एलोपैथी बनाम बाबा रामदेव…

संत समीर
मत-विमत Updated On :

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बौखलाया हुआ है। इसके महासचिव डॉ. जयेश एम. लेले का तेवर देखकर लगता है जैसे कि वे स्वामी रामदेव को सामने पा जाएँ तो कच्चा चबा जाएँगे। स्वामी रामदेव के ख़िलाफ़ राजनीतिक गलियारों से लेकर अदालत तक अभियान चलाया जा रहा है। मैं आजकल टीवी वग़ैरह देख नहीं पा रहा, तो पहले मुझे बस दूर-दूर से उड़ती-पड़ती जानकारी मिली थी। परसों शाम को जाकर कहीं वह वीडियो सुन पाया, जिस पर विवाद है। शुरू में मैंने भी सोचा था कि हो सकता है जोश-जोश में स्वामी रामदेव कुछ ज़्यादा बोल गए हों, पर इस वीडियो में वे पूरी तरह सही दिखाई दिए। मुझे नहीं लगता कि उनको सफ़ाई देने या माफ़ी माँगने की ज़रूरत थी।

पहले ही स्पष्ट कर दूँ कि मैं हमेशा से हर पैथी की अच्छी चीज़ों का समर्थन करता रहा हूँ। एलोपैथी की आपात् स्थिति को सँभालने की ख़ूबी अद्भुत है और यह मानवता के लिए इसकी महान् देन है, पर यह भी एकदम सच है कि कोरोना के मामले में इसकी एक-एक कर ज़्यादातर दवाएँ फेल साबित हुई हैं। अगर स्वामी रामदेव ने यह बात सीधे कह दी तो इसमें ग़लत क्या है? मैं साल भर से कोरोना मरीज़ों के इलाज के काम में लगा हुआ हूँ और साफ़ देख रहा हूँ कि लोग बीमारी से कम बीमारी के ग़लत इलाज से ज़्यादा मर रहे हैं। यह इससे भी साबित होता है कि होम्योपैथी और नेचुरोपैथी में गम्भीर मरीज़ भी आसानी से बच रहे हैं।

यह रहस्य भी समझिए कि नेचुरोपैथी और होम्योपैथी वालों के लिए मास्क जैसी चीज़ों का कोई मतलब नहीं है। कारण साफ़ है कि ये दोनों पैथियाँ किसी वायरस या बैक्टीरिया को ख़तरा नहीं मानतीं। वायरस या बैक्टीरिया लाखों-करोड़ों की सङ्ख्या में हमारे शरीर में अन्दर-बाहर होते ही रहते हैं, वे ख़तरा तभी बनते हैं, जब हम अपनी इम्युनिटी कमज़ोर करके अपने भीतर उनको पनपने का माहौल देते हैं। वायरस और बैक्टीरिया के बारे में यह ज़रूर समझना चाहिए कि एक स्वस्थ शरीर के लिए इनकी मौजूदगी ज़रूरी है, क्योंकि माहौल में वायरस और बैक्टीरिया न हों तो हमारे शरीर में रोगों से लड़ने की इम्युनिटी विकसित ही नहीं हो सकती। यह भी समझिए कि सङ्क्रमण हर तरफ़ फैला हुआ है, पर होम्योपैथी और नेचुरोपैथी के डॉक्टर कोरोना की वजह से नहीं मर रहे। मरने वालों में एलोपैथी के डॉक्टरों की सङ्ख्या बहुत बड़ी है। बिस्वरूप रॉय चौधरी के सैकड़ों एनआईसी एक्सपर्ट इलाज के दौरान कोई मास्क नहीं लगाते और न ही मेरे जैसे लोग होम्योपैथी से इलाज करते हुए मास्क की ज़रूरत महसूस करते हैं।

एलोपैथी वाले कह रहे हैं कि स्वामी रामदेव का कहना ग़लत है कि एलोपैथी दवाएँ फेल हुई हैं। एलोपैथ तर्क दे रहे हैं कि ये दवाएँ काम नहीं कर रही थीं, इसलिए इन पर रोक लगी। एक डॉक्टर के मुँह से जब यह बात मैंने सुनी तो मन में यही आया कि इन महोदय के गाल को थप्पड़ से सहलाना चाहिए। ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि दवा काम नहीं कर रही, तो क्या यह उसका फेल होना नहीं हुआ? दवा काम न करे और मरीज़ मर जाय, तब भी क्या दवा पर पास का तमग़ा लगा देना चाहिए? वास्तव में एलोपैथी दवाएँ सिर्फ़ फेल ही नहीं हुई हैं, बल्कि ये स्पष्ट तौर पर मरीज़ों को नुक़सान पहुँचा रही थीं और इनकी वजह से एक-दो नहीं, लाखों लोगों की जान चली गई है। सही कहा जाय तो एलोपैथी के डिग्रीधारी डॉक्टर कोरोना के इलाज में नीम-हकीमों के भी बाप निकले हैं। वाहियात ढङ्ग से स्टेरॉयड, एण्टीबायोटिक से लेकर कैंसर तक की दवाएँ खिला-खिलाकर लोगों की इम्युनिटी इतनी ख़राब कर दी कि ब्लैक फङ्गस भी महामारी की शक्ल लेता दिखाई देने लगा।

ईमानदारी से इस पर शोध हो तो कुछ दिनों बाद यह पूरी तरह सच साबित होगा। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि मैंने तमाम मरीज़ों की अनाप-शनाप एलोपैथी दवाएँ बन्द करवाईं और इसके बाद होम्योपैथी देकर उनको ख़तरे से बाहर किया। यह बात अब स्पष्ट हो चुकी है कि एण्टीबायोटिक और एस्टेरॉयड के अन्धाधुन्ध इस्तेमाल के कारण तमाम लोगों की इम्युनिटी समाप्तप्राय हुई और वे ब्लैक फङ्गस जैसी दुर्लभ बीमारी के शिकार हुए। कल के ही अख़बार में वैज्ञानिक शोध की एक ख़बर है–‘एण्टीबायोटिक के बेताहाशा इस्तेमाल से पैदा हुआ सुपरबग।’ इस बग से पीड़ित साठ प्रतिशत लोगों की मौत हो गई।

मतलब यह कि एक साधारण बीमारी, जिसका इलाज होम्योपैथी और नेचुरोपैथी में स्पष्ट रूप से मौजूद था, उसके लिए आपने उस एलोपैथी में इलाज करने की अनिवार्यता बनाई, जिसमें इस बीमारी की कोई दवा ही नहीं थी। नतीजतन, ग़लत इलाज का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ कि लाखों लोग मौत के मुँह में चले गए। भ्रम फैलाया गया कि लोगों की मौत बीमारी से हो रही है, जबकि लोग ग़लत इलाज की वजह से मर रहे थे। मज़ेदार यह भी कि यह कहकर सारा दोष जनता के सिरे डाल दिया जा रहा है कि लोग मनमाने ढङ्ग से एण्टीबायोटिक और एस्टेरॉयड खाकर परेशानी में पड़ रहे हैं, जबकि सच यह है कि आम लोग अगर अपनी मनमानी कुछ दवाएँ खाते भी हैं तो वे केवल ‘पैरासीटामाल’ और ‘डोला’ जैसी इक्का-दुक्का दवाएँ हैं।

एण्टीबायोटिक और एस्टेरॉयड का प्रिस्क्रिप्शन डिग्रीधारी डॉक्टर लिख रहे हैं। डॉ. के. के. अग्रवाल जैसे बड़े डॉक्टर सबसे सस्ते एस्टेरॉयड को रामबाण की तरह प्रस्तुत कर रहे थे, पर अन्तिम सच यही है कि यह उनकी भी जान नहीं बचा सकी। मैंने ऐसे-ऐसे प्रिस्क्रिप्शन के पर्चे देखे हैं और उन्हें सख़्ती से रुकवाया है, जिन पर डॉक्टरों ने ढेर सारी कैंसर और एड्स की दवाएँ लिख रखी थीं। सच्चाई यही है कि एलोपैथी दवाएँ क़ायदे से फेल हुई हैं, पर इसे सीधे स्वीकार नहीं किया जा रहा। बावजूद इसके सच तो सच ही है, इसे स्वीकार करने में क्या परेशानी? हाँ, अगर एलोपैथी के ख़िलाफ़ झण्डा-बैनर कोई इसलिए उठाता है कि उसे भी अपनी दवाएँ बेचनी हैं या अपना कोई स्वार्थ साधना है, तो इसे मैं ज़रूर ग़लत मानता हूँ।

जो भी हो, इसीलिए कहता हूँ कि स्वामी रामदेव जैसे लोग कुछ आवाज़ उठाएँ तो कितना भी अनसुना किया जाए, हड़कम्प मचे बिना नहीं रहेगा। मेरे जैसे लोगों का दायरा सीमित है, पर स्वामी रामदेव को करोड़ों क्या अरबों लोग जानते हैं। मैं लगातार लिख-बोल रहा हूँ कि पैथियों की सीमाएँ ख़त्म करने की ज़रूरत है और यह भी कि जिस एलोपैथी को वैज्ञानिक पद्धति के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, उसका वास्तव में काफ़ी हिस्सा घोर अवैज्ञानिक है। मैं बहुत पहले से कहता आ रहा हूँ कि एलोपैथी ने ‘क्योर’ शब्द को जैसे पेटेण्ट करा रखा है, जबकि इसमें साधारण बीमारी के लिए भी ‘क्योर’ कहना ग़लत है। यह बात मैं बार-बार कह चुका हूँ कि देश भर के एलोपैथी के दस-बारह लाख डॉक्टर मिलकर भी दावा नहीं कर सकते कि उन्होंने एक भी मरीज़ के अस्थमा, हृदय रोग, थायरॉयड, आर्थराइटिस, पीनस, कई तरह के आटो इम्यून रोग, बीपी या अवसाद वग़ैरह को पूरी तरह ठीक कर दिया है।

ज़िन्दगी भर दवा खानी हो तो इसे ठीक होना नहीं कहते। अब यही बात स्वामी रामदेव जी ने 25 सवाल के रूप में आईएमए से पूछा है, तो हड़कम्प मचा हुआ है। स्वामी रामदेव ने अगर यह कहा कि जब दो हज़ार एलोपैथी के डॉक्टर ही अपने इलाज से ख़ुद को नहीं बचा पाए तो वे जनता को क्या बचाएँगे, तो इसमें ग़लत क्या है? इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन वाले लोग कह रहे हैं कि स्वामी रामदेव ने यह कहकर डॉक्टरों के परिवारों का अपमान किया है। इनसे पूछना चाहिए कि क्या सिर्फ़ इसलिए सही सवाल नहीं पूछना चाहिए कि इससे किसी का अपमान हो जाएगा। वास्तव में मृत डॉक्टरों के परिजनों को भी सामने आना चाहिए और कहना चाहिए कि आख़िर आपके इलाज का तरीक़ा कैसा है, जो एकदम सही समय पर अस्पताल की मदद लेने वाले डॉक्टरों तक की जान नहीं बच पा रही।

स्वामी रामदेव स्वामी कितने और लाला कितने, यह फ़ैसला पाठकों पर छोड़ता हूँ, पर स्वामी रामदेव के सवालों से सहमत होते हुए दो क़दम आगे की बात कह रहा हूँ कि एलोपैथी का अब तक का जो तौर-तरीक़ा है, उसको बदले बिना उसमें छोटी बीमारी के लिए भी निरापद दवा बनाना अभी हाल सम्भव नहीं है। हर दवा का साइड-इफेक्ट है और होता रहेगा, यहाँ तक कि विटामिन की सुरक्षित मानी जाने वाली गोलियों का भी। अगर कोई सार्वजिनक चर्चा आयोजित करे, तो प्रमाणों के साथ यह बात मैं सिद्ध कर सकता हूँ।

ख़ैर, अच्छी बात है कि रामदेव जी ने एलोपैथी को नकारा नहीं है। एलोपैथी का योगदान महान् है। इमरजेंसी के लिए अद्भुत काम है इसका, पर एलोपैथी के ज़्यादातर लोग अन्य पैथियों को जिस तरह से ख़ारिज करते हैं, हिकारत की नज़र से देखते हैं, इससे ही साबित होता है कि विज्ञान की समझ इनकी ‘अधजल गगरी’ वाली है, या कई अर्थों में मूर्खतापूर्ण है। बदतमीज़ी देखिए कि पिछले साल जब कोरोना के मरीज़ों को भोपाल के एक होम्योपैथी कॉलेज ने चार-छह दिन में ठीक करके घर भेजना शुरू किया, तो वहाँ के एलोपैथों ने बाक़ायदा विरोध प्रदर्शन किया और सवाल उठाया कि होम्योपैथी वालों को इलाज की छूट किसने दी! मतलब साफ़ है कि इन्हें लोगों की जान बचाने की चिन्ता नहीं थी, बल्कि अपने धन्धे पर ख़तरा दिख रहा था।

मरीज़ इनके लिए दुकान पर आया कस्टमर है। आख़िर ऐसे लोगों को हत्यारों की श्रेणी में क्यों न रखा जाय? मैं पहले भी कह रहा था, आज भी कह रहा हूँ कि कोरोना में जितने भी लोग मौत के शिकार हुए हैं, उनमें से निन्यानवे प्रतिशत ग़लत इलाज की वजह से मरे या मारे गए हैं। यह एक तरह से हत्या है, भले ही ग़ैरइरादतन कहें। मीडिया की भूमिका भी हत्यारों का साथ देने की रही है। उसने उन लोगों को फेक कहने का पुरुषार्थ किया, जो लोग सचमुच जनता की जान बचा रहे थे। यह बात ज़रूर है कि इसी दौरान देश में ऐसे भी एलोपैथ सामने आए, जिन्होंने मानवता के लिए महान् काम किया। देश भर में तमाम डॉक्टर हैं, पर इसी दिल्ली में मशहूर हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. सुभाष शल्य जैसे लोग भी हैं, जो मेरे जैसे साधारण व्यक्ति की पोस्टें साझा करने में कोई परेशानी नहीं महसूस करते। महाराष्ट्र में यवतमाल के प्रसिद्ध एलोपैथ डॉ. अनिल पटेल जैसे लोग भी हैं, जो मुफ़्त में चिकित्सा शिविर लगाते हैं और मरीज़ों को कभी भी ट्रॉयल के तौर पर थोक के भाव दवाएँ नहीं देते।

विज्ञान का दूसरा सिरा देखने के लिए मैं बार-बार कहता हूँ कि एलोपैथों को एक बार सामने से होम्योपैथी का प्रभाव देखना चाहिए और फिर इसके मूल सिद्धान्तों की समझ बनानी चाहिए। मुझे अन्दाज़ा है कि होम्योपैथी पर बात करने वाले देश में बहुत कम हैं। कारण कि आजकल के छात्र कई बार एमबीबीएस में दाख़िला नहीं पाते तो बीएचएमएस में चले जाते हैं। ज़ाहिर है, ऐसे में कम ही होम्योपैथ होम्योपैथी की गहराई में जा पाते हैं और ज़्यादातर एलोपैथी अन्दाज़ में कई-कई दवाओं की पुड़ियाएँ बाँधकर मरीज़ को पकड़ाते हैं। कोई दवा काम कर गई तो तीर, नहीं तो तुक्का। मैं देश के डॉक्टरों से अपील करूँगा कि अगर आप होम्योपैथी का असर देखना चाहते हों और इसमें छिपी भविष्य की निरापद चिकित्सा व्यवस्था की महान् सम्भावना को पहचानना चाहते हों तो मैं कहीं भी आने को तैयार हूँ।

इस बात का कोई अर्थ नहीं है कि मैं डिग्रीधारी हूँ या झोलाछाप। वैसे ज्ञान कभी भी झोलाछाप नहीं होता। डिग्री लेकर भी ज्ञान से रिश्ता न बन पाए तो झोलाछाप से ज़्यादा ख़तरनाक बात है। मेरी जानकारी बहुत हल्की है, पर अनुभवों के चलते कुछ रहस्य मुझे मालूम हैं, जिन्हें साझा करने में मुझे कोई हर्ज़ नहीं है। इस मामले में मेरा विश्वास है कि एलोपैथ होम्योपैथी का रहस्य समझ लें तो एलोपैथी की तमाम दवाओं के साइड-इफेक्ट समाप्त करने का उन्हें तरीक़ा मिल जाएगा और तब एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और नेचुरोपैथी को ज़रूरत के हिसाब से सही समय और सही स्थान पर उपयोग करके मरीज़ों को सम्पूर्ण स्वास्थ्य देना आसान हो जाएगा। यहाँ यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि भले ही आज के युग में होम्योपैथी का आविष्कार महान् हनीमैन ने जर्मनी में किया, पर मैं होम्योपैथी को आयुर्वेद का ही एक अङ्ग मानता हूँ। कई लोगों को यह आश्चर्य लग सकता है, पर मुझे कुछ प्राचीन श्लोक और घटनाओं के वर्णन मिले हैं, जिनमें होम्योपैथी का सिद्धान्त हूबहू वर्णित है। फेसबुक पर चीज़ों का दुरुपयोग ज़्यादा होता है, इसलिए कभी मौक़ा मिला तो इसका प्रदर्शन सार्वजनिक रूप से करना पसन्द करूँगा।

स्वामी रामदेव मेरे पुराने परिचित हैं। किसी वजह से दो-चार साल मुझसे कुछ नाराज़ रहे। पहले कभी-कभार उनके यहाँ से फ़ोन वग़ैरह आ जाते थे, पर क़रीब महीने भर पहले मैंने उन्हें सन्देश भिजवाया तो कोई जवाब अभी तक नहीं आया है। शायद कोराना-काल के बाद आए। बहरहाल, उनसे मुझे आज भी उम्मीद है, इसलिए यही कहूँगा कि आज आपकी छवि थोड़ी लाला रामदेव वाली ज़रूर बन गई है, पर आसाराम, नित्यानन्द, राम रहीम टाइप वाले आरोप नहीं हैं। आप चाहें तो एक बार फिर देश आपके साथ खड़ा हो सकता है। बस ज़रूरत सन्न्यासी वाली असली निष्पक्षता को धारण करने की है। नेताओं की घिनौनी राजनीति और सन्न्यासियों की धर्म के नाम पर जालसाज़ी से देश की जनता तङ्ग आ चुकी है। देश को अब असली नेता और असली सन्न्यासी की ज़रूरत है।

(संत समीर वरिष्ठ पत्रकार हैं और आईआईएमसी से जुड़े हैं।)