारें किसान समस्याओं को लेकर तुलनात्मक रूप से आज सरकार से कहीं अधिक संवेदनशील रही होंगी। शायद इसीलिए उन सरकारों ने किसानों को अधिक समय तक संघर्ष करने पर विवश नहीं किया था और उनकी बातों पर गौर करते हुए समस्याओं के समाधान खोज लिए थे।

देश की आजादी से पहले उन्नीसवीं शताब्दी में और उसके बाद बीसवीं शताब्दी में भी आजादी से पहले और बाद में कई चर्चित किसान आन्दोलन इस देश में हुए हैं। इन आन्दोलनों में पबना आन्दोलन, चंपारण आन्दोलन के साथ ही मोपला किसान विद्रोह, खेड़ा किसान सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह, अखिल भारतीय किसान सभा के सत्याग्रह, तेभागा आन्दोलन, तेलंगाना आन्दोलन और प्रान्तों में किसानों की गतिविधियों के रूप में अलग अलग नाम और पहचान से जाना जाता है। इनमें तेलंगाना आन्दोलन की पहचान आधुनिक भारत के सबसे बड़े कृषक गुरिल्ला युद्ध के रूप में की जाती है। इस आन्दोलन ने देश के 3 हजार गांवों तथा 30 लाख की आबादी के  लोगों को प्रभावित किया था। आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में जो अब पूर्ण स्वायत्त राज्य का दर्जा हासिल कर चूका है, तब स्थानीय देशमुखों ने पटेल तथा पटवारियों की मिली-भगत से स्थिति में पर्याप्त वृद्धि कर ली।

इन देशमुखों को स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस के साथ ही निजाम की सरकार का भी संरक्षण प्राप्त था। इन देशमुखों ने किसानों तथा खेतिहर मजदूरों का भरपूर शोषण किया तथा इस क्षेत्र में इनके अत्याचारों की एक बाढ़ सी आ गयी। धीरे धीरे सामंती दमन तथा जबरन वसूली स्थानीय किसानों के भाग्य की नियति बन गये। सरकार ने आंदोलनकारियों के प्रति अत्यंत निर्दयतापूर्ण रुख अपनाया। अगस्त 1947 से सितम्बर 1948 के मध्य आंदोलन अपने चरमोत्कर्ष पर था। हैदराबाद विलय के संदर्भ में भारतीय सेना ने जब हैदराबाद की विजित कर लिया, तो यह आंदोलन अपने आप समाप्त हो गया। इस आन्दोलन के दौरान गुरिल्ला छापामारों (वेठियों) ने गांवों पर नियंत्रण स्थापित कर लिया तथा बेगार प्रथा बिल्कुल समाप्त हो गयी।

खेतिहर किसानों की मजदूरियां बढ़ा दी गयीं। अवैध रूप से कब्जा की गयी जमीन किसानों को वापस लौटा दी गयी। लगान की दरों को तय करने तथा भूमि के पुनर्वितरण हेतु अनेक कदम उठाए गये। सिंचाई-सुविधाओं में वृद्धि के लिए अनेक कदम उठाये गये तथा हैजे पर नियंत्रण के लिए प्रयास किये गये। महिलाओं की दशा में उल्लेखनीय सुधार आया। भारत की सबसे बड़ी देशी रियासत से अर्द्ध-सामंती व्यवस्था का उन्मूलन कर दिया गया। यही नहीं, इसी तेलंगाना आंदोलन ने भाषायी आधार पर आंध्र प्रदेश के गठन की भूमिका भी तैयार कर दी थी। इन आंदोलनों ने स्वाधीनता के उपरांत किये गये जमींदारी प्रथा उन्मूलन जैसे अनेक कृषि सुधार कार्यक्रमों को लागू करने के लिए बुनियादी आधार भी  तैयार किया था। पूरे देश में किसानों की मूलभूत समस्याएँ भी करीब – करीब एक जैसी हैं, इसलिए उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में देश की आजादी के पहले और बाद में किये गए इन किसान आन्दोलनों से किसानों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता भी बढ़ी।

ब्रिटेन में चर्चा, लेकिन देश की संसद मौन

प्रसंगवश एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि ब्रिटेन समेत दुनिया के अनेक देशों की संसद में तो किसी न किसी बहाने भारत के किसानों की समस्याओं पर चर्चा हो रही है, लेकिन हमारे देश की संसद इस मुद्दे पर मौन है। किसान आन्दोलनकारियों का मामना है कि वे अभी तक केंद्र और देश के अनेक राज्यों में सत्तारूढ़ भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के किसान विरोधी सांसदों और विधायकों का ही विरोध कर रहे थे, लेकिन अब उन सभी जन प्रतिनिधियों का विरोध करना शुरू कर दिया है, जो किसानों की समस्याओं से जुड़े मुद्दों को संसद और विधानमंडलों में नहीं उठाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि हमारी सरकार ही किसानों के मुद्दे पर संसद में चर्चा नहीं करवाना चाहती। किसान संसद में पहले दिन दिवंगत आन्दोलनकारी किसानों को श्रद्धांजली दी गयी और इसके साथ ही गिरफ्तार किसानों को अविलम्ब रिहा करने की मांग की गई।

संसद तक अपनी बात पहुंचाने का एक नायाब तरीका

किसान संसद का आयोजन शायद देश में पहली बार हो रहा है। अपने स्कूल-कॉलेज के दिनों में बाल – संसद, युवा संसद जैसे आयोजनों की बात सुनी भी थी और देखी भी थी। यही नहीं एक जागरूक छात्र के रूप में इन छात्र संसदों में कभी पक्ष और कभी  प्रतिपक्ष के सांसद के रूप में भाग लेने का मौका भी मिला है, लेकिन किसान इस तरह अपनी समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन का ऐसा नायाब तरीका भी खोज निकालेंगे, यह अहसास इससे पहले कभी नहीं हो सका था। इस बाबत स्वराज पार्टी के संस्थापक और पूर्व में आप के संस्थापकों में एक रहे किसान आन्दोलनकारी योगेन्द्र यादव का कहना था कि किसान जंतर मंतर पर यह दिखाने आये हैं कि वो मूर्ख नहीं हैं और उन्हें सब पता है कि सरकार उनसे जुड़े हुए मुद्दों को संसद में उठने ही नहीं देना चाहती, इसलिए उन्होंने अपनी ही संसद के माध्यम से अपनी बात उठाने और उनके समाधान के लिए उन्हें सरकार तक पहुंचाने का यह तरीका अपनाया है, जिसे किसान संसद नाम दिया गया है।

किसान अन्नदाता है, मवाली नहीं

किसान संसद ने मीनाक्षी लेखी को उनके मवाली वाले बयान का जवाब देने के अंदाज में साफ किया कि किसान मवाली नहीं हैं बल्कि किसान तो अन्नदाता है। किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि किसान खेती करने के साथ ही संसद चलाना भी जानता है, इसीलिए यहां आया है। किसान आन्दोलन आज जिस मुकाम पर पहुंच गया है, उससे इसकी राजनीतिक मजबूती और जरूरत का अहसास भी हो जाता है। किसान की नाराजगी किस तरह के राजनीतिक दलों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है इसका अंदाजा इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि पंजाब की शिरोमणि अकाली दल जैसी जो राजनीतिक पार्टी देश की आजादी के बाद पांच से अधिक दशक तक भाजपा के साथ लगी रही, उसने न केवल किसान विरोधी विधेयक संसद में रखे जाने वाले दिन ही इसका विरोध किया, बल्कि उसकी प्रतिनिधि के रूप में सांसद हर सिमरत कौर बादल ने केन्द्रीय मंत्री परिषद् से भी इस्तीफा दे दिया था।

बाद के दिनों में तो अकाली दल ने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से ही अलग होना ठीक समझा। यही वजह है कि अगले साल फरवरी – मार्च में होने वाले पंजाब विधानसभा के चुनाव में अकाली दल ने वहां सत्तारूढ़ कांग्रेस, भाजपा और आम आदमी पार्टी के साथ होने वाले चुनावी दंगल में बहुजन समाज पार्टी के साथ मिल कर शामिल होने का मन बनाया है। केंद्र सरकार के विवादास्पद कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों का जो आन्दोलन आज पूरे देश में जारी है, उस पृष्ठभूमि में यह जानना भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि हमारे देश में सत्ता के खिलाफ किसानों की नाराजगी और उस नाराजगी को व्यक्त करने के लिए आन्दोलन करने का सिलसिला औपनिवेशिक काल से ही चला आ रहा है। इतिहास गवाह है कि कई बार किसानों ने अपनी परेशानियों को लेकर आन्दोलन किए और कई बार किसान आंदोलनों ने राष्ट्रीय आंदोलनों की शून्यता को भरा है।

उदाहरण देकर कहा जा सकता है कि 1857 के विद्रोह से 1885 में कांग्रेस की स्थापना तक नील विद्रोह, पबाना विद्रोह तथा दक्कन विद्रोह हुए। किसान आंदोलनो ने महात्मा गाँधी, सरदार पटेल,राजेंद्र प्रसाद तथा जैसे नेताओं को जन नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित किया। उन्होने स्वतंत्रता उपरान्त कृषि सुधारों के लिए उपयुक्त वातावरण तैयार किया – स्वतंत्रता उपरान्त जमींदारी प्रथा का विनाश इसका एक उदाहरण माना जा सकता है। इन आंदोलनों ने किसानों तथा अन्य लोगों को उपनिवेशिक शासन के विरुद्ध प्रेरित किया। आधुनिक भारतीय इतिहास में किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि पर गौर करें, तो 1859 में बंगाल के गोविंदपुर गांव से शुरू हुए नील आन्दोलन से इसका आरम्भ माना जा सकता है।

बंगाल के किसान अपने खेतो में चावल की खेती करना चाहते थे, परन्तु यूरोपीय  उन्हें नील की खेती के लिए विवश कर रहे थे। इस स्थिति में स्थानीय नेता दिगंबर विश्वास तथा विष्णु विश्वास के नेतृत्व में किसानों ने विद्रोह कर दिया। इस आंदोलन में हिन्दू तथा मुसलमान सभी किसान सम्मिलित थे। अन्ततः सरकार को नील के कारखाने बंद करने पड़े तथा सरकार ने 1860 में नील आयोग का गठन कर जांच का आदेश दे दिया। आयोग का निर्णय किसानों के पक्ष में रहा।

इसी तरह 1873- 76 के दौरान जमींदारो द्वारा किसानों के शोषण के विरुद्ध आरम्भ हुआ था पबाना आन्दोलन। इसमें किसानों ने पबाना जिले के युसूफशाही परगने में किसान संघ का गठन किया। ईशान चंद्र राय और केशवचंद्र राय इस आंदोलन के प्रमुख नेता रहे। यह आंदोलन उपनिवेशवादी ताकतों को प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन देने वाले समाज के जमींदार तथा साहूकार तबकों के खिलाफ था। बंकिमचन्द्र चटर्जी, द्वारिकानाथ गांगुली जैसे नेताओं ने इस आन्दोलन का समर्थन किया था। इसी कड़ी में दक्षिण का चर्चित दक्कन विरोध भी अपनी एक खास पहचान रखता है।

किसान संसद के पहले दो दिनों की कार्रवाई
इसी कड़ी में किसान संसद के पहले दिन की कार्रवाई का संचालन अध्यक्ष की हैसियत से मार्क्सवादी पार्टी के पूर्व लोकसभा सांसद और वरिष्ठ किसान नेता हन्नान मोल्लाह ने किया था। किसान संसद की कार्रवाई के सफलतापूर्वक संचालन में अध्यक्ष हन्नान मोल्लाह को मदद करने की गरज से मंजीत सिंह राय को किसान संसद का उपाध्यक्ष चुना गया है। किसान संसद की कार्रवाई हर दिन सुबह 11 बजे राष्ट्रगान के समवेत स्वर से शुरू होती है और राष्ट्रगान के समवेत स्वर के साथ ही शाम को 5 बजे इसका समापन भी होता है।

देश की पहली, किसान संसद के पहले सप्ताह की कार्रवाई के पहले दो दिन गुरुवार 22 जुलाई और शुक्रवार 23 जुलाई को इसी तरह के अनुशासन में सम्पन्न हुई। इसी बीच सत्तारूढ़ भाजपा की सांसद और केन्द्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने विगत 26 जनवरी 2021 को गणतंत्र दिवस के मौके पर लालकिला परिसर में हुए घटनाक्रम को लेकर किसानों के बारे में मवाली जैसे शब्दों के साथ आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी थी।

भाजपा सांसद कौर केन्द्रीय मंत्री की इस कथित आपत्तिजनक टिपण्णी के विरोध में भी किसान संसद के पहले सत्र में चर्चा हुई थी। मीनाक्षी लेखी ने भाजपा मुख्यालय में पत्रकारों के चर्चा के दौरान इस तरह की टिप्पणी तब की थी, जब पत्रकारों ने उनसे किसान आन्दोलन के बारे में कुछ जानना चाहा था। पत्रकारों के पूछने पर उन्होंने कहा था, उनको किसान मत कहिये वो तो मवाली हैं। इसके साथ ही सुश्री मीनाक्षी ने आन्दोलन कर रहे किसानों के बारे में यह खुलासा भी किया था कि यह सब राजनीतिक एजेंडे के तहत हुआ था और आज भी हो रहा है। सभी लोग इस सच्चाई और एजेंडे से परिचित हैं। सब जानते हैं कि  26 जनवरी को लालकिले में क्या हुआ था?

(लेखक दैनिक भास्कर, नोएडा के संपादक हैं।)