मंदिरों को खुलवा कर हिंदुओं का नुकसान क्यों करना चाहते हैं कोश्यारी?


भगत सिंह कोश्यारी ने ठाकरे को यह ताना भी दिया गया है कि ”आप तो हिंदुत्व के मजबूत पक्षधर रहे हैं। खुद को राम का भक्त बताते हैं। क्या आपको धर्मस्थलों को खोले जाने का फैसला टालते रहने का कोई दैवीय आदेश मिला है या फिर क्या आप अचानक ‘सेक्युलर’ हो गए हैं?’’


अनिल जैन अनिल जैन
देश Updated On :

महाराष्ट्र कोरोना वायरस के संक्रमण की चपेट में आया देश का सबसे बड़ा सूबा है। वहां राज्य सरकार ने संक्रमण पर काबू पाने के लिए ऐहतियात के तौर पर जो कदम उठाएं हैं, उनके तहत राज्य के सभी धर्मस्थल भी पिछले छह महीने से बंद हैं। वहां संक्रमण को नियंत्रित करने में सरकार बहुत हद तक सफल रही है, इसलिए उसने लॉकडाउन के दौरान बंद किए सरकारी-गैर सरकारी व्यावसायिक संस्थानों को खोलने की इजाजत तो दे दी है, लेकिन शिक्षण संस्थानों और धर्मस्थलों को खोलने की इजाजत अभी नहीं दी है।

मंदिर और धर्म चूंकि भाजपा के प्रिय राजनीतिक मुद्दे हैं, इसलिए उसने मंदिर खोलने की मांग को लेकर महाराष्ट्र में आंदोलन शुरू किया है। मुंबई सहित राज्य के कई शहरों भाजपा की ओर से सड़कों पर आकर पूजा-आरती के आयोजन किए जा रहे है, बिना इस बात की चिंता किए कि उनकी इस राजनीतिक नौटंकी से कोरोना संक्रमण बढ़ सकता है।

मंदिर खोलने की भाजपा की मांग को मुखरित करते हुए सूबे के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को एक चिट्ठी लिखी है, जिसमें उन्होंने सवाल किया है कि जब रेस्तरां और बार खोलने की अनुमति दे दी गई है तो मंदिरों को बंद रखने का क्या औचित्य है? उन्होंने ठाकरे को यह ताना भी दिया गया है कि ”आप तो हिंदुत्व के मजबूत पक्षधर रहे हैं। खुद को राम का भक्त बताते हैं। क्या आपको धर्मस्थलों को खोले जाने का फैसला टालते रहने का कोई दैवीय आदेश मिला है या फिर क्या आप अचानक ‘सेक्युलर’ हो गए हैं?’’

ठाकरे ने अपने जवाबी पत्र में राज्यपाल से सवाल किया है, ”क्या धर्मनिरपेक्षता हमारे संविधान का हिस्सा नहीं है, जिसके नाम पर आपने शपथ लेकर राज्यपाल का पद ग्रहण किया है?’’ ठाकरे ने अपने पत्र में लिखा है, ”लोगों की धार्मिक भावनाओं और आस्थाओं को ध्यान में रखने के साथ ही उनके जीवन की रक्षा करना भी सरकार का अहम दायित्व है। जैसे अचानक लॉकडाउन लागू करना सही नहीं था, उसी तरह इसे एक बार में पूरी तरह से खत्म कर देना भी उचित नहीं होगा।’’

ठाकरे ने खुद को ‘सेक्युलर’ कहे जाने पर पलट वार करते हुए कहा, ”हां, मैं हिंदुत्व को मानता हूं और मेरे हिंदुत्व को आपके सत्यापन की आवश्यकता नहीं है। मुंबई को पीओके बताने वाली का स्वागत करने वाले मेरे हिंदुत्व के पैमाने पर खरे नहीं उतर सकते। सिर्फ धार्मिक स्थलों को खोल देना ही हिंदुत्व नही है।’’

राज्यपाल कोश्यारी ने अपने पत्र में जिस तरह की बेहूदा बातें कही थीं, उसका तार्किक और मर्यादित जवाब यही हो सकता था, जो मुख्यमंत्री ठाकरे ने दिया है। मगर सवाल है कि मुंबई में समंदर किनारे आलीशान राजभवन में रहने वाले कोश्यारी इस तरह का पत्र लिखने के बाद राज्यपाल के पद पर कैसे बने रह सकते हैं? उन्होंने जिस संविधान की शपथ की लेकर राज्यपाल का पद ग्रहण किया है, उस संविधान के सबसे बुनियादी तत्व सेक्युरिज्म यानी धर्मनिरपेक्षता में उन्हें भरोसा नहीं है या उससे नफरत है तो उन्हें राज्यपाल का पद छोडकर संविधान और धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ आंदोलन और महाराष्ट्र के बंद मंदिरों को खोलने की मांग करना चाहिए।

कोश्यारी के पत्र पर नाराजगी जताते हुए देश और महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता शरद पवार ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में उचित ही कहा है कि किसी मुद्दे पर राज्यपाल की राय राज्य सरकार की राय से भिन्न हो सकती है, लेकिन राज्यपाल कोश्यारी ने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल अपने पत्र में किया है और उस पत्र को मीडिया के जरिए सार्वजनिक किया है, वह बेहद आपत्तिजनक और दुखद है।

राज्यपाल कोश्यारी को उनकी चिट्ठी के जवाब में उद्धव ठाकरे की पार्टी शिवसेना की ओर से भी यह ठीक याद दिलाया गया है कि मंदिरों की तुलना रेस्तरां और शराबखानों से नहीं की जा सकती। लेकिन इस मसले को शिवसेना के इस जवाब से परे व्यावहारिकता के धरातल पर भी देखने-समझने की जरुरत है। कोरोना संक्रमण का खतरा अभी खत्म नहीं हुआ है और लंबे लॉकडाउन का असर लोगों के काम-धंधे पर भी पड़ा है और सरकारों के राजस्व पर भी। इसलिए लोगों की व्यावसायिक गतिविधियों को शुरू करने की इजाजत देना किसी भी तरह से अनुचित नहीं है।

शराबखाने, डांस बार, होटलों और अन्य कारोबारी गतिविधियों से सरकार को राजस्व मिलता है। वहां उत्पाती शराबियों और मनचलों को काबू में करने के लिए प्रबंधन की ओर से बाहुबली कर्मचारियों बाउंसर को तैनात किया जाता है। चूंकि कोरोना संक्रमण का खतरा अभी भी मौजूद है और ऐसे में अगर सरकार धर्मस्थलों को खोलने की इजाजत दे दे और वहां भीड़ बेकाबू हो जाए या भगदड़ मच जाए तो उसे काबू में कौन करेगा?

इस हकीकत से कौन इंकार कर सकता है कि किसी भी बडे धार्मिक स्थल पर या किसी बडे धार्मिक आयोजन में लोग भीड की शक्ल में आते ही बेकाबू और अराजक हो जाते हैं, कुछ लोग हथियार तक निकाल लेते हैं और मरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं। वे अपने धर्म को किसी भी कानून या संविधान से ऊपर मानते हैं।

अभी पिछले दिनों ही बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के मामले का जो फैसला आया है। बड़ी मासूमियत से दिए गए उस फैसले में भले ही सारे आरोपियों को बरी कर दिया गया हो, लेकिन 6 दिसंबर 1992 को मस्जिद विध्वंस की घटना को जिन लोगों ने देखा है, वे जानते हैं कि नेताओं के भडकाऊ बयानों से प्रेरित अयोध्या में जुटी भीड़ किस तरह हिंसक और अराजक हो गई थी कि उसने मस्जिद गिराकर ही चैन लिया।

अयोध्या कांड को राजनीतिक मामला मानकर छोड भी दें तो देश में पिछले वर्षों के दौरान प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों और कुछ बडे धार्मिक आयोजनों में भीड बढने और भगदड मचने की कई घटनाएं इस बात का प्रमाण है कि ऐसे स्थानों पर जब भीड़ बेकाबू हो जाती है तो सारे सुरक्षा उपाय और कानून-कायदे धरे रह जाते हैं। ऐसी कुछ घटनाएं तो महाराष्ट्र के राज्यपाल कोश्यारी के गृह राज्य उत्तराखंड में भी हो चुकी हैं, जो कहा नहीं जा सकता कि उन्हें याद होंगी या नहीं

जिस महाराष्ट्र में धार्मिक स्थल खोलने की मांग की जा रही है, वहां कई विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल हैं। बारह प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से चार महाराष्ट्र में ही हैं। शिर्डी का साई मंदिर है। शिगणापुर का शनि मंदिर है। मुंबई में ही सिद्धि विनायक मंदिर है। इसके अलावा प्रदेश में कई प्रसिद्ध जैन तीर्थ, दरगाहें और गुरद्वारे हैं, ईसाइयों और पारसियों के आस्था स्थल हैं। इन सभी स्थानों पर सामान्य दिनों में भी रोजाना हजारों की संख्या में लोग आते हैं। लेकिन न तो जैनियों की ओर से और न ही मुसलमानों, सिक्खों या ईसाइयों की ओर उनके धार्मिक स्थल खोलने की मांग हो रही है।

सिर्फ भाजपा की ओर से ही यह मांग की जा रही है। कोरोना संक्रमण के इस भीषण दौर में अगर इन धार्मिक स्थलों को खोल दिया जाए तो कल्पना करें कि वहां क्या होगा? वहां जुटने वाली लोगों की भीड को किस तरह नियंत्रित किया जा सकेगा? अगर किसी वजह से वहां भगदड़ मची तो उस स्थिति में कितनी जनहानि होगी? भीड़ जुटने से कोरोना संक्रमण बढ़ने का खतरा तो अपनी जगह है ही।

ऐसी स्थिति में मंदिरों को खोलने की मांग कर रही भाजपा और राजभवन में बैठकर उस मांग के समर्थन में हिंदुत्व का झंडा लहरा रहे भगत सिंह कोश्यारी को पता नहीं यह बात क्यों समझ में नहीं आ रही है कि मंदिरों को खोलने की अनुमति न देकर उद्धव ठाकरे की सरकार हिन्दुओं का कितना भला कर रही है, उन पर कितना उपकार कर रही है। कहने की आवश्यकता नहीं कि महाराष्ट्र के राज्यपाल मंदिर खोल देने पर हिन्दुओं के लिए पैदा होने वाले खतरे को नजरअंदाज करते हुए जो मूर्खतापूर्ण बयानबाजी कर रहे हैं, वह न सिर्फ शर्मनाक है बल्कि सरकार पर अनुचित और जनविरोधी काम करने का आपराधिक दबाव भी है।

 



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