योगीराज में यूपी में बढ़ा दलितों का उत्पीड़न, राष्ट्रीय स्तर से भी अधिक दर्ज हुए मामले


उत्तर प्रदेश सरकार के सभी वर्गों को सुरक्षा देने का दावा जुमला साबित
हो रहा है। प्रदेश में दलित को खिलाफ होने वाले आंकड़ों की बात करें तो यह राष्ट्रीय
स्तर से भी उपर है। पिछले वर्ष राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो (NCRB) द्वारा जारी रिपोर्ट क्राइम इन इंडिया-2018 लगभग एक वर्ष के विलम्ब से जारी की गयी है जिसमें
अन्य अपराधों के साथ साथ अनुसूचित जातियों के विरुद्ध अपराध एवं उत्पीड़न के आंकड़े
भी जारी किये गए हैं ।


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इन आंकड़ों से जहाँ एक तरफ उत्तर प्रदेश में इन वर्गों के विरुद्ध अपराध और उत्पीड़न के मामलों में पूर्व की भांति निरंतर बढ़ोतरी दिखाई दे रही है वहीँ दूसरी तरफ दलितों पर अपराध की दर राष्ट्रीय दर से कहीं अधिक है. यह राष्ट्रीय दर 21.3% से अधिक 28.8% है। 2018 में उत्तर प्रदेश में दलितों के विरुद्ध अपराध देश में घटित कुल अपराध का 27.9 प्रतिशत है जो राष्ट्रीय आबादी में दलितों के 21.1% से भी अधिक है। आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 में दलितों के विरुद्ध घटित राष्ट्रीय अपराध की दर 19 प्रतिशत है वहीं उत्तर प्रदेश में यह 22.6 प्रतिशत है। वहीं हत्या के देश में 821 मामले दर्ज किए गए हैं जिसमें 239 मामले केवल यूपी में दर्ज किए गए हैं। इसके अलावा आंकड़ों में दलित महिलायों के विरुद्ध लज्जा भंग, शील भंग, बलातकार और अपहरण या प्रयास के मामले राष्ट्रीय स्तर पर इस वर्ग के विरुद्ध घटित अपराध से कहीं अधिक हैं।  

और प्रदेश में ऐसे मामले बढ़े क्यों नहीं जब इस सरकार में पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या करने वालों और बलात्कार के आरोपी चिन्मयानन्द जैसे लोगों की जेल से रिहाई पर स्वागत किया जाता है। वहीं हत्यारोपी भाजपा विधायक की गिरफ्तारी भारी जनदबाव के  बाद होती है। दलितों पर अत्याचार बढ़ने का एक कारण यह भी है कि दलितों की रहनुमाई करने का दावा वाली मायावती सीबीआई के डर से और अपनी भ्रष्ट राजनीति के कारण न सिर्फ इस सरकार के हमलों के खिलाफ चुप है बल्कि उसने तो अपने कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह के धरना, प्रदर्शन या आन्दोलन करने से रोक रखा है।



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