इतिहास की गलियों में भटकती कांग्रेस, सत्ताशीन होने के मुगालते में कांग्रेसी


बड़ी संकरी हैं इतिहास की वो गलियां जो 1885 को एक एक घटना से शुरू हुईं थीं और आज 135 साल बाद भी देश को यह याद दिलाती रहतीं हैं कि उस दिन एक विदेशी ने इस देश के हितों को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी संस्था का गठन किया था जिसका नाम कांग्रेस बना। कांग्रेस ने देश की आजादी का युद्ध लड़ा भी जीता भी और आजाद भारत में राज भी किया। आजादी के बाद तीस साल तक तो कांग्रेस ने केंद्र की सत्ता में लगातार और निष्कंटक राज किया ही था उसके बाद भी ज्यादातर समय देश में यही पार्टी राज करती रही है। आज यह पार्टी देश और देश के ज्यादातर राज्यों में विपक्ष की भूमिका का निर्वाह कर रही है लेकिन अभी भी इस पार्टी के ज्यादातर नेताओं को ज्यादातर समय यह मुगालता बना रहता कि वो आज भी सत्तासीन ही हैं।

कांग्रेस के नेताओं को गलतफहमी की इस नींद से जागना होगा और यह समझना होगा कि 19वीं सदी में जन्मी उनकी पार्टी आज 21वीं सदी के दौर से गुजर रही है। इस बीच एक पूरी सदी निकल चुकी है लिहाजा आज वैसी स्थितियां नहीं हैं जैसी उन्नीसवीं सदी के दौरान अंतिम डेढ़ दशक में थीं या फिर बीसवीं सदी में देश की आजादी के लिए किये गए आन्दोलन, आन्दोलन की सफलता से मिली आजादी से पहले और बाद के दस दशक के दौरान थीं। 135 साल के इस काल खंड को 25 वर्ष के एक कालखंड के वर्ग में विभाजित करके देखें तो तबसे अब तक 25 साल के पांच युग और दस साल तो बनते ही हैं। हर युग में बदलाव आया है।

यह बदलाव देशकाल, परिस्थिति में समयनुसार आये बदलाव की वजह से आया है और समय- समय पर पैदा होने वाली विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रख कर ही पार्टी नेतृत्व ने समय के हिसाब से सोच और नीतिगत बदलाव किये हैं। आज एक बार फिर कुछ इसी तरह का निर्णय लेने की जरूरत आ गई है। इस परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस के मौजूदा नेतृत्व और निर्णायक पदों पर आसीन इस पार्टी के आला नेताओं को इतिहास की गलियों में जाकर सत्य की खोज एक बार और करनी होगी ताकि इस देश का अनपढ़ और दिशाहीन मीडिया 135 साल पुरानी इस पार्टी को अपने हिसाब से हांकने की हिम्मत न कर सके जैसी हिम्मत मीडिया ने विगत सोमवार को आयोजित कार्यसमिति की बैठक के दौरान की थी।

कांग्रेस के इतिहास की बातचीत के दौर में एक बात सबसे पहले साफ़ हो जानी चाहिए कि इस पार्टी के अभी तक जितने भी अध्यक्ष हुए हैं उनमें देश के कमोबेस सभी इलाकों, धर्मों, सामाजिक वर्गों और जातीय पहचान का प्रतिनिधित्व रहा है। शुरू से लेकर आज तक कांग्रेस के जितने भी अध्यक्ष हुए हैं उनमें दक्षिण भारत के तमिल, मलयाली, तेलुगु, कन्नड़, पूर्वोत्तर भारत के बंगला, असमिया, पश्चिम भारत के मराठी और गुजराती भाषियों के साथ ही उत्तर भारत के हिंदी और उर्दू समेत अनेक भाषाओं के लोग शामिल हैं। धर्म के आधार पर बात करें तो हिन्दू, मुस्लिम, इसाई और पारसी से लेकर कई धर्मावलम्बियों को भी देश की इस सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी का अध्यक्ष पद सुशोभित करने का मौका मिल चुका है, इन नामों की शुरुआत 1885 में पहली बार कांग्रेस अध्यक्ष बने बंगाल के व्योमेश चन्द्र बनर्जी से होती है।

उन्नीसवी सड़ी का अंत होने तक, अगर बात करें तो सन 1900 में एन जी चंद्रावरकर के कांग्रेस अध्यख बनने तक उनके पूर्वाधिकारी के रूप में जो नाम सामने आते हैं उनमें-रमेश चन्द्र दत्त (1899), आनंद मोहन बोस (1898), सी. शंकरन नायर (1897), रहीमतुल्ला सयानी (1896), सुरेन्द्र नाथ बनर्जी (1895), आल्फ्रेड वेब (1894), दादाभाई नौरोजी (1893), उमेश चन्द्र बनर्जी (1892), पी आनंद चार्ल्स (1891), सर फिरोजशाह मेहता (1890), विलियम वेडरबर्न (1889), जॉर्ज यूल (1888) बदरुद्दीन तैय्यब्जी (1887) और दादाभाई नौरोजी (1886) के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

शुरू के डेढ़ दशक तक इस पार्टी की बागडोर संभालने वाले इन महानुभावों को कांग्रेस का संस्थापक अध्यक्ष भी कहा जा सकता है। कांग्रेस का यह दौर अलग किस्म का था इसलिए नीतियां और योजनायें भी अलग तरह की थीं। इसके बाद बीसवीं सदी के चार कांग्रेसी युग अपने आप में एकदम अलग तरह के थे। बाद के दौर में 1915 तक औसतन एक-एक साल के लिए कांग्रेस अध्यक्ष रहे पार्टी के नेताओं में दिनशा वाचा (1901), सुरेन्द्र नाथ बनर्जी, लाल मोहन घोष, हेनरी कपास, गोपाल कृष्ण गोखले, दादाभाई नौरोजी, रास बिहारी बोस, मदन मोहन मालवीय, विलियम वेडरबर्न, बिशन नारायण डार, रघुनाथ नरसिंह मुघोलकर, नवाब सैय्यद मुहम्मद बहादुर, सुरेन्द्र नाथ बोस और सत्येन्द्र प्रसन्ना सिन्हा (1915) के नाम उल्लेखनीय हैं।

इतिहास की दृष्टि से देखें तो 1916 से लेकर 1930 तक का समय देश और पार्टी के लिए बहुत महत्वपूर्ण घटनाक्रम का दौर था और पार्टी ने समय की परिस्थितियों के अनुरूप संगठन में बदलाव भी किया। इस लिहाज से देखें तो इस अवधि में कई लोगो को जरूरत के हिसाब से दो बार भी अध्यक्ष पद संभालना पड़ा था। इस काल में अम्बिका चरण मजूमदार, एनी बेसेंट, मदन मोहन मालवीय, सैय्यद हसन इमाम, मोतीलाल नेहरु, लाला लाजपत राय, विजय राघव चारी, हकीम अजमल खान, देशबंधु चितरंजन दास, मुहम्मद अली, अबुल कलाम आजाद, मोहन दास गांधी, सरोजिनी नायडू, एस श्रीनिवास आयंगर, मुख्तार अहमद अंसारी, मोतीलाल नेहरु और बाद में उनके बेटे जवाहरलाल नेहरु 1929-30 में कांग्रेस के अध्यक्ष बनाए गए थे।

1932 में मदन मोहन मालवीय एक बार बीर कांग्रेस अध्यक्ष बने। एक साल बाद नेली सेनगुप्ता को उनका उत्तराधिकारी बनाया गया था,इसके बाद 1934-35 में राजेंद्र प्रसाद, 36-37 में जवाहरलाल नेहरु, 38-39 में सुभाष चन्द्र बोस, 1940 में अबुल कलाम आजाद, 1947 में आचार्य कृपलानी, 48-49 में पट्टाभि सितारमैय्या, 1950 में राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन, 1951 में जवाहरलाल नेहरु, 1955 में यूएन ढेबर, 1959 में इंदिरा गांधी, 1962 में नीलम संजीव रेड्डी, 1964 में के कामराज, 1968 में एस निजलिंगप्पा,1969 में पी मेहुल, 1970-71 में बाबू जगजीवनराम, 1972-74 में डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए थे।

इसके साथ ही 1975 से 77 के बीच देवकांत बरुआ, 1978 से 1984 तक इंदिरा गांधी, 85 से 91 तक राजीव गांधी, 1992 से 96 तक पीवी नरसिंह राव और 1996 से 98 तक सीताराम केसरी ने भी कांग्रेस की कमान संभाली थी। तब से आज तक करीब 31-32 साल से सोनिया गांधी के हाथ में ही पार्टी की कमान है, बीच में दो साल के लिए जरूर राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था, इस लिहाज से देखें तो सोनिया गांधी सबसे अधिक समय तक कांग्रेस अध्यक्ष बने रहने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं।