अमेरिकी सैनिकों की वापसी का फैसला, क्या ट्रंप चीन और रूस की मदद कर रहे है?


अफगानिस्तान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी करने के ट्रंप के इरादे पर सवाल उठना कई कारणों से लाजिमी है। दरअसल दक्षिण कोरिया और नार्थ कोरिया का टकराव पुराना है।


संजीव पांडेय संजीव पांडेय
मत-विमत Updated On :

डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुनाव हार चुके है। लेकिन उनकी हरकतें उनकी फजीहत करवा रही है। पहली बार अमेरिकी कांग्रेस दवारा पारित एक बिल पर उनके लगाए गए वीटो को अमेरिकी कांग्रेस ने रद्द कर दिया है। ट्रंप ने 740 अरब डालर के यूएस डिफेंस स्पेंडिंग बिल ( नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट) पर वीटो लगाया था।

वीटो लगाकर ट्रंप ने संकेत दिए थे कि अमेरिकी राजनीति में अभी भी वो राष्ट्रपति की तरह ही व्यवहार कर रहे है। लेकिन कांग्रेस में उनके सहयोगियों ने उनके मंसूबे पर पानी फेर दिया। दरअसल डिफेंस स्पेंडिंग बिल अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत से पारित किया गया था।

ट्रंप को पहली बार उनकी रिपब्लिकन पार्टी के लोगों ने ही जोरदार झटका दिया है। उनके वीटो को रद्द करवाने में रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों ने सीनेट में अहम भूमिका निभायी। अमेरिकी कांग्रेस के प्रतिनिधि सभा में डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत है। जबकि सीनेट में ट्रंप की पार्टी का बहुमत है। लेकिन ट्रंप के वीटो पर दोनों जगह ट्रंप को झटका लगा।

आखिर ट्रंप यूएस डिफेंस स्पेंडिंग बिल से क्यों नाराज थे? यह सवाल लाजिमी है। ट्रंप का आरोप है कि यूएस डिफेंस स्पेंडिंग बिल में उनकी नीतियों की खिलाफत की गई है। उनकी विदेश नीति को नुकसान पहुंचाया गया, जिसे उन्होंने चार सालों में एक गति दी। ट्रंप का आरोप था कि बिल में उनकी अमेरिका फर्स्ट की नीति पर चोट पहुंचायी गई। दरअसल ट्रंप की नाराजगी इस बात पर ज्यादा थी कि बिल में विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर लिए जा रहे फैसलों पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया गया था। इससे ट्रंप खासे नाराज थे।

तो फिर आखिर ट्रंप किसके फायदे के लिए दुनिया के अलग-अलग इलाकों में तैनात अमेरिकी सैनिकों की वापसी के आदेश दे रहे थे? यूएस डिफेंस स्पेंडिंग बिल में अमेरिकी सैनिकों की वापसी को लेकर क्यों चर्चा की गई, जिसका आदेश ट्रंप दिए जा रहे है? निश्चित तौर पर यह बहस का विषय है। अमेरिका में ट्रंप की विदेश नीति पर बहस शुरू भी हो गई है। अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने साफ कहा है कि ट्रंप विदेशों में तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस स्वदेश बुलाए जाने का फैसला लेकर रूस की मदद करना चाहते है।

अमेरिकी डिफेंस स्पेंडिंग बिल में विदेशों से सैनिकों की वापसी को लेकर ट्रंप के फैसले पर सवाल उठाया गया है। विदेशों में तैनात सैनिकों की वापसी के आदेश पर शर्तें लगायी गई है। सैन्य विभाग को कहा गया है कि विदेशों मे तैनात सैनिकों की वापसी से संबंधित फैसले लेने से पहले एक सर्ट्रिफिकेट पेश किया जाए कि इस फैसले से अमेरिका के राष्ट्रीय हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। इससे ट्रंप खासे नाराज हो

गए। दरअसल ट्रंप अफगानिस्तान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी की बात कर चुके है। डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि अमेरिका अभी तक न खत्म होने वाला युद लड़ रहा है। इसका नुकसान अमेरिका को हुआ है। इसका वे लगातार विरोध कर रहे है। क्योंकि इससे अमेरिका का नुकसान हो रहा है। ट्रंप का तर्क है कि इसलिए वे जर्मनी, अफगानिस्तान औऱ दक्षिण कोरिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी चाहते है।

पर अफगानिस्तान, दक्षिण कोरिया और जर्मनी से अमेरिकी सैनिकों की वापसी करने के ट्रंप के इरादे पर सवाल उठना कई कारणों से लाजिमी है। दरअसल दक्षिण कोरिया और नार्थ कोरिया का टकराव पुराना है। दक्षिण कोरिया में अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम थाड तैनात है। चीन कई सालों से अमेरिकी मिसाइल डिफेंस सिस्टम थाड की दक्षिण कोरिया में तैनाती पर सवाल उठाता रहा है। थाड की तैनाती चीन अपने हितों के खिलाफ मानता है।

इस समय दक्षिण कोरिया में लगभग 28 हजार अमेरिकी सैनिक तैनात है। अगर ये सैनिक यहां से हटाए गए तो इसका सीधा लाभ नार्थ कोरिया के साथ-साथ चीन को होगा। अमेरिका में इस बात पर चर्चा है कि साउथ कोरिया से अमेरिकी सैनिकों के हटाए जाने की स्थिति में सीधा लाभ चीन को होगा। फिर आखिर ट्रंप चीन को लाभ क्यों पहुंचाना चाहते है?

यही नहीं अगर अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी होगी तो इसका लाभ अकेला तालिबान को ही नहीं होगा, बल्कि रूस और चीन को भी होगा। रूस लंबे समय से नाटो के खिलाफ सेंट्रल एशिया में मोर्चेबंदी करता रहा है। जर्मनी में भी अमेरिकी सैनिकों की तैनाती को रूस ने कभी पसंद नहीं किया। अगर जर्मनी से भी अमेरिकी सैनिकों की वापसी होती है तो इसका सीधा लाभ रूस को होगा।

अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों ने यूएस डिफेंस स्पेंडिंग बिल पर लगाए वीटो को रद्द करने के कई संकेत है। दरअसल ट्रंप के खिलाफ इस मसले पर डेमोक्रेट औऱ रिपब्लिकन एक साथ हो गए। दोनों सदनों में ट्रंप की खिलाफत जो बाइडेन की विदेश और सैन्य नीति की तरफ संकेत देते है। संकेत यही है कि बाइडेन की विदेश नीति में अमेरिकी सैन्य बेसों का महत्व कम नहीं होगा, बल्कि बना रहेगा।

शायद ट्रंप के उन फैसलों को बाइडेन बदल दे, जिसमें अफगानिस्तान औऱ सोमालिया से सेना की वापसी का निर्णय लिया गया। ट्रंप ने अफगानिस्तान में सेना की संख्या 2500 करने का फैसला लिया है। सोमालिया से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के आदेश दिए है। संकेत यही है कि बाइडेन अफगानिस्तान में भी अमेरिकी सैनिकों की मजबूत उपस्थिति बनाए रखेंगे।

तालिबान समेत कई दूसरे आतंकी गुटों को अमेरिका की बाइडेन सरकार बहुत हल्के में नहीं लेगी। बेशक बाइडेन तालिबान से बातचीत को जारी रखने के लिए अफगान सरकार से कहेंगे, पर तालिबान को बेलगाम नहीं होने देंगे। अफगानिस्तान में मानवाधिकारों, महिला अधिकारों औऱ लोकतंत्र को लेकर तालिबान की सोच पर बाइडेन की नजर रहेगी। अगर तालिबान अपनी सोच में बदलाव नहीं लाएगा तो बाइडेन सरकार ट्रंप की अफगान नीति में फेरबदल कर सकते है।