किसानों को फिर चाहिए चौधरी चरण सिंह जैसा नेता


ऐतिहासिक किसान आंदोलन के चलते इस राह की ओर जाने वाले कानून फ़िलहाल वापस हो गए हैं.


वीरेंद्र सेंगर
मत-विमत Updated On :

पीएम की मंजिल तक वे जरूर पहुंचे थे लेकिन वे कभी सत्ता पुरुष नहीं बने. कल उनकी जयंती थी. उन्हें याद किया गया. ज्यादातर रस्म अदायगी के लिए. जबकि इस महा जन नायक को ज्यादा शिद्दत से याद किया जाना चाहिए. क्योंकि आजकल ग्रामीण अर्थव्यवस्था बहुत दयनीय हालत में है. किसानों..कृषि मजदूरों की हालत नाजुक है. कृषि सुधारों के नाम पर खेतीबाड़ी को बड़े कार्पोरेट घरानों के हाथों सौंपने की बेशरम कोशिशें हो रहीं हैं.

ऐतिहासिक किसान आंदोलन के चलते इस राह की ओर जाने वाले कानून फ़िलहाल वापस हो गए हैं. लेकिन खतरा टला भर है. खुली आर्थिकी के नाम पर बीजेपी और कॉंग्रेस के सोच में बुनियादी फर्क़ नहीं है. बस, कार्य शैली का फर्क़ है. ये अच्छी तरह समझ लेना चाहिए. कृषि अर्थव्यवस्था पर करीब 70 प्रतिशत आबादी आज भी निर्भर है. लेकिन हर साल किसान तबाह होता जा रहा है. सरकार के आकलन को ही मान लें, तो हाहाकार का सहज अनुमान लगाया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में 90 प्रतिशत आबादी भुखमरी में है. इसीसे सरकार इन्हें पांच किलो राशन मुफ्त दे रही है. चुनाव तक तेल, साबुन भी मुफ्त. अन्नदाता सरकारी खैरात के लिए लाइन में लगा रहता है. सरकार बेशर्मी से अपनी पीठ शाबासी में ठोंक रही है. देश के कोने-कोने में होर्डिंग्स लगे हैं कि मोदी जी..योगी जी ने बचा लिया. मुफ्त राशन बांटकर. धन्यवाद ! फलाने जी! इश्तहार लगे है. वो भी जनता के टैक्स से. यानी मियां की जूती और मियां की चांद!

यदि सरकार से ठेठ सवालः करो, तो सरकार की भगवा सेना आपको देश द्रोही करार करने को उद्धत रहती है. यानी अधिकार की बात करना , सबसे बड़ा गुनाह हो गया है. जबकि चौधरी साहब कहते थे कि किसान की एक आंख खेत पर रहे और एक दिल्ली और लखनऊ, मुंबई, कलकत्ते आदि राजधानियों पर रहे. यदि किसान इसमें चूका , तो पूंजीवाद के गुलाम राजनेता तबाही ला देंगे.
मैं लखनऊ से दिल्ली आया था 1986 में. चौधरी साहब के एक सिपहसलार के जरिए उनसे इंटरव्यू के लिए मिला था.

बातों बातों में पता चला कि वे मेरे स्वर्गीय पिताश्री बलवंत सिंह जी को जानते थे. उनकी मृत्यु 1975 में हो चुकी थी. वे आजीवन प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के जिला स्तरीय नेता रहे थे. ऐसे में लखनऊ में उनसे मुलाकातें हुई होंगी. इस परिचय के बाद उनकी खास अनुकम्पा मेरे जैसे अदना पत्रकार के प्रति हो गई थी. इतनी कि बीमारी के बाद भी मैं घंटों बतिया लेता था. वे मुझे virendrarही कहते. वे पुरानी यादें साझा करते रहते. मैं अच्छे श्रोता की तरह सुनता रहता.

बाद में वे ज़्यादा बीमार पड़ते रहे. मुझे मिलने की इजाजत मिल जाती थी. बाद मे उनकी धेवती विनीता सोलंकी का साथ मिला ,तो मैं एकदम पारिवारिक सदस्य जैसा हो गया. माता गायत्री देवी, विनीता की नानी थीं और मैं विनीता का पत्र karita में सीनियर. दरअसल, मैं संतोष भारतीय जी के नेतृत्व में निकलने वाले अखबार चौथी दुनिया का स्टार रिपोर्टर चंद महीनों में ही हो गया था. इस मेकिंग में सीनियर सम्पादक रामकृपाल जी और कमर वहीद नकवी जी की बड़ी भूमिका थी.

किस्सा कोताह ये कि इसी बीच चौधरी साहब की बड़ी बेटी की बिटिया , विनीता सोलंकी , चौथी दुनिया में प्रशिक्षु पत्रकार के रूप में आयीं. सम्पादक श्री भारतीय जी ने विनीता को ट्रेनिंग के लिए मेरे साथ लगा दिया. इस तरह मैं 12 तुगलक रोड ,यानी चौधरी साहब के यहां ज्यादा जाने लगा.

बात अंतिम मुलाकात की. उस दोपहर में चौधरी साहब आराम कर रहे थे. किसी से मिलना माना था. मैं माता गायत्री जी से बात कर रहा था. उन्होंने मेरी आवाज़ सुन कर बुलवाया. करीब दो घंटे तक बतियाते रहे. उन्होंने पूछा था कि उनकी कौन सी किताबें पढ़ी हैं?मैंने चार किताबों के नाम गिनाए. यह भी बताया कि अर्थशास्त्र का स्टूडेंट रहा हूं. तो फिर कृषि अर्थव्यवस्था में आने वाले खतरों को उन्होंने तफ़सील से गिनाया.ये भी कि कैसे उन्होंने कॉंग्रेस में रहते सहकारी खेती का जोरदार विरोध किया था?

कहा था, ये भारत में सफल नहीं होगी. किसान बर्बाद हो जाएगा. उन्होंने कॉंग्रेस के अधिवेशन में जोरदार भाषण किया था. इससे पीएम पंडित नेहरू गुस्सा गए थे. बाद में कुछ घंटे बाद ही पीएम ने उन्हें बुलवाया था. पिता की तरह प्यार करते हुए , बहस की. मेरी बात से कुछ सहमत हुए. ये भी कहा , तुम्हारी निडरता अच्छी लगी, नवजवान!बात सिद्धांत की हो, तो पंडित नेहरू से भी दबना नहीं. यह कहते हुए, वे भावुक हो गए थे. बोले , वे कितने बड़े दिल के लोग थे!

अब बौने स्वार्थ वाले नेता आ रहे हैं. मुझे डर लगता है कि ये सिद्धांत हीन नेता, कहीं देश ही ना बेच दें. क्योंकि पूँजीवाद किसी सीमा तक गिर सकता है. मैंने सवाल किया, कौन सी पार्टी बेहतर है?इस पर वे मायूसी से बोले थे, देखो!कोई दल देश को नहीं बचा पाएगा. केवल किसान और मजदूर में ही ज़ज्बा है ,तानाशाहों को भी काबू में करने का. मुझे उम्मीद है , यही मेहनत कश वर्ग ही लोकतंत्र के सच्चे पहरुआ साबित होंगे.

आज लगा कि चौधरी जी जैसे तीन चार दशक आगे की तस्वीर उस समय ही देख रहे थे. वे सचमुच दूर दर्शी थे. मैं कल ही ये पोस्ट लिखना चाहता था. लेकिन ऊहापोह में था ,कि वो सब बात तो ऑफ रिकार्ड थी. माफ कीजिए ! बड़े चौधरी साहब . मैं वादा खिलाफी कर रहा हूँ. लेकिन आप ने ही सिखाया था, बात देश हित की हो , तो सारी जंजीरों के बंधन तोड़ देना. यही पुण्य का तकाजा है. शत शत प्रणाम! बड़े चौधरी साहब!