नागरिकों द्वारा नागरिकों की जासूसी के मायने


भारत में क्राइम ब्रांच द्वारा “आई फोर सी” (I4C) का गठन और इतने बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों को जासूस में बदलने की क़वायद इन सबसे बहुत अधिक व्यापक और घातक प्रभाव वाली है। जैसा कि कुछ साथियों ने ध्यान दिलाया है कि भारत सरकार का ताज़ा क़दम “नाज़ी जर्मनी की याद दिलाता है जहाँ लोगों को जासूस बनने और अपने पड़ोसियों की जानकारी देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था ताकि समाज में लोगों के बीच दूरियाँ और बढ़ाई जा सकें।”


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मत-विमत Updated On :

भारत सरकार ने अपने नागरिकों से ‘साइबर अपराध स्वयंसेवक (Cyber Crime Volunteers)’ के लिए आवेदन माँगे हैं। ये स्वयंसेवक सरकार के आधिकारिक जासूस होंगे, जिनकी मदद से सरकार अपने विरोधियों पर लगाम कस सकेगी। सरकारी शब्दजाल से इतर सच यही है कि इनका उपयोग मुख्य रूप से राजनीतिक विरोधियों तथा सत्ताधारी समुदाय से अलग सामाजिक-सांस्कृतिक आचार-विचार रखने वालों को कुचलने के लिए किया जाएगा।

दो दिन पहले ही अख़बारों में इसके संबंध में ख़बरें आयी हैं। उम्मीद है कि नागरिक समुदाय व राजनीतिक दल इस परियोजना का विरोध करेंगे। विरोध कितना ज़ोरदार बन सकेगा, यह आने वाले कुछ दिनों में स्पष्ट होगा। लेकिन चूँकि इस विरोध से वोटों का कोई ख़ास गणित सधने की उम्मीद नहीं है, इसलिए आशंका यही है कि विपक्षी राजनीतिक दल शुरुआती हो-हल्ले के बाद इस पर कोई ख़ास ध्यान नहीं देंगे।

ऐसी स्थिति में आने वाले कुछ ही महीनों में ये जासूस सरकार के साथ मिलकर भारत में पहले से मरणासन्न अभिव्यक्ति की आज़ादी की क़ब्र खोद देंगे। भारत पहले से ही अभिव्यक्ति की आज़ादी और प्रेस की आज़ादी के मामले में दुनिया के सबसे फिसड्डी देशों में से एक है, जिसकी जड़ें यहाँ की ब्राह्मणवादी सामाजिक संस्कृति में रही है। 2020 में जारी अध्ययनों के अनुसार भारत व्यक्तिगत, नागरिक और आर्थिक स्वतंत्रता के मामले में 162 देशों में 111 वें स्थान पर तथा प्रेस की आज़ादी के मामले में 180 देशों में से 148वें पायदान पर है।

हम यहाँ संक्षेप में उपरोक्त परियोजना से संबंधित कुछ चीज़ों को देखने की कोशिश करेंगे।

साइबर क्राइम वॉलंटियर यानी अवैतनिक साइबर-जासूस

इसके लिए भारत के गृह मंत्रालय के साइबर क्राइम सेल ने ‘साइबर क्राइम को-आर्डिनेशन सेंटर’ की शुरुआत की है, जिसे संक्षिप्त रूप में ‘आई फोर सी’ (I4C) कहा जा रहा है। इस परियोजना के तहत कोई भी व्यक्ति ‘नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल’ पर स्वेच्छा से पंजीकरण कर कथित साइबर क्राइम की रोकथाम के लिए काम कर सकता है।

ये वॉलंटियर तीन प्रकार के होंगे – ‘अनलॉफुल कंटेट फ्लैगर’, ‘साइबर अवेयरनेस प्रमोटर’ और ‘साइबर एक्सपर्ट’।

‘अनलॉफुल कंटेंट फ्लैगर’ का काम होगा सोशल मीडिया समेत इंटरनेट पर कहीं भी मौजूद ग़ैर-क़ानूनी सामग्री की पहचान करना तथा उसके बारे में क्राइम ब्रांच को सूचित करना। ‘साइबर अवेयरनेस प्रमोटर’ महिलाओं, बच्चों और ग्रामीण इलाक़ों में रहने वाले लोगों के बीच साइबर क्राइम के बारे में जागरूकता फैलाएँगे तथा ‘साइबर एक्सपर्ट’ वायरस, क्रिप्टोग्राफ़ी आदि में सरकारी एजेंसियों की मदद करेंगे।

साइबर क्राइम ब्रांच ने अपने ‘नेशनल साइबर क्राइम रिर्पोटिंग पोर्टल’ पर ग़ैर-क़ानूनी कंटेंट की परिभाषा बताते हुए लिखा है कि निम्नांकित व्यापक श्रेणियाँ इसके अंतर्गत आएँगी :

1. भारत की संप्रभुता और अखंडता के ख़िलाफ़ जाने वाली बातें

2. भारत की रक्षा के ख़िलाफ़ (Against Defence of India) जाने वाली बातें

3. राज्य की सुरक्षा के ख़िलाफ़ जाने वाली बातें

4. किसी अन्य देश के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के ख़िलाफ़ जाने वाली बातें

5. सार्वजनिक व्यवस्था को समस्या में डालने वाली सामग्री

6. सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने वाली सामग्री, और

7. बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री

परियोजना के बारे में नेशनल साइबर क्राइम रिर्पोटिंग पोर्टल पर बताया गया है कि इसका सबसे “महत्वपूर्ण उद्देश्य एक ऐसे इकोसिस्टम का निर्माण करना है जिसमें साइबर अपराध की रोकथाम, उसका पता लगाने, जाँच करने और सज़ा देने-दिलाने (Prosecution) में शिक्षा-जगत (एकेडमिया), उद्योग जगत (इंडस्ट्री), जनता (पब्लिक) और सरकार (गर्वमेंट) को एक साथ” लाया जाएगा।

यहाँ एकेडमिया से मुख्य आशय उच्च शिक्षा जगत, और उद्योग जगत का मुख्य आशय सोशल-मीडिया प्लेटफ़ाफ़ॉर्मों को चलाने वाली व वेबसाइटों को होस्ट करने की सुविधा देने वाले टेक-जाइंट्स (फ़ेसबुक, ट्वीटर, गूगल, अमेज़न आदि) से है।

पोर्टल पर यह भी बताया गया है कि इन स्वैच्छिक जासूसों को कोई मेहनताना, या किसी प्रकार का पहचान-पत्र नहीं दिया जाएगा तथा कोई भी जासूस किसी भी रूप में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं करेगा कि वह इस प्रकार की परियोजना के लिए काम कर रहा है। परियोजना के हिस्से के रूप में उसे गोपनीय रूप से काम सौंपे जाएँगे, जिसके बारे में उसे कहीं भी ज़िक्र करने की मनाही होगी।

अगर किसी भी रूप में गोपनीयता भंग हुई तो उसे न सिर्फ़ परियोजना से हटा दिया जाएगा बल्कि उस पर दंडात्मक क़ानूनी कार्रवाई भी की जाएगी। यह कार्रवाई न सिर्फ़ केन्द्रीय स्तर पर होगी बल्कि अलग-अलग सूबों के स्तर पर गठित की जाने वाली साइबर क्राइम की इकाइयाँ भी गोपनीयता भंग करने वाले जासूसों के ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई शुरू कर सकेंगी।

इस पूरी क़वायद का स्पष्ट अर्थ है कि न सिर्फ़ राजनैतिक विरोधियों, और अलग विचार रखने वाले लोगों को इसके माध्यम से निशाना बनाया, डराया-धमकाया और दंडित किया जा सकेगा, बल्कि उन जासूसों को गोपनीयता-क़ानूनों के बंधन में बाँधकर पुलिस द्वारा इसके लिए उठाए गये हर ग़ैर-क़ानूनी क़दमों को छिपाया जा सकेगा।

ऐसे प्रयोग पहले भी हुए हैं। लेकिन पहले वे छोटे पैमाने पर ही संभव थे। मसलन, छत्तीसगढ़ में 2005 में शुरू हुआ सलवा जुडूम यानी शांति यात्रा, जिसमें सूबे की सरकार ने अपने नागरिकों को अन्य लोगों (जिन्हें सरकार माओवादी मानती थी) की हत्या के लिए हथियार तक दिये थे। इसी प्रकार पिछले साल उत्तर प्रदेश में ‘पुलिस-मित्र’ बनाए गये।

हाल ही में बिट्रेन के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स ने एक क़ानून को मंज़ूरी दी है, जिसमें सरकारी निकाय, सशस्त्र बलों और अन्य नियामक संस्थाओं को यह अधिकार है कि वे 16 से 18 वर्ष के किशोरों का उपयोग उनके माता-पिता व अन्य परिवारजनों की जासूसी के लिए अंडर-कवर ख़ुफ़िया एजेंट के रूप में कर सकते हैं।

लेकिन भारत में क्राइम ब्रांच द्वारा “आई फोर सी” (I4C) का गठन और इतने बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों को जासूस में बदलने की क़वायद इन सबसे बहुत अधिक व्यापक और घातक प्रभाव वाली है। जैसा कि कुछ साथियों ने ध्यान दिलाया है कि भारत सरकार का ताज़ा क़दम “नाज़ी जर्मनी की याद दिलाता है जहाँ लोगों को जासूस बनने और अपने पड़ोसियों की जानकारी देने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था ताकि समाज में लोगों के बीच दूरियाँ और बढ़ाई जा सकें।”

नतीजा क्या होगा?
इंडियन एक्सप्रेस समेत कई अन्य अख़बारों ने चिन्ता ज़ाहिर की है कि इस परियोजना के परवान चढ़ने पर भारत ‘पुलिस स्टेट’ बन जाएगा। लेकिन जैसा कि पहले कहा गया, यह यहीं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका उपयोग राजनैतिक आन्दोलनों के उभरने की संभावनाओं को कुचलने के साथ-साथ अल्पसंख्यक व समाज के अन्य कमज़ौर तबक़ों की भावनाओं, परंपराओं पर रंदा चलाने के लिए किया जाएगा।

धार्मिक पाखंडों और परंपराओं की अतार्किकता पर सवाल उठाने वाले, सांस्कृतिक-विविधता पर विवेकपूर्ण ढ़ंग से विचार करने की वक़ालत करने वालों को चुप करा दिया जाएगा।

गैर-कानूनी कंटेंट की परिभाषा के तहत, जिन चीज़ों (भारत की संप्रभुता और अखंडता, देश की सुरक्षा, राज्य-सत्ता की सुरक्षा, अन्य देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था और सांप्रदायिक सौहार्द्र) का उल्लेख किया गया है, वे सभी की सभी बहुत ही अस्पष्ट, अनिश्चित और विवादित हैं।

इन गोलमोल शब्दाडंबरों में हर उस सवाल को रोक देने की शक्ति निहित है, जिसे राज्य-सत्ता स्वयं अथवा कॉरपोरेशनों की सलाह पर देशद्रोह क़रार दे दे। परियोजना के ख़ाका में संकेत है, क्राइम ब्रांच इन जासूसों को उन विषयों की सूची देगा, जिनसे उस समय कथित तौर पर ‘देश को ख़तरा’ हो।

मसलन, संभव है कि शीघ्र ही इसका इस्तेमाल कोविड वैक्सीन पर उठने वाले सवालों को रोकने के लिए किया जाए। या अगर, यह परियोजना एक साल पहले लागू हुई होती तो ये जासूस मुझ जैसे लेखकों द्वारा कोविड पर लिखे गये लेखों को देश के लिए ख़तरा मानकर सरकार काे सूचित कर सकते थे।

अंतत: इस परियोजनाओं का दूरगामी और अधिक विध्वंसक परिणाम ज्ञान के विकास, समाज-सुधार आदि में बाधा के रूप में सामने आएगा। ज्ञान का विकास पूर्व निर्धारित सत्य के बीच से नहीं, बल्कि शंकाओं और सवालों के बीच होता है। इसी प्रकार, नयी स्थितियों से निपटने के लिए शासन-प्रशासन के अधिक कारगर रूपों की खोज की एक अहर्निश, स्वत:स्फूर्त प्रक्रिया जनता के बीच चलती रहती है। ऐसी प्रक्रियाओं की गति को बाधित करने की कोशिश समाज को किस दिशा में ले जाएगी, यह कहना कठिन है।

दूसरी ओर, सिर्फ़ कॉरपोरेशनों तथा शक्तिशाली सामाजिक ताक़तों द्वारा प्रायोजित ‘सत्य’ को प्रसार की इजाज़त होगी और आम जनता के ‘सत्य’, जिसे पहले से संदिग्ध बना दिया गया है, को बड़े पैमाने पर सामाजिक अपराध के रूप चिन्हित किया जाने लगेगा। सुधार की प्रक्रिया स्थगित होने लगेगी और सतह के नीचे गुप्त कुरीतियाँ जन्म लेने लगेंगी।

सरकार द्वारा जनता के सहयोग से, जनता के ख़िलाफ़ शुरू होने जा रही विश्व इतिहास की इस सबसे बड़ी परियोजना के ख़िलाफ़ अगर सिविल नाफ़रमानी शुरू हो तभी इसे रोका जा सकेगा, जिसकी संभावना अभी दूर-दूर तक नहीं दिखती है। लेकिन निश्चित ही, वह समय बहुत दूर भी नहीं है!

(प्रमोद रंजन असम विश्वविद्यालय के रवीन्द्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ़ लैंग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज़ में सहायक प्रोफ़ेसर हैं। यह लेख जनज्वार से साभार।)