बिहार चुनाव : नीतीश का नुक्सान ही बीजेपी का फायदा है


चुनाव में हार-जीत तो होती ही रहती है लेकिन तेजस्वी ने न केवल जातिवादी और साम्प्रदायिक राजनीति को नकार कर इस चुनाव में विकास और रोजगार का नया एजेंडा स्थापित किया बल्कि उन्होंने अपने माता-पिता के राजनीतिक प्रतिमानों को भी इस चुनाव में कोई अहमियत नहीं दी।



बिहार की 243 सदस्यीय विधान सभा के चुनाव संपन्न हो गए और नतीजे भी सामने आ गए हैं। नतीजे चाहे जो भी हों लेकिन इस चुनाव में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री द्वय लालू प्रसाद यादव और राबडी देवी के पुत्र तेजस्वी यादव नायक बन कर उभरे हैं। उनके अपने दम पर राष्ट्रीय जनता दल बिहार विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। यह कीर्तिमान भी उन्होंने तब बनाया जब उन्हें एक तरफ राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जंगलराज के नाम पर निशाने में ले रखा था तो दूसरी तरफ वो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र के निशाने पर थे।

गौरतलब है कि राज्य विधान सभा के चुनाव तीन चरणों में संपन्न हुए थे। पहले चरण का चुनाव पिछले महीने की 28 तारीख (28 अक्टूबर 2020 को हुआ था और आगले दो चरणों में 3 और 7 नवम्बर को राज्य विधान सभा के चुनाव संपन्न हुए थे। गत मंगलवार 10 नवम्बर 2020 को वोटों की गिनती का काम पूरा होने के बाद देर रात चुनाव परिणाम की घोषणा की गयी थी।

चुनाव नतीजों के मुताबिक़ बिहार की जनता ने एक बार फिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को सरकार बनाने लायक बहुमत दे दिया है और नीतीश कुमार एक बार फिर राज्य के मुख्य मंत्री बनेंगे। राजग के घटक दलों में भाजपा को नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यूनाईटेड) से ज्यादा सीटें मिली हैं लेकिन भाजपा चुनाव पूर्व किये गए वायदे के मुताबिक नीतीश के नेतृत्व में ही सरकार का गठन करने को तैयार है। उम्मीद की जानी चाहिए कि एक-दो दिन में बिहार की नई सरकार भी वजूद में आ ही जाएगी।

बिहार का यह चुनाव एक यादगार चुनाव बन गया है। वोटों की गिनती वाले दिन अंतिम समय तक यह एक रहस्य ही बना रहा कि इस बार किस गठबंधन की सरकार बनेगी। दोनों ही पक्ष के नेताओं की साँसें आखिर तक अटकी हुई थीं, दावे तो दोनों ही पक्ष के नेता कर रहे थे कि सरकार वही बनायेंगे लेकिन अन्दर ही अन्दर सभी नेताओं के दिल धक-धक कर रहे थे, भरोसा किसी को नहीं था। हालात बिलकुल वैसे ही बन गए थे जैसे क्रिकेट के टी-20 मैच में बन जाते हैं। अंतिम ओवर की अंतिम बाल फेंके जाने तक जो रोमांच क्रिकेट के टी- 20 मैच में दिखाई देता है बिलकुल वैसा ही रोमांच इस बार बिहार विधान सभा के चुनाव बाद हुई वोटों की गिनती के दौरान दिखाई दिया।

कांटे के संघर्ष में सत्तारूढ़ राजग को 125सीटें हासिल हुईं और विपक्षी महागठबंधन की झोली में 110 सीटें आयी। राजग से अलग होकर चुनाव लड़ने वाली चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) को केवल एक सीट से संतोष करना पड़ा है। राजग को जितनी सीटों पर जीत मिली है उसमें भजपा को नीतीश कुमार की पार्टी जद (यू) के कहीं ज्यादा सीटें मिली हैं फिर भी भाजपा ने चुनाव पूर्व किये अपने वायदे का सम्मान करते हुए नीतीश को ही मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है। नीतीश चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री तो जरूर बनेंगे लेकिन इस बार उनकी राह आसान नहीं होगी। उनको मुख्यमंत्री के रूप में हर फैसला लेने से पहले भाजपा आला कमान की इजाजत लेनी होगी। इस बार सुशासन बाबू काँटों का ताज पहने जा रहे हैं।

इस बार बिहार विधान सभा चुनाव के नतीजों ने यह साबित कर दिया है की चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का मुकाबला राष्ट्रीय जनता दल के 30 वर्षीय युवा नेता लालू पुत्र तेजस्वी यादव से था। विधान सभा चुनाव में जीती गयी सीटों का हिसाब लगाएं तो कहा जा सकता है की तेजस्वी कांटे के इस संघर्ष में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से कहीं आगे निकल गए हैं। यह चुनाव महागठबंधन ने पूरी तरह तेजस्वी के नेतृत्व में ही लड़ा था और तेजस्वी की पार्टी विधान सभा की 75 सीट जीत कर सदन की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने आयी है।

तेजस्वी की राह में कांटे ही कांटे थे।चुनाव प्रचार के दौरान पूरे समय उन्हें अपने पिता लालू प्रसाद यादव और माता राबडी देवी के मुख्य मंत्री काल में हुई कथित ज्यादतियों के लिए निशाने पर लिया जाता रहा।राज्य के मुख्य मंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री और दोनों ही पार्टियों के बड़े-बड़े नेताओं ने अपने भाषणों में तेजस्वी को एक तरह से जंगल राज का प्रतीक ही बना दिया था।उनके पास अपनी सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करने जैसा भी कोई साधन नहीं था जबकि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री अपनी-अपनी सरकारों की कथित उपलब्धियों के साथ मैदान में थे।

तेजस्वी ने देश की बड़ी कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन किया था लेकिन चुनाव में उसका प्रदर्शन बहुत ही निराशाजनक रहा। अगर कांग्रेस 15-20 सीटें और जीत लेती तो बिहार का पूरा परिदृश्य ही बदला हुआ होता। कांग्रेस के साथ ही महागठबंधन में वाममोर्चे को भी जगह दी गयी थी और वाम मोर्चे का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं अधिक उत्साह वर्धक और आशाजनक रहा लेकिन वाम मोर्चे की जीती हुई सीटों की संख्या इतनी ज्यादा नहीं है किउससे सरकार बनाने में कोई मदद मिले।

वामपंथी पार्टियों को समझौते के तहत महागठबंधन में जितनी सीटें चुनाव लड़ने के लिए दी गयीं थी उसमें ज्यादातर सीटों पर कामयाबी भी मिली। उधर दिखावे के लिए भाजपा के खिलाफ चुनाव में अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने वाले एआईएमयूएल नेता ओवेसी ने भी महागठबंधन को ही नुक्सान पहुंचाया है। ओवेसी की पार्टी के पांच विधायक जीते हैं अगर ये पार्टी भी महागठबंधन का हिस्सा होती तो अल्पसंख्यक वोटों का बंटवारा नहीं होता और राजद को मजबूती मिलती। कहना गलत नहीं होगा कि तेजस्वी हार कर भी इस चुनाव में नायक बन कर उभरें हैं।

चुनाव में हार-जीत तो होती ही रहती है लेकिन तेजस्वी ने न केवल जातिवादी और साम्प्रदायिक राजनीति को नकार कर इस चुनाव में विकास और रोजगार का नया एजेंडा स्थापित किया बल्कि उन्होंने अपने माता-पिता के राजनीतिक प्रतिमानों को भी इस चुनाव में कोई अहमियत नहीं दी। तेजस्वी पर अनपढ़ होने का आरोप भी वो लोग लगाते नजर आये जो खुद भी पढ़ाई में पीछे ही रहे हैं। उधर अपने स्वर्गीय पिता रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की गरज से राजग से अलग होकर चुनाव लड़ने वाले चिराग पासवान भी सीटों की संख्या के हिसाब से इस चुनाव में कुछ नहीं कर सके। उनकी पार्टी को केवल एक सीट कर ही संतोष करना पड़ा है। .

ये अलग बात है कि उनकी पार्टी को 6 प्रतिशत वोट के साथ राज्य के लगभग 25 लाख मतदाताओं का समर्थन अवश्य मिला है। कहना गलत नहीं होगा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नुक्सान करने के साथ ही इस चुनाव में चिराग और उनकी पार्टी दीपावली का दीपक जलाने के लायक भी नहीं रही।अपनी और नीतीश की पार्टी का नुक्सान करते हुए चिराग ने भाजपा को फायदा पहुंचा दिया। नीतीश का नुक्सान ही भाजपा का फायदा है।

लेकिन इस फायदे के बाद भी भाजपा विहार विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर कर सामने नहीं आ सकी जबकि इसके विपरीत तमाम तरह के झंझावातों का सामना करते हुए राजद के तेजस्वी ने अपनी पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित करवा ही दिया।

इस प्रसंग में कुछ विशेषज्ञों को ऐसा भी लगता है कि नीतीश की यह सरकार ज्यादा टिकाऊ नहीं होगी। जल्दी ही सत्तारुढ़ गठबंधन में नेतृत्व परिवर्तन की मांग उठने की संभावना से भी विशेषज्ञ इनकार नहीं करते। लिहाजा देर-सबेर गठबंधन के स्तर पर भी व्यापक फेर-बदल की संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि आने वाले समय में महाराष्ट्र जैसा कोई प्रयोग बिहार में भी हो। ऐसी किसी संभावना के चलते इस राज्य में भाजपा के खिलाफ तेजस्वी, नीतीश, कांग्रेस और वामदल एकजुट हो सकते हैं।