अर्णब गोस्वामी और सियासी खेल की पत्रकारिता


कुछ दिनों पहले एक और बड़े पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन पर मुकदमा हुआ है। वो मोदी विरोधी धड़े के बड़े पत्रकार हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि सियासी खेल में गर्दन तक शामिल इन बड़े पत्रकारों के पक्ष में बड़े वकील मैदान में उतरेंगे। कानूनी दांव-पेंच खेले जाएंगे। नैतिकता-अनैतिकता पर बहस होगी। और उन दोनों का कुछ भी बिगड़ेगा नहीं। इसके उलट अपने अपने धड़ों में वो और मजबूत हो जाएंगे। उनकी फंडिंग थोड़ी और बढ़ जाएगी।


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समरेन्द्र सिंह

अरब और रोम की सैर के बाद सभी अपने पसंदीदा सब्जेक्ट पर लौट आए हैं। मौलाना साद की तलाश तेज हो गई है। मतलब यथास्थिति बरकरार है। इस बीच एक बेहूदे और विकृत बड़े पत्रकार पर मुकदमा हुआ है। एफआईआर एक होती तो लगता कि मामला सियासी नहीं है। लेकिन जिस तरह सौ एफआईआर दर्ज हुई है उससे लगता है कि मामला पूरी तरह सियासी है। उस घृणित जीव का नाम है अर्णब गोस्वामी। उसने जो कुछ कहा है उसे किसी भी तरीके से जस्टिफाई नहीं किया जा सकता। लेकिन इसमें आसमान फट पड़ने जैसा कुछ भी नहीं है। सियासतदान आपस में ऐसा आरोप लगाते रहे हैं।

हमारे यहां अदालत के फैसले से पहले लोगों को हत्यारा और बलात्कारी बताने की सुदृढ़ और समृद्ध परंपरा रही है। हम बिना किसी ठोस सबूत के किसी पर भी आरोप लगा सकते हैं कि उसने देश बेच दिया है। संसद के सामने खड़े होकर पूरी संसद को चोर, लुटेरा और अपराधी करार दे सकते हैं। अर्णब भी सियासी खेल का हिस्सा है। अर्णब ने भी उसी परंपरा के तहत अपनी बात कही है। इसे इग्नोर करना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बीजेपी के ट्रैप में सब फंस गए। और मीडिया एथिक्स पर विमर्श होने लगा। पत्रकार का धर्म क्या होना चाहिए वगैरह- वगैरह।

उधर कुछ दिनों पहले एक और बड़े पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन पर मुकदमा हुआ है। वो मोदी विरोधी धड़े के बड़े पत्रकार हैं। मुझे पूरी उम्मीद है कि सियासी खेल में गर्दन तक शामिल इन बड़े पत्रकारों के पक्ष में बड़े वकील मैदान में उतरेंगे। कानूनी दांव-पेंच खेले जाएंगे। नैतिकता-अनैतिकता पर बहस होगी। और उन दोनों का कुछ भी बिगड़ेगा नहीं। इसके उलट अपने अपने धड़ों में वो और मजबूत हो जाएंगे। उनकी फंडिंग थोड़ी और बढ़ जाएगी।

लेकिन मुझे डर है कि बड़े लोगों के इस खेल में जमीन पर काम कर रहे कई छोटे पत्रकार नाप दिए जाएंगे। जम्मू-कश्मीर में भी कुछ पत्रकारों पर कानूनी तलवार लटक रही है। एक तो कई महीने से जेल में है। उन पर मेन स्ट्रीम में कहीं कोई चर्चा नहीं है। महाराष्ट्र में एक क्षेत्रीय चैनल के पत्रकार को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया। उसका कोई कसूर नहीं था। लेकिन उस पर कोई राष्ट्रीय बहस नहीं हुई। ऐसे ही सेफ जोन से बाहर काम में जुटे बहुतेरे प्रतिबद्ध और ईमानदार पत्रकार जिला स्तर पर ही नाप दिए जाएंगे, ऐसी आशंका बढ़ गई है। खतरा बढ़ गया है। इसके साथ ही आम आदमी की आजादी और कम हो जाएगी। हमारे यहां फ्री स्पीच पहले भी कभी फ्री नहीं थी। कुछ कमीनों के चक्कर में अब और गुलाम हो जाएगी।

एक बात और अपने अपने सुरक्षित जोन में बैठ कर जो कोई भी सत्ता तंत्र के द्वारा इस तरह की हरकत का समर्थन करता है, दरअसल वो अपने लिए गड्ढा खोद रहा होता है। देर-सबेर इसकी कीमत तो उसको भी चुकानी होगी। अभिव्यक्ति की आजादी (फ्री स्पीच), एक ऐसा अधिकार है जिससे आम आदमी को ताकत मिलती है। किसी मूर्ख या किसी धूर्त की किसी बेहूदी हरकत के लिए इस अधिकार से समझौता नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि मेरी बात अभी आपको समझ में नहीं आए। लेकिन मैं ये दावे से कहता हूं कि देर से ही सही समझ में आएगी जरूर।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और लेख में व्यक्त विचार निजी है।)