मिशन तिरहुतीपुर डायरी : स्टडी सेन्टर नए रूप में

विमलकुमार सिंह
मत-विमत Updated On :

जून, 2021 की शुरुआत में मिशन तिरहुतीपुर का डेढ़ एकड़ का मैदान लगभग उजाड़ पड़ा हुआ था। उसमें न तो कोई बाऊंड्री थी और न ही कोई छत। बरसात के मौसम में वहां बच्चों को बुलाकर पढ़ाना असंभव सा था। गांव के भीतर बच्चों को जुटाने का विकल्प बरसात के कारण पहले ही खत्म हो चुका था। प्रायः मन में विचार उठता कि जैसे-तैसे करके जिओडेसिक डोम बनाने की प्रक्रिया शुरू करूं, लेकिन अपनी आर्थिक स्थिति देख सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता।

ऐसे में एक दिन कमल-नयन ने कहा कि क्यों न घास-फूस की एक मंडई बना ली जाए। इस प्रस्ताव से मैं बहुत उत्साहित नहीं था लेकिन कोई दूसरा उपाय न होने के कारण मैं उनको मना भी नहीं कर पाया। मेरे मौन को मेरी स्वीकृति मानते हुए कमल ने मंडई के लिए हाथ-पांव मारना शुरू कर दिया। मंडई की अधिकतर सामग्री उन्होंने गांव से मांगकर जुटा ली। कुछ सामान बाजार से खरीदना पड़ा। लेकिन उसका भी जैसे-तैसे इंतजाम हो गया और इस प्रकार 15 जून तक मिशन तिरहुतीपुर की जमीन पर एक नहीं दो मंडई बनकर तैयार हो गई। इससे हमारी तात्कालिक समस्या का समाधान हो गया। अब हम बच्चों को एक जगह जुटा सकते थे। मंडई हमें तेज बारिश से तो नहीं बचा सकती थी, लेकिन हां, धूप और छोटी-मोटी बारिश से कुछ बचाव जरूर हो गया था।

जनवरी से अप्रैल तक गांव के भीतर हमने जो स्टडी सेंटर चलाए थे, वे अपने आप में बहुत सफल थे, लेकिन जून में उन्हें जस का तस दुबारा शुरू करना बहुत उपयोगी नहीं होता। अब हम उस प्रयोग का एडवांस वर्जन लागू करना चाहते थे। कमल, हर्ष और मैंने मिलकर तय किया कि जनवरी में मिशन तिरहुतीपुर की डाक्यूमेंट्री फिल्म में जिस गुरुकुल का उल्लेख किया गया है, उस दिशा में अब कुछ कदम आगे बढ़ने की जरूरत है।

नई योजना पर अमल करते हुए कमल ने घर-घर जाकर उन बच्चों के नाम लिखे जो पढ़ाई को लेकर वास्तव में गंभीर थे। प्रायः 10 से 18 वर्ष के बीच वाले बच्चों को ही लिया गया। हमारा मन तो बहुत कर रहा था कि सभी बच्चों को बुलाया जाए, लेकिन कई व्यवहारिक कठिनाईयां थीं, जिनके चलते ऐसा करना फिलहाल संभव नहीं था। हमारी कठिनाई को गांव में भी लोग समझ रहे थे, इसलिए किसी ने छोटे बच्चों को बुलाने पर जोर नहीं दिया।

जब छोटी-मोटी सभी तैयारियां पूरी हो गईं तब 20 जून को गंगा दशहरा के दिन हमने गुरुकुल का शुभारंभ कर दिया। संयोग वश उस दिन मेरे गांव और तिरहुतीपुर के बीच बहने वाली बेसो नदी उफान पर थी। उसे किसी तरह पार करते हुए जब मैं और हर्ष गुरुकुल की मंडई में पहुंचे तो हमारे सामने कुल 34 बच्चे थे। स्टडी सेन्टर के इस नए स्वरूप से वे सब खुश थे। पहला दिन था, इसलिए मैंने कुछ हल्की-फुल्की बातें की और सूर्यास्त के आस-पास सबको छुट्टी दे दी।

अगले दिन से गुरुकुल में बच्चों की नियमित पढ़ाई शुरू हो गई। धीरे-धीरे हमारी भी एक दिनचर्या आकार लेने लगी। दिन में हम शिक्षा के बहुविध प्रयोगों और सिद्धांतों को समझते, उस पर चर्चा करते और शाम को 5 बजे से 7 बजे के बीच उनका बच्चों पर प्रयोग करते। रोज गुुरुकुल में जाकर पढ़ाने की जिम्मेदारी हर्ष की थी। मैं उन्हें पीछे से यथासंभव सहयोग दे रहा था। चूंकि अब सारे बच्चे एक ही जगह आ रहे थे, इसलिए हर्ष उन पर अच्छे से ध्यान दे पा रहे थे।

हम अपनी पहली वर्षगांठ तक अर्थात दशहरा तक केवल गुरुकुल के काम पर ही फोकस करना चाह रहे थे। लेकिन गांव में शराब की अवैध बिक्री और खुलेआम जूआ खेलना हमें खटक रहा था। इससे गुरुकुल के आस-पास का माहौल भी खराब हो रहा था। यह सब असहनीय होते हुए भी मैं शांत था। मैंने तय किया था कि इस मामले में मैं तभी हस्तक्षेप करूंगा जब गांव की ओर से कोई पहल होगी। अगस्त महीने के प्रारंभ में जब ग्राम प्रधान ने यह मुद्दा उठाया तो मैंने भी अपना निरपेक्ष भाव त्याग उनकी मदद करने का फैसला किया।

11 अगस्त को मैंने मिशन की ओर से एक चिट्ठी लिखी और कमल को कहा कि वे उसे स्वयं स्थानीय पुलिस थाने में देकर आएं। उनके साथ ग्राम प्रधान और अन्य गणमान्य लोग भी गए। मुझे आशंका थी कि स्थानीय पुलिस इसमें टालमटोल का रवैया अपनाएगी, क्योंकि उसकी प्राथमिकता में ऐसे काम नहीं आते।

कमल और अन्य लोग जब थाने से लौट कर आए तो पता चला कि थानाध्यक्ष का व्यवहार बहुत ही गैर जिम्मेदाराना और आपत्तिजनक था। यह सब सुन कर मन खिन्न हो गया। न चाहते हुए भी मुझे अपने कुछ मित्रों को फोन कर शिकायत करनी पड़ी। इसके बाद फोन काल्स का एक सिलसिला शुरू हुआ और कुछ ही घंटों में पुलिस का रवैया दोस्ताना और सहयोग पूर्ण हो गया। गांव में शराब की अवैध बिक्री और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों पर आनन-फानन में कार्रवाई भी हो गई। लेकिन इस सबसे मेरे मन की खिन्नता दूर नही हुई। मुझे मालूम था कि कुछ ही दिन में पुलिस अपने पुराने ढर्रे पर आ जाएगी।

पुलिस व्यवस्था की अपनी चुनौतियां हैं, लेकिन फिलहाल तो हमारे सामने गुरुकुल की व्यवस्था को चलाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती थी। 14 अगस्त को पता चला कि हर्ष को मोहाली जाना पड़ेगा क्योंकि उनके संस्थान (इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस एजूकेशन एंड रिसर्च) में अगले सत्र की पढ़ाई आनलाइन नहीं बल्कि ऑफलाइन होगी। पिछले दो महीने से हर्ष अकेले गुरुकुल चला रहे थे। उनका विकल्प न होने के कारण मैं थोड़ा चिंतित भी था कि आगे क्या होगा।

समय तेजी से बीत रहा था। साढ़े तीन महीने गांव में रहने के बाद एक सितंबर को हर्ष मोहाली के लिए रवाना हो गए। मैं भी सितंबर में लगभग गांव से बाहर ही रहा। मेरे और हर्ष की अनुपस्थिति में मिशन की सारी जिम्मेदारी कमल के कंधों पर आ गई। गुरुकुल में उन्हें अब केवल प्रबंधक की ही नहीं, बल्कि गुरु की भी भूमिका निभानी थी। शुरू में थोड़ी दिक्कत हुई, लेकिन धीरे-धीरे कमल ने स्वयं को नई जरूरत के हिसाब से ढाल लिया।

आज 10 अक्टूबर है। मेरी यह डायरी अब अतीत की यादों से निकलकर वर्तमान की ठोस जमीन पर आ चुकी है। कुछ ही दिनों में मिशन के एक वर्ष पूरे हो जाएंगे। इस अवसर पर मेरे पास गिनाने के लिए कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है। लेकिन इस बात का संतोष जरूर है कि मिशन के काम को लेकर मेरा उत्साह यथावत् बना हुआ है।

पिछले साल गांव में काम शुरू करते समय मन में उत्साह था, लेकिन साथ ही एक डर भी था। मुझे लगता था कि गांव की दिक्कतें कहीं मुझे वापस शहर जाने के लिए मजबूर न कर दें। इसी डर के कारण मैंने किसी से एक साल तक मिशन के लिए आर्थिक सहयोग नहीं मांगने का निर्णय लिया था। आज जब एक साल पूरा होने को है तो मैं कह सकता हूं कि मां भगवती की कृपा से मेरे लगभग सभी डर मिट चुके हैं। आशा है कि अब मेरे निर्णय किसी डर या आशंका से नहीं बल्कि शुभ संकल्प और दृढ़ विश्वास की शक्ति से संचालित होंगे।