मिशन तिरहुतीपुर डायरी : चुनाव की आंच

विमलकुमार सिंह
मत-विमत Updated On :

शिक्षा के क्षेत्र में देश-विदेश में जो भी अच्छे प्रयोग हुए हैं, उन्हें जानने-समझने में मेरी बहुत रुचि है। अगर मौका मिले तो मैं उन्हें देखने भी जाता हूं। मेरी ऐसी ही एक यात्रा जनवरी महीने में हैदराबाद की हुई जहां अक्षर वनम् नामक एक संस्था ने बच्चों की शिक्षा को लेकर कई अनोखे प्रयोग किए हैं।

यहां ट्रिप्पल एल के नाम से एक विशेष पद्धति पर काम हो रहा है जिसके द्वारा बच्चों को गणित, भाषा और जीवनोपयोगी कई दूसरी चीजें बड़े प्रभावी ढंग से सिखाई जाती हैं। हम यहां की बातें यथासंभव मिशन तिरहुतीपुर में भी लागू करना चाहते थे।

हैदराबाद की इस यात्रा में मेरे साथ कमल भी थे। 8 फरवरी को वहां से जरूरी चीजें सीखकर हम गांव लौट आए और फिर अपने काम में व्यस्त हो गए। लेकिन हमने महसूस किया कि फरवरी में सूरज की गर्मी के साथ-साथ राजनीति की भी गर्मी बढ़ रही थी। उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव एकदम नजदीक आ गए थे, इसलिए हमारे गांव में भी भावी उम्मीदवारों ने अपने-अपने स्तर पर मोर्चाबंदी शुरू कर दी थी।

गंवई राजनीति में मेरी कोई रुचि नहीं थी, इसलिए इस बदले माहौल की परवाह किए बिना मैंने अपना काम जारी रखा। लेकिन जल्दी ही मुझे पता चलने वाला था कि चुनावी राजनीति की आंच से बचना इतना आसान नहीं। जो कई उम्मीदवार मैदान में उतर रहे थे, उनमें से दो मेरे बहुत घनिष्ठ थे।

मैं किसी एक के पक्ष में प्रचार करने से बचना चाहता था, इसलिए मैंने पूरी चुनावी प्रक्रिया से ही दूरी बना ली। चुनावी कांव-कांव से स्वयं को बचाने के लिए मैं 27 फरवरी को गांव से बाहर चला गया और फिर सीधे मतदान के दो दिन पहले 17 अप्रैल को लौटा। इस बीच केवल एक बार होली के दिन गांव आना हुआ।

चुनावी दलदल से दूरी बनाने के अलावा भी कुछ ऐसी बातें थीं जिनके चलते मुझे कुछ समय के लिए गांव से बाहर रहना पड़ा। ऐसी ही एक बात 17 फरवरी को हुई जब झारखंड युनिवर्सिटी आफ टेक्नोलाजी के नवनियुक्त उपकुलपति श्री प्रदीप मिश्रा जी ने मुझे विश्वविद्यालय का सलाहकार नियुक्त कर दिया। उनकी अपेक्षा थी कि विश्वविद्यालय की सामाजिक गतिविधियों को नियोजित करने में मैं उनकी मदद करूं।

इसी भूमिका का निर्वहन करते हुए 22 से 23 मार्च को रांची में ग्रामीण विकास के विषय पर आयोजित एक सम्मेलन की तैयारी में खूब व्यस्त रहा। मिशन तिरहुतीपुर की दृष्टि से भी यह सम्मेलन उपयोगी था। यहां से मुझे नए विचार, नई सूचनाएं और नए मित्र मिले। साथ ही पुराने परिचित लोगों से संंबंध को और प्रगाढ़ करने का मौका मिला। कुल मिलाकर कहें तो विश्वविद्यालय के साहचर्य से मिशन तिरहुतीपुर में तकनीक के सदुपयोग की संभावना बढ़ गई।

बेशक मैं डेढ़ महीने बाहर रहा, लेकिन गांव से मेरा संपर्क बराबर बना रहा। यद्यपि हमारे सभी स्टडी सेन्टर गांव में यथावत चल रहे थे, फिर भी चुनावी गर्मी की आंच हमें परेशान करने लगी थी।

हमारी पूरी कोशिश थी कि मिशन तिरहुतीपुर और उसकी टीम चुनावी संघर्ष में किसी की ओर से हिस्सा न ले, लेकिन हमारी निष्पक्षता को लेकर कुछ लोग सवाल उठाने लगे थे। हम बिना फीस लिए गांव के सैकड़ों बच्चों को पढ़ा रहे थे, उन्हें संस्कारित कर रहे थे, इस तथ्य को हमारी तथाकथित राजनीतिक महत्वाकांक्षा से जोड़कर प्रस्तुत किया गया।

चुनाव प्रचार के दौरान जब मिशन तिरहुतीपुर को घेरने की कोशिश की गई तो हमारी भी निष्पक्षता कमजोर पड़ने लगी। धीरे-धीरे हम उस उम्मीदवार के पक्ष में दिखने लगे जो मिशन को खुलेआम समर्थन दे रहे थे।

मैं आखिरी दम तक किसी उम्मीदवार के लिए वोट मांगने नहीं गया, लेकिन उससे बहुत फर्क नहीं पड़ा। सबको संदेश चला गया था कि मैं किसके साथ हूं। मिशन तिरहुतीपुर ने पिछले 5 महीनों में जो भी सामाजिक पूंजी अर्जित की थी, उसे गंवई राजनीति में निवेश करना हमारी मजबूरी हो गई थी।

जो लोग चुनाव और लोकतांत्रिक व्यवस्था को दुनिया की हर समस्या का समाधान मानते हैं, उन्हें पंचायत चुनावों को नजदीक से देखना चाहिए। दरअसल गांवों में भाईचारा खत्म करने और कटुता बढ़ाने में पंचायत चुनावों की बहुत बड़ी भूमिका है। चुनाव के दौरान जो कटुता फैलती है, उसका स्वरूप लगभग स्थाई हो जाता है।

जहां लोग थोड़े समझदार हैं, वहां मारपीट नहीं होती, लेकिन संबंधों में खटास तो हर जगह पड़ जाती है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि यह खटास व्यक्तियों में ही नहीं, बल्कि परिवारों और समुदायों के बीच भी फैल जाती है।

चुनाव चाहे एमपी-एमएलए का हो या पंचायत का, समस्याओं की प्रकृति हर जगह एक जैसी है, लेकिन पंचायत स्तर पर समस्याएं और विकृत हो जाती हैं। तमाम कमियों के बावजूद एमपी, एमएलए के चुनाव में मुद्दे और विचारधारा की भी कुछ हद तक भूमिका होती है। लेकिन पंचायत चुनाव में ऐसी कोई चीज नहीं होती।

ऐसा बहुत कम होता है जब उम्मीदवार की योग्यता और गांव के प्रति उसकी निष्ठा के आधार पर मतदान होता हो। सच कहें तो अधिकतर गांवों में व्यक्तिगत स्वार्थ और पूर्वाग्रह के आधार पर वोट डालने का रिवाज बढ़ रहा है। पैसा, शराब, तिकड़म और जातीय गुणा-भाग से चुनाव जीतना अब गांवों में भी आम बात हो गई है।

पंचायत चुनाव की जितनी समस्याएं हैं, वे ऊपर से नीचे आई हैं। गांव में आते-आते विकृति घटने की बजाए और बढ़ जाती है। लेकिन इस सबके बीच आज भी एक पहलू ऐसा है जहां गांव के चुनाव एमपी एमएलए य़ा अन्य चुनावों से अलग होते हैं।

यह पहलू है पार्टियों की भागीदारी का। अभी भी पंचायती चुनावों में पार्टियों की भूमिका लगभग शून्य होती है। यह अपने आप में एक समस्या भी है और संभावना भी। जो लोग वैकल्पिक राजनीतिक व्यवस्था की बात सोचते हैं, उनके लिए गंवई राजनीति बहुत उर्वरा साबित हो सकती है, बशर्ते उसे नए औजार और नए लड़ाकों के साथ साधा जाए।

दो महीनों में मुझे गंवई राजनीति के बहुत सारे सूत्र समझ में आए। लेकिन फिलहाल मेरा फोकस कहीं और था। 19 अप्रैल की शाम को जब मतदान पूरा हो गया और मतदान पेटी सीलबंद होकर गांव के बाहर चली गई तो मैंने चैन की सांस ली। मुझे इस बात की खुशी थी कि तनाव और कटुता के बावजूद गांव में मारपीट की कोई घटना नहीं हुई थी।

मौखिक नोक-झोंक थोड़ी बहुत हुई लेकिन वह कभी अनियंत्रित नहीं होने पाई। चुनावी परिणाम को लेकर मुझे बहुत चिंता नहीं थी। किसी की जीत-हार से मिशन के काम पर बहुत फर्क नहीं पड़ने वाला था। इसलिए चुनाव खत्म होते ही एक बार फिर से मेरा ध्यान मिशन से जुड़े विविध पहलुओं पर केन्द्रित हो गया।

चुनाव खत्म होने के साथ-साथ 19 अप्रैल को एक और बात हुई जिससे मुझे बड़ी खुशी हुई। इसी दिन तीन महीने बाहर रहने के बाद मिशन के कार्यकर्ता हर्षवर्धन गांव आ गए थे। उनकी त्रैवार्षिक परीक्षा पूरी हो गई थी।

कोरोना के कारण आगे भी आनलाइन क्लास ही होनी थी, इसलिए संभावना थी कि वे गांव में लंबा समय बिता पाएंगे। 19 अप्रैल को हमारे पास परेशान होने का भी एक कारण था लेकिन उसे हम महसूस नहीं कर पा रहे थे। इस दिन तक कोरोना की दूसरी लहर ने देश भर में गंभीर रूप धारण कर लिया था और जल्दी ही उसकी चपेट में हमारा गांव भी आने वाला था।

इस डायरी में फिलहाल इतना ही। आगे की बात डायरी के अगले अंक में, इसी दिन इसी समय, रविवार 12 बजे। तब तक के लिए नमस्कार।