साहित्य अकादेमी और फॉसवाल के संयुक्त तत्त्वावधान ऑनलाइन लिटरेरी कान्फ्रेंस का शुभारंभ

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नई दिल्ली। साहित्य अकादमी और फाउंडेशन ऑफ सार्क राइटर्स एंड लिटरेचर (फॉसवाल) के संयुक्त तत्त्वावधान में आज सार्क एशियन ऑनलाइन लिटरेरी कान्फ्रेंस का शुभारंभ हुआ।

अपने स्वागत भाषण में साहित्य अकादेमी के सचिव के. श्रीनिवासराव ने कहा कि सार्क देशों की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपराए बहुत प्राचीन हैं तथा इनसे लगातार सीखने की प्रेरणा भी मिलती है। इन दक्षिण एशियाई देशों की विविधता से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।

फॉसवाल की अध्यक्ष प्रख्यात पंजाबी लेखिका अजीत कौर ने कोरोना महामारी से दिवगंत हुए विभिन्न देशों के साहित्यकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि हम इस महामारी के कारण ही इस सम्मिलन को ऑनलाइन करने पर मजबूर हैं लेकिन माहौल ठीक होते ही हम सब एकसाथ इकट्ठा होंगे।

उन्होंने सार्क देशों के मौसम वनस्पतियों, भौगोलिक समानताओं के साथ ही साहित्यिक और सांस्कृतिक एकता की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हम इन्हें चार दिन चलने वाले इस सम्मिलन में और निकटता से महसूस करेंगे।

सम्मिलन के मुख्य अतिथि साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार ने कहा कि सार्क देशों के साहित्य की भूमि हमारी प्राचीन संस्कृत से तैयार होती है, लेकिन वर्तमान में हम अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व को महसूस कर रहे हैं, जो कि हमारे देशों के विचारों को सुगमता से व्यक्त नहीं कर सकती।

उन्होंने साहित्य में कविता और कविता में स्मृति के महत्त्व को रेखांकित करते हुए सभी देशों से अपनी मातृभाषाओं में काम करने का अनुरोध किया। सम्मिलन में विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल भूटान की लेखिका कुंजङ शोदेन ने कहा कि यह समय एक दूसरे की देखभाल का है और एक दूसरे के दुख बाँटने का है। यह संदेश ही इस सम्मिलन का मुख्य संदेश है।

अफगानिस्तान के लेखक नाजिब मनालई ने अपने देश की वर्तमान स्थिति का उल्लेख करते हुए इसे अंधकार का युग कहा और सभी सार्क लेखकों से अपील की कि वे हमारे उज्ज्वल भविष्य के लिए ज़रूर प्रयास करें।

नेपाल के लेखक एवं मानवाधिकार कार्यकर्त्ता केशब सिगदेल ने सार्क देशों की सीमाओं पर शरणार्थी समस्याओं का उल्लेख करते हुए इसके उचित समाधान पर बात की। उन्होंने सार्क देशों से उभरते हुए लेखकों की पुस्तकों को भी प्रकाशित करने का सुझाव दिया।

भारत के प्रख्यात उर्दू लेखक अख़्तरुल वासे ने सार्क देशों की सूफी परंपरा और भक्ति परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि हम सबको इन देशों में शांति, समानता और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी है।

उन्होंने कहा कि हमें आम जनता को यह यक़ीन दिलाना होगा कि उनके साथ बिना किसी भेदभाव के न्याय होगा और उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित होगी। उन्होंने औरतों की आज़ादी को भी बेहतर समाज के लिए ज़रूरी बताया और कहा कि इस्लाम में उसे पुरुषों के बराबर ही हर एक हक़ हासिल है।

मालद्वीव के लेखक इब्राहिम वहीद ने कहा कि हम सभी लेखक किसी भी ग़ुलामी के विरुद्ध हैं और कोई भी अंधकार मनुष्य के जीवन को ख़त्म नहीं कर सकता। उन्होंने साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष चंद्रशेखर कंबार की अंग्रेज़ी के बजाय अपनी मातृभाषाओं में चिंतन की परंपरा को पुनर्जीवित करने की अपील का समर्थन किया।

साहित्य अकादेमी के उपाध्यक्ष माधव कौशिक ने समापन वक्तव्य में कहा कि सार्क देशों की भाषाओं और संस्कृति पर अपने अस्तित्व बचाने का दबाव है। वैश्विकरण के चलते हमारी संस्कृतियाँ हाशिये पर हैं। उन्होंने कहा कि यह लेखकों की ज़िम्मेदारी है कि वे अपने-अपने देशों की भाषाओं के साथ अपनी लोक संस्कृतियों की रक्षा करे।

सार्क देशों ने पूरे विश्व की मानवता को अहिंसा सहित बहुत कुछ दिया है। लेखक आम आदमी के प्रवक्ता होते हैं और अपनी-अपनी सभ्यताओं के राजदूत होते हैं। अतः उन्हें अपनी महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारी समझनी होगी। ज्ञात हो कि 6-9 अक्तूबर 2021 तक चलने वाले इस कार्यक्रम में 25 सत्रों में अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, श्रीलंका, नेपाल, मालद्वीव और भारत के 175 से अधिक लेखक, विद्वान, पत्रकार भाग ले रहे हैं।