मिशन तिरहुतीपुर डायरी : गांव की जरूरत- हार्डवेयर या साफ्टवेयर?


गांव के हार्डवेयर पर काम जरूरी है, उसके महत्व को हम भी स्वीकार करते हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता में गांव का हार्डवेयर नहीं बल्कि साफ्टवेयर था। यहां साफ्टवेयर से हमारा तात्पर्य उस मानसिकता से है जिससे गांव चलते आए हैं और आगे जिनसे गांवों को चलना चाहिए।


विमलकुमार सिंह
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(विमल कुमार सिंह मूलत: पत्रकार-अनुवादक हैं। लंबे  समय तक वे भारतीय पक्ष पत्रिका के संपादक रहे, पत्रकारिता, प्रकाशन,अनुवाद और वैचारिक आंदोलनों से उनका गहरा नाता रहा है। शिक्षा के लिए आजमगढ़ से दिल्ली आये और तीन दशकों तक दिल्ली के आबोहवा में रहे। अब वह अपने गांव में एक प्रयोग कर रहे हैं। “मिशन तिरहुतीपुर” के नाम से चलने वाला यह कार्य शुरू हो चुका है और उसके परिणाम भी दिखने लगा है। गांव को उसके मूल स्वरूप में वापस लाने का यह अभियान कैसे शुरू,क्या-क्या वैचारिक संघर्ष हुए और किन-किन परेशानियों का सामना करना पड़ा, मिशन तिरहुतीपुर डायरी उसी का दस्तावेज है:) 

दुनिया में कोई भी चीज शायद शून्य से शुरू नहीं होती। उसके पीछे उसका अतीत, उसकी पृष्ठभूमि जरूर होती है। मिशन तिरहुतीपुर इसका अपवाद नहीं है। इसके पीछे केएन गोविन्दाचार्य का 50 से अधिक वर्षों का सार्वजनिक जीवन है। लेकिन अभी हम उस पर चर्चा करने की बजाए बात करेंगे कि-  कैसे शुरू हुआ मिशन तिरहुतीपुर और खास तिरहुतीपुर गांव को ही चुनने का क्या कारण था?

अप्रैल, 2020 में जब पूरा देश कोरोना की पहली लहर से जूझ रहा था और बड़े शहरों में फंसे मजदूर अपार कष्ट सहते हुए अपने-अपने गांव पहुंचने की जद्दोजहद में लगे हुए थे, उसी समय गोविन्दाचार्य जी ने अपने फेसबुक वाल पर एक पोस्ट किया। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से पूछा कि उन्हें इस समय क्या करना चाहिए। अधिकतर कार्यकर्ताओं ने इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर पहल करने का सुझाव दिया। इसी संबंध में मैंने भी गोविन्दजी को एक पोस्ट लिखा जिसे मैं यहां शब्दशः प्रस्तुत कर रहा हूं:

सादर प्रणाम।

कोरोना महामारी से निपटने के लिए आपने जो पहल की है, उसके लिए साधुवाद। हम एक साथ पूरे देश में काम कर सकें तो बहुत अच्छा होगा लेकिन इसके लिए संसाधन (आर्थिक और मानवीय दोनों) जुटाना अपने आप में बहुत दुरूह और समयसाध्य कार्य है। इसलिए इस दिशा में आवश्यक प्रयास जारी रखते हुए हमें एक तात्कालिक रणनीति पर भी काम करना चाहिए जिसका सूत्र मुझे आपके दिए दो नारों में दिखाई देता है। ये नारे हैं – ‘’थिंक ग्लोबली एक्ट लोकली’’ और ‘’मेरा गांव मेरा देश’’।

मेरा सुझाव है कि आप एक गांव को गोद लीजिए। वैसे भी मदद की जरूरत शहरों से ज्यादा गांवों को है। यदि देश की सभी सज्जन शक्तियां मिलकर एक गांव के समग्र विकास की युगानुकूल तस्वीर खींच दें तो सारी समस्याओं के समाधान का रास्ता निकल सकता है। यह रास्ता आस-पास के गांवों से होते हुए पूरे देश में सहज ही फैल जाएगा और हो सकता है कि यह सकारात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे पूरे विश्व को एक नई राह दिखा दे।

गांव में क्या करना, इसके लिए किसी चिंतन की जरूरत नहीं है। इसके लिए एक छोटा सा कदम उठाने की जरूरत है। आप जैसे मनीषी यदि एक गांव को गोद लेकर वहां कुछ दिन रहना शुरू कर दें तो सारा काम अपने आप हो जाएगा। आपके आह्वान पर देश की सज्जन शक्तियां अपनी-अपनी विशेषज्ञता के आधार पर उस गांव को संवारने की मुहिम में लग जाएंगी। वहां के प्रयोगों से ऐसे कई सूत्र निकलेंगे, जिन्हें लोग अपने-अपने गांव के स्तर पर कर सकेंगे। एक-दूसरे के प्रयोगों से सीखते हुए हम इस मुहिम को आपके नेतृत्व में मजबूत बनाते चलेंगे।

इस दिशा में मैं एक कदम आगे बढ़ाते हुए आपसे निवेदन कर रहा हूं कि आप आजमगढ़ स्थित हमारे गांव को गोद लें। मैं अपनी पूरी ताकत लगाकर आपके साथ काम करने के लिए तैयार हूं।

आपका

विमल कुमार

(19 अप्रैल, 2020 को गोविन्द जी ने मेरे इस प्रस्ताव को स्वीकार करके अपने फेसबुक वाल पर घोषणा की कि वे तिरहुतीपुर गांव को अपना गांव मानकर काम करेंगे। इसी के साथ मिशन तिरहुतीपुर का विचार जो मेरे मन में बीज के रूप में कई वर्षों से पड़ा हुआ था, उसे भूमि का संसर्ग मिल गया और उसमें अंकुर फूटने की प्रक्रिया शुरू हो गई।)

 कैसे ठीक हुई मेरी एक मनोवैज्ञानिक समस्या?

मेरी कौन सी मनोवैज्ञानक समस्या थी और उसको मिशन तिरहुतीपुर ने कैसे ठीक किया, इस पर बात करने के पहले थोड़ा मेरे बारे में जान लें तो अच्छा रहेगा। मैं अर्थात विमल कुमार सिंह मूलतः तिरहुतीपुर ग्राम पंचायत के अंतर्गत सुंदरपुर कैथौली गांव का निवासी हूं। दसवीं तक की पढ़ाई गांव से ही करने के बाद 1987 में पिताजी के साथ दिल्ली चला गया। दिल्ली विश्वविद्यालय से बीए, एलएलबी करने के बाद मैं वहीं दिल्ली में ही रम गया। कुछ समय के लिए वकालत की। वहां मन नहीं लगा तो स्वतंत्र वृत्ति के साथ अनुवाद, लेखन, संपादन, शोध, सर्वेक्षण, प्रकाशन, मुद्रण, फिल्म निर्माण और पत्रकारिता आदि में स्वयं की तलाश करने लगा।

संयोगवश वर्ष 2004 में मेरी मुलाकात गोविन्दाचार्य जी से हुई। उन्होंने मुझे अपनी पत्रिका भारतीय पक्ष के संपादन की जिम्मेदारी सौंपी। उसके बाद मैंने गोविन्दजी से जुड़ी सामाजिक गतिविधियों और अपने बिजनेस, दोनों में एक संतुलन बनाते हुए आगे बढ़ने की कोशिश की। वर्ष 2011 में मैंने “संवाद मीडिया प्राइवेट लिमिटेड” के नाम से अपनी एक कंपनी बना ली। मेरी इच्छा थी कि मैं मीडिया के क्षेत्र में बड़ा बिजनेसमैन बनूं। लेकिन मेरा समय बिजनेस के काम में कम और गोविन्दजी से जुड़ी विभिन्न गतिविधियों में अधिक खर्च हो रहा था। धीरे-धीरे मैं एक द्वंद्व में फंसता जा रहा था। न तो कायदे से पैसा कमा पा रहा था और न ही पूरा मन लगाकर सामाजिक काम कर पा रहा था। मैं जिस स्थिति से गुजर रहा था, उसे मनोविज्ञान की भाषा में Cognitive dissonance कहते हैं।

काग्निटिव डिसोनेन्स क्या है? चेक करिए कहीं आप भी तो नहीं जूझ रहे इससे?

अमेरिकी मनोविज्ञानी Leon Festinger ने काग्निटिव डिसोनेन्स पर 1957 में एक शोध प्रकाशित किया था। उनका कहना है कि प्रत्येक मनुष्य अपने जीवनमूल्य और अपने काम में किसी प्रकार का अंतर्विरोध नहीं चाहता। कभी जब ऐसी स्थित उत्पन्न होती है तो वह अपने जीवनमूल्य या अपने काम में से किसी एक को दूसरे के अनुसार बदलने का प्रयास करता है। जीवनमूल्य या धारणा को बदलना आसान लगता है, इसलिए प्रायः मनुष्य उसी को एडजस्ट करने का प्रयास करता है। इसके लिए वह 4 तरीके अपनाता है। आइए इसे एक सिगरेट पीने वाले ऐसे व्यक्ति के उदाहरण से समझते हैं जो मानता है कि सिगरेट पीना बुरी चीज है क्योंकि उससे कैंसर आदि बीमारियां होती हैं।

डिनायल अर्थात द्वंद्व पैदा करने वाले काम के अस्तित्व को ही नकारना- जब कोई काम करने से अंतर्द्वंद्व पैदा होता है तो मन शुरू में प्रायः यही तरीका इस्तेमाल करता है। सिगरेट के उदाहरण से समझें तो व्यक्ति अपने को समझाएगा कि उसे सिगरेट पीने की आदत बिल्कुल नहीं है। वह तो कभी-कभी दोस्तों के साथ पी लेता है या चलो इस बार पी लेते हैं, आगे से नहीं पीएंगे आदि आदि।

रेशनलाइजेशन अर्थात तर्क का सहारा लेना- जब लत बढ़ने लगती है तो डिनायल से काम नहीं चलेगा। इसलिए वह तर्क का सहारा लेता है। वह अपने को समझाएगा कि देखो फलाने व्यक्ति को कैंसर हो गया था जबकि वे बिल्कुल सिगरेट नहीं पीते थे। वह उन तमाम तथ्यों को जुटाएगा जो सिद्ध करें कि सिगरेट पीने से कैंसर या कोई बीमारी नहीं होती है।

रीफ्रेमिंग- जब डिनायल और रेशनलाइजेशन से भी बात नहीं बनती तो वह पूरे प्रसंग की व्याख्या अलग तरीके से करता है। वह अपने को समझाएगा कि देखो सिगरेट पीना ठीक नहीं है लेकिन क्या करें मेरा मन कमजोर है, मैं चाहता तो हूं लेकिन छोड़ नहीं पाता। कई बार वह इसे अपनी दोस्ती और अपने काम-धाम के लिए जरूरी बताकर भी सिगरेट पीने की आदत को नहीं छोड़ेगा।

सेपरेशन- अंतिम हथियार के तौर पर व्यक्ति स्वयं को दो हिस्सों में बांट लेता है- एक अच्छा और एक बुरा। अंतर्द्वंद्व पैदा करने वाले अपने काम को वह बुरे व्यक्तित्व के मत्थे मढ़कर व्यक्तित्व के दूसरे हिस्से को पाक-साफ ऱखने की कोशिश करता है। ऐसे में प्रायः वह अपने उस काम के बारे में बात करना तो दूर, उस पर सोचने से भी बचता है, जिसके कारण द्वंद्व पैदा होता है।

जब समस्या चरम पर पहुंच गई…

गोविन्दजी ने जब मुझे मिशन तिरहुतीपुर का संयोजक बनाया तो मेरी Cognitive dissonance की वर्षों पुरानी समस्या चरम पर पहुंच गई। चारों में से कोई एक भी तरीका काम नहीं कर रहा था। मिशन तिरहुतीपुर की जिम्मेदारी को निभाना और दिल्ली में बड़ा बिजनेसमैन बनकर पैसा कमाना, ये दोनों लगभग विरोधी लक्ष्य थे। किसी एक को छोड़े बिना दूसरे को निभाना मुश्किल था। ईश्वर की कृपा से मुझे इसी समय मेरे दीक्षागुरु (पूज्य राजेन्द्र पांडेय जी, अयोध्या) मिल गए। उनके मार्गदर्शन में मेरे सामने श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 3, श्‍लोक 35 का अर्थ स्पष्ट हो गया जिसमें भगवान ने कहा है, “…स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”

मुझे समझ में आ गया कि मिशन तिरहुतीपुर के लिए गांव में जाकर काम करना ही मेरा धर्म (कर्तव्य) है। इसको करते हुए यदि मरण (असफलता) भी मिले तो वह दिल्ली में काम करते हुए मिली सफलता (परधर्म) से श्रेष्ठ है। मुझे दिल्ली में रहकर काम करने का विकल्प (परधर्म) भयावह लगने लगा।

इस मनःस्थिति में मैंने निर्णय लिया कि मैं मिशन तिरहुतीपुर का काम दिल्ली रहकर नहीं बल्कि गांव में रह कर करूंगा। इस प्रकार 33 वर्ष दिल्ली में रहने के बाद मैंने उसे अपने स्थायी निवास के रूप में छोड़ देने का निर्णय कर लिया। मैंने तय कर लिया कि अब दो नाव की सवारी नहीं करूंगा। मैं केवल वही करूंगा जिसका सीधा संबंध मिशन तिरहुतीपुर से होगा।

 बेटा बड़े होकर क्या बनोगे?

अप्रैल, 2020 में यह तो तय हो गया था कि अब मैं दिल्ली में नहीं, बल्कि गांव में रहकर मिशन तिरहुतीपुर का काम करूंगा, लेकिन वहां जाकर अपने कैरियर के नाते क्या करूंगा, इसको लेकर तस्वीर अभी साफ नहीं थी। बुद्धि पहले गांव में जाकर कैरियर सेट करने की बात कह रही थी, जिससे कुछ आय शुरू हो, जबकि मन कह रहा था कि पूरा ध्यान मिशन तिरहुतीपुर पर लगाओ, आय की चिंता मत करो। बुद्धि समुद्र तट के किनारे-किनारे सुरक्षित चलना चाहती थी जबकि मन समुद्र के अनंत विस्तार में जाकर कुछ नया खोजने को कह रहा था। इस सबके बीच मुझे एक पुराना प्रश्न याद आ गया जो लोग मुझसे (प्रायः सभी बच्चों से) बचपन में पूछा करते थे और आज भी पूछते हैं, “बेटा बड़े होकर क्या बनोगे?”

मिशन तिरहुतीपुर के संदर्भ में यह प्रश्न एक बार फिर मेरे सामने था। इसका उत्तर जब मैंने किताबों की मदद से ढूंढना शुरू किया तो श्रीमती जी ने व्यंग्य करते हुए कहा कि बुढ़ापा आने वाला है और अभी तक तय ही नहीं कर पाए कि करना क्या है। बात तो ठीक ही कह रही थीं, लेकिन अगर Range नामक पुस्तक के लेखक David Epstein की मानूं तो कैरियर तय करने की सबसे बढ़िया उम्र अधेड़ अवस्था ही होती है। इसी सिलसिले में मैंने Bill Burnett & Dave Evans की किताब Designing your life भी पढ़ी। उससे भी कई चीजें समझ में आईं। मजा तब आया जब मेरे छोटे बेटे ने मुझे Joseph Campbell की किताब The Power of Myth पढ़ने को कही। इसमें कैंपबेल कहते हैं कि सत्, चित् और आनंद में आनंद को पहचानना सबसे आसान है और व्यक्ति को उसी दिशा में बढ़ना चाहिए। ऐसा करने पर सत् और चित् की प्राप्ति आसान हो जाती है। कैंपबेल की यह बात मुझे बहुत अच्छी लगी।

अपने कैरियर के बारे में सोचते हुए मुझे एहसास हुआ कि आज के बच्चों और युवाओं के लिए कैरियर चयन कितनी बड़ी चुनौती बन गया है। जिस तेजी से हमारा सामाजिक-आर्थिक परिवेश बदल रहा है, उसमें यह चुनौती और बढ़ती जा रही है। एक समय था जब लोगों का कैरियर समाज तय करता था। कुछ समय पहले तक यह काम बच्चों के मां-बाप करते थे किंतु अब तो बच्चे स्वयं तय कर रहे हैं कि उनका कैरियर क्या होगा। लेकिन मुझे लगता है कि आज के माहौल में यह निर्णय लेने के लिए जिस परिपक्वता और जानकारी की आवश्यकता होती है, उसकी उम्मीद बच्चों से नहीं की जा सकती।

कभी कैरियर के नाम पर गिने-चुने विकल्प होते थे, लेकिन आज हजारों हैं। अधिकांश बच्चों और युवाओं को प्रायः मालूम ही नहीं होता कि उनके स्वभाव और परिस्थिति को देखते हुए उनके लिए सबसे बढ़िया कैरियर क्या होगा। जिन बच्चों और युवाओं को कैरियर संबंधित ढेर सारे विकल्पों की जानकारी है, उन्हें एक नए तरह की समस्या का सामना करना पड़ता है। प्रसिद्ध मनोविज्ञानी Barry Schwartz ने इसे अपनी किताब The Paradox of Choice – Why More is Less में बड़े अच्छे से समझाया है। उनका कहना है कि विकल्प की अधिकता से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि वह और बढ़ जाती है।  इससे जहां एक ओर सही निर्णय लेने की व्यक्ति की क्षमता घट जाती है, वहीं दूसरी ओर वह चिंता और आत्मसंशय जैसी कई नई समस्याओं से भी घिर जाता है।

आधुनिक किताबों के अध्ययन से कैरियर चयन को लेकर बहुत सारी बातें स्पष्ट हुईं, लेकिन कुछ न कुछ अभी भी मिसिंग था। ऐसे में मुझे लगा कि क्यों न ज्योतिष विद्या की शरण ली जाए। मैं जानना चाह रहा था कि ज्योतिषी किस आधार पर लोगों के भविष्य, विशेष रूप से उनके काम-धाम के बारे में बताते हैं। इसके लिए मैंने ज्योतिषियों से बात की, लेकिन संतुष्टि नहीं हुई। मैंने महसूस किया कि जब तक मुझे ज्योतिष शास्त्र की कुछ बुनियादी बातों की खुद जानकारी नहीं होगी, इस पर कोई सार्थक चर्चा संभव नहीं है। इसके बाद मैंने अपने एक ज्योतिषी मित्र अभयजी की सलाह पर फटाफट तीन किताबें मंगवाईं- फलदीपिका- डा. गोपेश कुमार ओझा, लघु पराशरी- डा. सुरेशचंद्र मिश्र, ज्योतिष और कैरियर- आचार्य विवेकश्री कौशिक। किताबें पढ़ने के साथ-साथ यूट्यूब पर कुछ संबंधित विडियो भी देखे।

ज्योतिष की किताबों में जो पढ़ता, उसे मैं अपनी और अपने परिवार के दूसरे सदस्यों की कुंडली पर आजमा कर भी देखता। धीरे-धीरे रहस्य खुलने लगे। मैंने देखा कि वृश्चिक लग्न की मेरी कुंडली के कर्मभाव में 12 डिग्री का बल लेकर चंद्रमा बैठे हैं और उन पर सूर्य तथा गुरू की दृष्टि पड़ रही है। इसके अलावा और भी बहुत कुछ मुझे अपनी कुंडली में दिखा। ऐसा नहीं है कि मैं तीन किताबें पढ़कर ज्योतिष विद्या का जानकार हो गया, लेकिन हां इतना जरूर हुआ कि उसके शब्द और उसकी भाषा मुझे समझ में आने लगी। मैं अपने को और बेहतर ढंग से जान पाया। “बेटा बड़े होकर क्या बनोगे?”, इस प्रश्न का उत्तर मुझे आज भी नहीं मालूम, लेकिन ज्योतिष विद्या ने मुझे इतना जरूर बता दिया कि मेरा कर्म मेरी बुद्धि के नहीं, बल्कि मेरे मन के अधीन होगा।

कैरियर के प्रश्न पर जो कसरत हुई, उसके परिणाम स्वरूप मैंने तय किया कि कैरियर चयन के क्षेत्र में मिशन तिरहुतीपुर प्राथमिकता के आधार पर काम करेगा। हम एक ऐसी प्रक्रिया विकसित करना चाहेंगे जिसमें बहुत छोटी उम्र से ही बच्चों का ज्योतिषीय, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और एकेडमिक आधार पर निरंतर आकलन होता रहे, उनके गुण-धर्म को पहचानकर उनके चरित्र निर्माण की कोशिश होती रहे और जब वे 15 वर्ष के हो जाएं तो उन्हें उचित कैरियर की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया जाए, सहायता दी जाए।

जहां तक अपनी बात है तो मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि गांव जाकर फिलहाल कोई बिजनेस नहीं करूंगा। मैं अपना पूरा ध्यान मिशन तिरहुतीपुर पर ही केन्द्रित रखूंगा। अन्यथा फिर वही पुरानी डिसोनेन्स की समस्या उत्पन्न होगी। इस निर्णय के पीछे दो आधार हैं। पहला, मुझे लगता है कि एक साल के भीतर स्वयं की आजीविका के लिए अर्थोपार्जन करना मेरी मजबूरी नहीं रह जाएगी क्योंकि मेरे दोनों बेटे अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने में सक्षम हो जाएंगे। दूसरा, गांव में चूंकि मैं अपने संयुक्त परिवार के साथ रहूंगा, इसलिए वहां लगभग शून्य आय में भी जीवनयापन कर सकूंगा। अगर व्यक्तिगत खर्चों के लिए थोड़ी-बहुत पैसों की जरूरत हुई तो मुझे विश्वास है कि उसे मैं अपनी मीडिया पृष्ठभूमि और लेखनी के दम पर सहज ही अर्जित कर लूंगा।

व्यवस्था परिवर्तन की राह…

अपने स्थायी निवास और कैरियर के बारे में उपयुक्त निर्णय लेने के बाद अब समय था कि मैं पूरी तरह से एकाग्रचित्त होकर मिशन तिरहुतीपुर का काम शुरू करूं। लेकिन उस समय मई, 2020 में चारों ओर लाकडाउन लगा हुआ था। कहीं जाना संभव नहीं था। इसलिए मैंने दिल्ली एनसीआर के अपने फ्लैट में रहते हुए गोविन्दजी के विचारों को नए सिरे से समझने की कोशिश शुरू कर दी। उनके चिंतन में जो बात प्रमुखता से मुझे आकर्षित करती है, वह है ‘व्यवस्था परिवर्तन’। वर्ष 2014 में हमारी कंपनी ‘संवाद मीडिया’ ने उनकी एक किताब छापी थी जिसका नाम है, ‘व्यवस्था परिवर्तन की राह’।

कई लोग सत्ता और व्यवस्था को समानार्थी मान लेते हैं, जबकि ऐसा है नहीं। सत्ता की भूमिका उतनी ही है जितनी शरीर में उसके किसी एक अंग की। गोविन्दजी जब व्यवस्था की बात करते हैं तो उनका तात्पर्य उन सभी संस्थाओं, प्रणालियों एवं मान्यताओं के समुच्चय से होता है जिनके द्वारा हमारा व्यक्तिगत एवं सामूहिक, दोनों प्रकार का जीवन संचालित होता है। वे बताते हैं कि एक निश्चित काल और समय के संदर्भ में इस धरती पर कई व्यवस्थाएं एक साथ काम कर रही होती हैं। लेकिन इन तमाम व्यवस्थाओं के बीच एक ऐसी सार्वभौमिक व्यवस्था होती है जो सबको नियंत्रित करती है। हालांकि उसका स्वरूप और उसकी सीमा निरंतर परिवर्तनशील होती है। एक तरफ जहां वह अपनी घटक व्यवस्थाओं को प्रभावित करती है, वहीं वह उनसे प्रभावित भी होती रहती है।

आज हमारे देश में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जिस व्यवस्था का सिक्का चल रहा है, उसके मूल में ब्रिटेन की औद्योगिक क्रांति है। इसकी उत्पत्ति बेशक ब्रिटेन के कारखानों से हुई, लेकिन आज यह हर जगह फैल चुकी है। लाभोन्माद इसकी प्राणवायु है। समरूपीकरण, केन्द्रीकरण एवं बाजारीकरण की प्रवृत्ति के साथ यह स्वयं को अनगिनत रूपों में अभिव्यक्त करती है। हमारा विचार-व्यवहार, हमारी संस्थाएं, हमारी परंपराएं, हमारी जीवनशैली, कुछ भी इससे अछूती नहीं है। आधुनिक सूचना तंत्र वह अस्त्र है जिसके द्वारा यह पूरे विश्व को अपने वश में करती जा रही है। दुनिया भर की सरकारें जाने-अनजाने इसके सामने नतमस्तक हैं।

इस व्यवस्था की असलियत को बयान करता एक बहुत बढ़िया लेख बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व प्रमुख स्वर्गीय कैलाश बुधवार ने लिखा था। उनका वह लेख लंदन से प्रकाशित पत्रिका पुरवाई में छपा था, जिसमें मैं उन दिनों कार्यकारी संपादक की भूमिका में था। कैलाश जी ने अपने लेख में बताया था कि यह व्यवस्था किस प्रकार सारी मानव-जाति की चिरंतन प्रवाहित विचारधारा को एक कुएं में ढकेलकर उससे लाभ खींचने की नीयत रखती है। यह एक ऐसी दुनिया चाहती है जहां सब एक तरह से सोचेंगे, एक ही भाषा बोलेंगे, एक ही धुन के गीत गाएंगे, एक सा खाना पकाएंगे और अपने बच्चों को एक सी लोरियां सुनाएंगे।

समरूपीकरण के खतरे को स्पष्ट करते हुए बुधवार जी ने आगे लिखा था, “मुझे भय सताता है कि क्या हम और हमारे जैसे करोड़ों लोगों की आगे आने वाली पीढ़ियां वह सब कुछ खो देंगी जो संसार के हर कोने में मानवीय प्रतिभा ने हजारों वर्षों के प्रयत्न से संजोया है। क्या वह विविधता जो हमारी धरती को सजाए है, सपाट हो जाएगी, क्या ज्वालामुखी की अग्निवर्षा में सारे रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियां राख के मलबे में दब जाएंगी, क्या हम भी शेष पशु जगत की तरह एक ही नस्ल की शक्ल में बदलकर एक सा जीवन जीएंगे?”

वह व्यवस्था जो सबको एक जैसा बनाने पर आमादा है, उसका नियंत्रण किसके पास है? अधिकतर लोग ब्रिटेन, अमेरिका एवं वहां के धनपशुओं को इसका नियंता मानते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि यह व्यवस्था अब किसी के नियंत्रण में नहीं है। यह भष्मासुर का रूप ले चुकी है। जो देश और संस्थान कभी इसे नियंत्रित करते थे, आज वे स्वयं इससे भयाक्रांत हैं। 16 सितंबर, 1992 की घटना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। Black Wednesday के नाम से कुख्यात इस दिन ब्रिटेन की सरकार दिवालिया होते-होते बची थी। जार्ज सोरोस को इसके लिए जिम्मेदार बताया जाता है, किंतु वास्तव में वह तो उस व्यवस्था का एक किरदार था जिसके कारण सब कुछ हुआ। इसी प्रकार 15 सितंबर, 2008 को जिस Lehman Brothers कांड ने अमेरिका की चूल हिला दी, वह भी इसी व्यवस्था की करामात थी।

इस व्यवस्था की विध्वंसक प्रवृत्ति से दुनिया का प्रत्येक समझदार व्यक्ति परेशान है। सभी अपने-अपने तरीके से इसे रोकने-बदलने अर्थात व्यवस्था परिवर्तन में लगे हैं। भारत में इस मुहिम को आगे बढ़ाने में गोविन्दाचार्य जी की भूमिका प्रमुख है। वे कहते हैं कि हमें इस व्यवस्था को छोड़ एक ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ना है जिसकी प्राणवायु धर्म (कर्तव्य) हो। विविधीकरण, विकेन्द्रीकरण और बाजारमुक्ति की प्रवृत्ति के साथ वह व्यवस्था प्रकृति केन्द्रित विकास के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करे, ऐसी उनकी इच्छा है।

गोविन्दजी का कहना है कि जिन लोगों का उद्देश्य व्यवस्था परिवर्तन है, उन्हें राजसत्ता में शामिल नहीं होना चाहिए। सरकार में घुसकर व्यवस्था को बदलने का विचार वे सिरे से खारिज कर देते हैं। पिछले 17 वर्षों में उन्हें मैंने बार-बार यह दोहराते सुना है कि व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ने के लिए अलग किस्म के लड़ाके, अलग किस्म के औजार और बिल्कुल अलग तौर-तरीके इस्तेमाल करने पड़ेंगे, क्योंकि पारंपरिक तरीकों से इस व्यवस्था को एक खरोंच भी नहीं दी जा सकती।

दिल्ली में तीन-तीन सत्ता परिवर्तन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले गोविन्दाचार्य ने बड़े करीब से देखा है कि व्यवस्था परिवर्तन की गाड़ी सत्ता के गलियारों में घुसते ही कैसे पंचर हो जाती है। इसलिए वे चाहते हैं कि व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में जब अगली बार गाड़ी बढ़े तो वह सत्ता के गलियारों की ओर कूच करने की बचाए देश के लाखों गांवों और गली-मोहल्लों तक पहुंचने की कोशिश करे, क्योंकि व्यवस्था परिवर्तन वहीं से संभव है।

व्यवस्था परिवर्तन पर गोविन्दाचार्य जी के विचारों को समझने-बूझने की पक्रिया में मेरा मन मुझे एक नई संभावना की ओर ले गया। मैं अचानक सोचने लगा कि क्यों न मिशन तिरहुतीपुर को व्यवस्था परिवर्तन का प्रस्थान बिंदु बना दिया जाए? क्यों न तिरहुतीपुर से एक ऐसी गंगोत्री निकाली जाए जो वर्तमान व्यवस्था के कलुष को धोते हुए एक नई व्यवस्था का सूत्रपात कर दे? कुछ आगे सोचूं, उसके पहले ही मन ने सवाल उठाया, क्या यह संभव है…?

 मिशन तिरहुतीपुर का जर्मन कनेक्शन

मई, 2020 में मैंने मिशन तिरहुतीपुर को व्यवस्था परिवर्तन से जोड़ते हुए एक छोटा सा नोट तैयार किया और उसे गोविन्दजी को दिखाया। इस नोट पर गोविन्दजी की प्रतिक्रिया बहुत अच्छी थी लेकिन उन्होंने एक आशंका व्यक्त की। उन्होंने मुझे सावधान करते हुए पूछा, “तुम्हारी आर्थिक स्थिति मुझसे छिपी नहीं है। मैं भी अभी कोई मदद करने की हालत में नहीं हूं, ऐसे में इतनी महत्वाकांक्षी योजना पर काम कैसे करोगे?”

मैंने कहा, “ठीक उसी तरह जैसे जनरल Seeckt के नेतृत्व में जर्मन सेना ने किया था।” यह कहते हुए मेरा ध्यान अनायास ही उस लेक्चर की ओर चला गया जिसे मैंने स्वयं गोविन्दजी को दिखाया था। German Army Mechanization – Dr. Louis A. Dimarco के नाम से यह लेक्चर आज भी यूट्यूब पर उपलब्ध है। दिसंबर, 2017 में तत्कालीन राज्यसभा सदस्य श्री बसवराज पाटिल जी के दिल्ली वाले फ्लैट पर इसे प्रोजेक्टर के जरिए दिखाने की विशेष व्यवस्था की गई थी। जब मैंने इस लेक्चर का उल्लेख किया तो गोविन्द जी को सारी बात तुरंत याद आ गई और उन्होंने मुझे आगे बढ़ने की अनुमति दे दी।

मैं स्पष्ट कर दूं कि मिशन तिरहुतीपुर की बुनियाद में संवाद, सहमति और सहकार जैसे विचार हैं। इसका किसी प्रकार के युद्ध और हिंसा से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर मेरी युद्धों के इतिहास और उनसे जुड़े सिद्धांतों में खूब रुचि है। मैं अपने जीवन की हर छोटी-बड़ी चीज में उनका इस्तेमाल करता हूं। मैं ही क्या, आजकल पूरा कारपोरेट जगत इन सिद्धांतों का दीवाना है। हर बड़ा कारपोरेट प्लानर अपने पास चाइनीज जनरल Sun Tzu की किताब The Art of War और जापानी योद्धा Miyamoto Musashi की पुस्तक The Book of Five Rings जरूर रखता है। युद्ध आधारित ऐसी दर्जनों किताबें हैं जो आज बिसनेस स्कूल्स में सभी विद्यार्थियों को पढ़ने के लिए कही जाती हैं। ऐसे में अगर मैंने भी इन किताबों को पढ़ा और मिशन तिरहुतीपुर के संदर्भ में उनका उपयोग किया, तो इसमें आश्चर्य कैसा?

मई, 2020 में जहां मैं खड़ा था, ठीक सौ साल पहले जर्मन सेना भी वहीं खड़ी थी। संसाधनों का अभाव एक ऐसा बिंदु था जहां मेरी और जर्मन सेना की स्थिति एक जैसी थी। सच कहें तो जर्मन सेना की स्थिति मेरे से भी ज्यादा खराब और हताश करने वाली थी। विजेता देशों ने वर्शाई की संधि में उसे पंगु बना दिया था। टैंक, लड़ाकू जहाज, युद्धपोत, भारी तोपखाना, कुछ भी रखने की अनुमति उसे नहीं थी। सैनिकों और अफसरों दोनों की संख्या एकदम से घटा दी गई थी। सैन्य अफसरों को प्रशिक्षित करने की उसकी प्रसिद्ध एकेडमी तक बंद करवा दी गई थी। और तो और देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो चुकी थी। इसलिए सरकार की ओर से भी किसी खास आर्थिक मदद की गुंजाइश नहीं थी। ऐसे माहौल में सब मान बैठे थे कि अतीत की यशस्वी जर्मन सेना अब एक मामुली सी दंतहीन पुलिस फोर्स बनकर रह जाएगी।

लेकिन इतिहास गवाह है कि ऐसा नहीं हुआ। तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल Seeckt ने अपने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जो दुनिया सोच रही है, वह मत सोचो। कुछ ऐसा सोचो जो बिल्कुल अलग हो, जिसकी कोई कल्पना भी न कर सके। जैसा कि आप जानते हैं, दुनिया की सेनाएं उन दिनों खंदक खोदकर उसमें अपने को छिपा लेती थीं और वहीं से टिक कर युद्ध करती थीं। पहला विश्वयुद्ध ऐसे ही हुआ था। सब मान रहे थे कि अगला भी ऐसे ही होगा। इसी मान्यता के साथ यूरोप की सेनाएं स्वयं को बेहतर बनाने में लगी हुई थीं। लेकिन जर्मन सेना में खंदक युद्ध की तैयारी करना तो दूर, उस पर बात करना भी प्रतिबंधित था। वहां स्वयं को बेहतर बनाने पर नहीं बल्कि एकदम से कुछ नया करने पर जोर था। वहां युद्ध की एक नई शैली विकसित की जा रही थी जिसे आकार देने में प्रचुर संसाधनों का नहीं बल्कि उर्वर मेधा शक्ति का उपयोग हो रहा था। यह सिलसिला 1920 से लेकर 1934 तक चला और अंततः जर्मन सेना ने एक ऐसी युद्धशैली विकसित कर ली जिसका जवाब उस समय किसी भी सेना के पास नहीं था। दुनिया उस शैली को आज Blitzkrieg के नाम से जानती है।

जर्मन सेना का उदाहरण मेरे सामने था। इसलिए अपने आर्थिक अभाव पर मातम मनाने की कोई जरूरत नहीं थी। चूंकि कोरोना के कारण कहीं भी आना-जाना नहीं हो रहा था, इसलिए लगभग 5 महीने मैंने कागज, कंप्यूटर और किताबों के बीच पूरी एकाग्रता के साथ बिताए। भारतीय और पाश्चात्य जगत का जो भी ज्ञान मेरे लिए सुलभ था, उसका उपयोग करते हुए मैंने मिशन तिरहुतीपुर के रोडमैप पर काम किया। इस प्रक्रिया में मिलिट्री प्लानिंग के सर्वमान्य सिद्धांत मेरे लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हुए।

अगर मिलिट्री की भाषा में कहें तो उस दौरान गोविन्दाचार्य जी मेरे कमांडर थे और मैं उनका स्टाफ आफीसर। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि ‘स्टाफ’ शब्द का सैनिक संदर्भ में विशेष अर्थ होता है। यह एक ऐसी परिकल्पना है जिसे विकसित करने में प्रशिया (जर्मनी) का सर्वाधिक योगदान रहा है। वहां पहली बार 1810 में एक ऐसी एकेडमी बनाई गई जहां केवल स्टाफ आफीसर्स को प्रशिक्षण दिया जाता था। स्टाफ के लोग क्या और कैसे करते हैं, इस पर हजारों पृष्ठ का साहित्य उपलब्ध है। लेकिन यदि संक्षेप में बताना हो तो स्टाफ आफीसर उसे कहते हैं जो अपने मुख्य सेनापति द्वारा निर्धारित सैन्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए योजना बनाता है, उन योजनाओं को आदेश में बदलता है और उसे सेना तक पहुंचाने की व्यवस्था भी करता है। रणनीतिक निर्णय लेने के लिए आवश्यक सभी तरह की सूचनाओं को जुटाने और उन्हें अपने कमांडर को उपलब्ध कराने में भी स्टाफ आफीसर्स की प्रमुख भूमिका होती है।

जहां तक मेरे कमांडर गोविंदजी की बात है तो उनका लक्ष्य है – व्यवस्था परिवर्तन। एक स्टाफ आफीसर के नाते मुझे इसी के लिए काम करना था। लाकडाउन के कारण उनसे मिलना संभव नहीं था, लेकिन फोन और इंटरनेट के सहारे उनसे संपर्क बना रहा और उनका निरंतर मार्गदर्शन मिलता रहा। मैं जो भी डाक्यूमेंट्स तैयार करता, उन्हें ईमेल के माध्यम से गोविन्दजी को भेजता जा रहा था। जहां जरूरत होती, डाक्यूमेंट्स को सुधारने की प्रक्रिया भी साथ-साथ चल रही थी। इस प्रकार 5 महीने लगातार काम चला। सितंबर बीतते-बीतते मिशन तिरहुतीपुर का 654 पृष्ठों का एक रोड मैप तैयार हो गया, जिसमें अगले 7 वर्षों की एक विस्तृत किंतु बहुत ही लचीली कार्ययोजना आकार ले चुकी थी।

क्या है हमारे रोडमैप में ?

आपको रामचरित मानस का वह प्रसंग बहुत अच्छे से याद होगा जब मां सीता की खोज में हनुमान जी समुद्र पार कर लंका जा रहे थे और रास्ते में उनकी भेंट सुरसा से हुई थी। सुरसा उन्हें अपना आहार बनाने के लिए आतुर थी। लेकिन वह जैसे ही अपना मुंह खोलती, हनुमान जी अपना आकार बढ़ाकर दोगुना कर लेते। इसके बाद सुरसा भी अपना मुंह बढ़ाकर हनुमान जी से दोगुना कर लेती। यह सिलसिला जब खत्म नहीं हो रहा था तो हनुमानजी ने एक नई रणनीति अपनाई। तुलसीदास जी इस प्रसंग का वर्णन करते हुए कहते हैं, “जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।” अगर मैं कहूं कि मिशन तिरहुतीपुर का पूरा रोडमैप हनुमान जी की इसी रणनीति पर आधारित है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी।

वास्तव में आज की व्यवस्था को बड़ा बनकर नहीं, बल्कि छोटा बनकर, या यूं कहें कि सूक्ष्म बनकर ही वश में किया जा सकता है और उसे बदला जा सकता है। जटिल व्यवस्थाओं का विकल्प रातोंरात किसी एक कारण, घटना या प्रयास के चलते खड़ा नहीं होता। यह देखने में आता है कि प्रायः बड़े बदलावों के पीछे का मूल कारण बहुत ही छोटा होता है। समय बीतने के साथ परिस्थितियां हर अगले कारण को पिछले कारण से अधिक महत्वपूर्ण और बड़ा बनाती जाती हैं। Edward Lorenz द्वारा प्रतिपादित Butterfly Effect (Chaos Theory) के द्वारा इस बात को बहुत अच्छे से समझा जा सकता है।

इसी बात को एक और विद्वान जॉन गॉल की मशहूर किताब- Systemantics: How Systems Work and Especially How They Fail में भी समझाया गया है। इसमें लेखक कहता है कि यदि आप किसी जटिल और विशाल व्यवस्था का विकल्प खड़ा करना चाहते हैं तो आपको उसके समानांतर दूसरी जटिल और विशाल व्यवस्था खड़ी करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। ऐसा प्रयास कभी भी सफल नहीं हो सकता। उसकी असफलता 100 प्रतिशत सुनिश्चित है।

जॉन गॉल आगे कहता है, “एक सरल और सफल प्रणाली ही धीरे-धीरे विकसित होते हए किसी जटिल किंतु सफल प्रणाली के जन्म का कारण बनती है। जब किसी जटिल प्रणाली को एक ही बार में शुरू से लेकर अंत तक डिजाइन किया जाता है तो वह कभी भी कारगर नहीं हो सकती। बाद में इसे सुधार कर भी कारगर नहीं बनाया जा सकता। आपको यदि एक जटिल और कारगर प्रणाली बनानी है तो उसकी शुरुआत हमेशा एक छोटी और सरल प्रणाली से ही करनी पड़ेगी।”

संक्षेप में कहें तो शुरुआती पहल का सूक्ष्म और सरल होना ही मिशन तिरहुतीपुर की मुख्य रणनीति है। इसके अंतर्गत तिरहुतीपुर की सीमा के भीतर एक ऐसा माड्यूल विकसित करने की योजना है जो बहुत ही सरल किंतु प्रभावी हो। यह मॉड्यूल भौगोलिक दृष्टि से छोटा किंतु विषय की दृष्टि से व्यापक होगा। उसमें ग्रामीण जीवन के सभी आयाम समाए होंगे। इन आयामों को 9 सेक्टर्स में बांटा गया है जो इस प्रकार हैं- 1. मीडिया, 2. सार्वजनिक जुटान, 3. आधारभूत निर्माण, 4. संगठन, 5. शिक्षा, 6. कृषि, 7. गैर कृषि उत्पादन, 8. व्यापार और 9. सेवा क्षेत्र। प्रत्येक सेक्टर में अलग-अलग प्रोजेक्ट्स है जिनकी संख्या 100 से अधिक है। इन सभी सेक्टर्स और प्रोजेक्ट्स को अपने में समेटे हुए मिशन का पहला मॉड्यूल बरगद के बीज जैसा होगा। आकार में बहुत छोटा लेकिन अपने अंदर विशाल वृक्ष की संभावना छिपाए हुए।

मिशन के रोडमैप में सात वर्षों की कार्ययोजना है। इस दौरान जिस कार्यपद्धति को अपनाया जाएगा, उसे प्रबंधन की भाषा में OODA Loop (Observation, Orientation, Decision, Action) कहते हैं। मूल रूप से इसे एक अमेरिकी पायलट John Boyd ने विकसित किया था, लेकिन अब इसका हर जगह इस्तेमाल होता है। इस पद्धति में उक्त चारों क्रियाओं को एक समय चक्र (लूप) में बार-बार दोहराना होता है। मिशन के संदर्भ में यह लूप तीन तरह का होगा- पहला एक सप्ताह का, दूसरा तीन महीने का और तीसरा सात साल का। दूसरे शब्दों में कहूं तो यहां 7 दिन का सेकंड, 3 महीने का मिनट और 7 वर्ष का घंटा होगा। व्यवस्था परिवर्तन के लिए प्रयास करते समय इसी घड़ी का इस्तेमाल किया जाएगा।

सुविधा की दृष्टि से अभी मैं केवल सात वर्ष के लूप का विवरण दे रहा हूं जो 2020 के दशहरा से शुरू होकर 2027 के दशहरा तक पूरा होगा। इस बीच OODA Loop की सभी चारों क्रियाएं निष्पादित की जाएंगी। यद्यपि इन क्रियाओं की समय सीमा में ओवरलैपिंग की संभावना हमेशा रहेगी, फिर भी उनका निर्धारित समय इस प्रकार हैः

  • ऑब्जर्वेशन- (2020-22)- सबसे पहले गांव को उसकी समग्रता में देखने, समझने और उससे संवाद स्थापित करने का काम होगा। यह प्रक्रिया तिरहुतीपुर से शुरू होगी किंतु धीरे-धीरे इसमें देश भर के कई गांव शामिल किए जाएंगे, जिसमें से एक गांव आपका भी हो सकता है। इस दौरान मिशन स्वयं को एक पत्रकार और शोधार्थी की भूमिका में ही सीमित नहीं रखेगा, बल्कि वह उस वैज्ञानिक की भूमिका भी निभाएगा जो एक निष्कर्ष तक पहुंचने के पहले ढेर सारे प्रयोग करता है। मिशन के छोटे-छोटे प्रयोग कुछ इस तरह डिजाइन किए गए हैं और किए जाएंगे कि उनके द्वारा अलग-अलग प्रोजेक्ट्स की ग्राउंड टेस्टिंग हो सके। इस चरण के लिए Peter Sims की किताब Little Bets को एक तरह से मिशन ने अपना गाइड मान लिया है।
  • ओरिएंटेशन- (2022-24) इन दो वर्षों में मिशन अपने आदर्श मॉड्यूल को पूरी समग्रता के साथ तिरहुतीपूर में लागू करेगा। इस दौरान सभी 9 आयामों से जुड़े विविध प्रोजेक्ट्स को इस प्रकार लागू किया जाएगा कि उनके सम्मिलित प्रभाव से गांव के स्तर पर व्यवस्था परिवर्तन का लक्ष्य एक हद तक पूरा हो जाए। अगर ऑब्जर्वेशन वाले चरण में छिटपुट प्रोजेक्ट्स की टेस्टिंग होगी तो ओरिएंटेशन वाले चरण में मिशन अपने मॉड्यूल को उसकी समग्रता में परखने का प्रयास करेगा। हालांकि इस चरण में यह प्रयोग केवल तिरहुतीपुर और आस-पास के कुछ गांवों तक ही सीमित रहेगा।
  •  डिसीजन- (2024-25) 2024 के अंत तक मिशन अपने मॉड्यूल को अच्छे से जांच-परख के उसे पूरी तरह से तराश चुका होगा। इसके बाद मिशन उन तमाम संभावनाओं और अवसरों की तलाश करते हुए वे सभी निर्णय लेगा जिससे उसका माड्यूल देश भर के गांवों में लागू किया जा सके।
  •  ऐक्शन- (2025-27) इस दौरान देश के प्रत्येक 127 इको-एग्रो क्लाइमेटिक जोन में कम से कम एक मॉड्यूल को पाइलट मॉड्यूल मानते हुए लागू करने का प्रयास किया जाएगा।

उपर्युक्त टाइमलाइन और संभावनाएं प्रबंधन के आधुनिकतम सिद्धांतों के अनुरूप हैं। तथापि जर्मनी (प्रशिया) के पहले चीफ आफ स्टाफ – Field Marshal Helmuth von Moltke की उस मशहूर कोटेशन का उल्लेख यहां प्रासंगिक है जिसमें वह कहता है – No battle plan ever survive the first contact with the enemy. अर्थात हम किसी योजना को ज्यों लागू करते हैं, उसकी कमियां उजागर होने लगती हैं और हमें उसमें कुछ नया जोड़ने या घटाने की जरूरत महसूस होती है। मिशन तिरहुतीपुर का रोडमैप इतना लचीला है कि वह इस सत्य को आसानी से झेल सकता है।

 कर्स आफ नालेज” से बचने की कोशिश

कोरोना काल-1 में कई महीनों के चिंतन-मनन और पठन-पाठन के बाद 16 अक्टूबर, 2020 के दिन मैं पत्नी के साथ गांव के लिए रवाना हो गया। चूंकि कोरोना के कारण रेलयात्रा सुरक्षित नहीं थी, इसलिए अपनी कार से ही गांव जा रहा था। रात में कानपुर में अपने मित्र सुरेश अग्निहोत्री जी के यहां रुका, उनसे मिशन के बारे में जरूरी विचार-विमर्श किया और अगले दिन सुबह-सुबह तिरहुतीपुर के लिए रवाना हो गया। रास्ते में लखनऊ और अयोध्या के अपने मित्रों-परिचितों और गुरूजनों से मिलते-मिलाते जब गांव पहुंचा तो रात हो गई थी। रात में किसी से कोई खास बात नहीं हुई, किंतु सुबह उठा तो देखा कि सबकी आंखों में सवालों का समुन्दर हिलोरें मार रहा था। मेरे पास सभी के सवालों के जवाब थे। लेकिन कुछ बोलूं, उसके पहले मुझे वेदव्यास जी की व्यथा याद आ गई।

चारों वेदों के संकलनकर्ता तथा महाभारत और भागवत् पुराण जैसे दिव्य ग्रंथों के रचयिता वेदव्यास जी महाज्ञानी थे। भारतीय संस्कृति का संपूर्ण ज्ञान एक तरह से उनके भीतर समाया हुआ था। लेकिन वे इस बात से व्यथित थे कि कोई उनकी सुनता क्यों नहीं। वे कहते हैं – “ऊर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित् शृणोति माम्, धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते?” अर्थात “मैं बाँहें उठाकर लोगों को समझा रहा हूँ कि धर्म से ही अर्थ और काम की प्राप्ति होती है, इसलिए क्यों नहीं धर्म के मार्ग पर चलते? पर कोई मेरी सुनता ही नहीं।” सूर्यकांत बाली जी ने अपनी पुस्तक भारत गाथा में इस प्रसंग का बहुत विस्तार से वर्णन किया है। प्रश्न उठता है कि सबकुछ जानते हुए भी वेदव्यास जी अपनी बात लोगों को क्यों नहीं समझा पा रहे थे?

अपनी बात दूसरों को न समझा पाने की समस्या कसान्ड्रा -Cassandra नामक एक राजकुमारी की भी थी जिसका उल्लेख ग्रीक मिथकों में हुआ है। कसान्ड्रा ट्राय के राजा की बेटी थी। एक वरदान के कारण भविष्य की घटनाएं उसे साफ-साफ दिखाई देती थीं लेकिन विडंबना यह थी कि उसकी बातों पर कोई भरोसा नहीं करता था। जब यूनान का ट्राय के साथ युद्ध शुरू हुआ तो उसने सबको बताया था कि यूनानी सैनिक लकड़ी के घोड़े में छिपकर शहर के अंदर आएंगे और शहर को तबाह कर देंगे। लेकिन उसकी चेतावनी पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। वह अपने शहर को बरबाद होने से बचा नहीं पाई और यूनानियों ने पूरे शहर को राख में मिला दिया।

जब आप किसी विषय पर खूब अध्ययन कर लेते हैं और उसके बारे में पर्याप्त अनुभव जुटा लेते हैं, तो आपके अंदर भी कुछ हद तक भविष्य को देखने-जानने की क्षमता विकसित हो जाती है। आप जान जाते हैं कि क्या करने से अच्छा होगा और क्या करने से खराब। यहां तक तो सब ठीक रहता है। चुनौती तब उत्पन्न होती है जब आप अपनी जानकारी के आधार पर उन लोगों को कुछ करने या कुछ नहीं करने के लिए समझाते हैं, जिन्होंने न तो आपके जितना अध्ययन किया है और न ही आप के जितना उन्हें अनुभव है। यह चुनौती तब विकट समस्या बन जाती है जब आप यह भूल जाते हैं कि आपके और आपकी बात सुनने वालों के बीच ज्ञान और अनुभव का कितना अंतर है। जब भी ऐसा होता है तो संवाद खत्म हो जाता है और आपकी बात अनसुनी रह जाती है।

हम सभी ज्ञान और अनुभव के मामले में एक-दूसरे से अलग होते हैं। कुछ मामलों में हम विशेषज्ञ तो अधिकतर मामलों में साधारण होते हैं। इसमें कोई समस्या नहीं। समस्या तब आती है जब हम इस अलगाव का और इस अंतर का सही-सही आकलन किए बिना ही अपने निष्कर्षों को दूसरों से साझा करने और उसे थोपने में लग जाते हैं। हम यह मानकर संवाद करते हैं कि सामने वाले की और हमारी मान्यताएं, प्राथमिकताएं एक जैसी हैं। हमें लगता है कि हम जो जानते, मानते और महसूस करते हैं, सामने वाला भी कमोबेश वही जानता, मानता और महसूस करता है। मनोविज्ञान में इस प्रवृत्ति को Curse of Knowledge कहते हैं।

आप कैसे बचेंगे ?

मनोविज्ञानी “कर्स आफ नालेज” को Cognitive Bias की श्रेणी में रखकर अध्ययन करते हैं। यह प्रवृत्ति प्रत्येक मनुष्य में जन्मजात होती है – किसी में कम किसी में ज्यादा। कोई भी इससे बच नहीं सकता। हां इसके बारे में जानकर इसके असर को धीरे-धीरे कम जरूर किया जा सकता है। आप के ऊपर “कर्स आफ नालेज” का जितना असर होगा, उसी अनुपात में इससे जुड़े दुष्परिणाम दिखाई देंगे। उदाहरण के लिए-

  • (1) आप दूसरों के व्यवहार का सही-सही अनुमान नहीं लगा पाएंगे। आप प्रायः यह सोचेंगे कि फलाने व्यक्ति ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया?
  • (2) आप स्वयं अपने अतीत के व्यवहार को अच्छे से समझ नहीं पाएंगे। आप बार-बार खुद से पूछेंगे कि मेरे साथ ऐसा क्यों हुआ?
  • (3) आप अक्सर कहते हुए मिलेंगे कि लोग तो मेरी बात ही नहीं सुनते।
  • (4) आप जिन चीजों के विशेषज्ञ हैं, उसे नौसिखियों (विद्यार्थियों) को अच्छे से नहीं समझा पाएंगे।
  • (5) आप अपने सामने वाले को बोलने का बहुत कम मौका देंगे।
  • (6) आप को यह भी खीझ हो सकती है कि लोगों को आपकी बात समझ में नहीं आती। इसी के साथ यदि अलग-अलग विशेषण के साथ आप लोगों को कोसने का भी काम करते हैं तो सावधान हो जाइए, आप “कर्स आफ नालेज” के शिकंजे में हैं।

“कर्स आफ नालेज” से निपटने का सबसे अच्छा तरीका है कि जब भी आपका किसी नए व्यक्ति या नई परिस्थिति से सामना हो तो एक क्षण के लिए अपनी पूर्व सूचनाओं, धारणाओं और अपेक्षाओं को किनारे ऱख दीजिए। आपको चीजों को उनके वास्तविक स्वरूप में देखना सीखना पड़ेगा। बिना ऑब्जर्वेशन और इनवेस्टिगेशन किए ही, धारणा बना लेने से बड़ा नुक्सान होता है। प्रसिद्ध जासूसी उपन्यास का नायक शेरलाक होम्स अपने सहायक डा. वाट्सन को एक केस (The Scandal of Bohemia) में डांटते हुए कहता है, “You see, but you do not observe”. यह डांट केवल वाट्सन पर ही नहीं, बल्कि कमोबेश हम सब पर लागू होती है।

यह सच है कि “कर्स आफ नालेज” का असर प्रत्येक मनुष्य पर होता है, लेकिन जो लोग समाज सुधार या व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं, उन पर इसका सबसे अधिक असर होता है। ये लोग दो प्रकार के होते हैं। पहले वे जो क्रांति की बात करते हैं और दूसरे वे जो क्रमिक बदलाव के पक्षधर होते हैं। क्रांति की बात करने वालों में जहां “कर्स आफ नालेज” आउट आफ कंट्रोल होता है तो वहीं क्रमिक बदलाव की बात करने वालों में यह कंट्रोल में होता है।

चूंकि मैं क्रमिक बदलाव का पक्षधर हूं, इसलिए संभवतः “कर्स आफ नालेज” मेरे मामले में आउट आफ कंट्रोल नहीं है। इसे और कम करने के लिए हमने अपने रोडमैप में दो साल के आब्जर्वेशन पीरियड (2020 से 2022) का विशेष प्रावधान किया है। मेरा मानना है कि “कर्स आफ नालेज” जितना कम रहेगा, संवाद उतना ही बेहतर होगा।

इसी निष्कर्ष के साथ मैंने गांव में अपने परिवार और अन्य लोगों के साथ बात-चीत का सिलसिला शुरू किया। सभी को तुरंत सब कुछ समझा देने की मुझे कोई जल्दी नहीं थी। मेरी बातें मुख्यतः 26 अक्टूबर 2020 दशहरा के दिन गोविन्दजी की प्रस्तावित यात्रा पर केन्द्रित थीं।

 

मैं गांव गोद नहीं लूंगा

विजयदशमी के दिन 26 अक्टूबर, 2020 को सुबह-सुबह गोविन्दाचार्य जी मेरे घर पर आ गए थे। जैसा कि मैं पहले बता चुका हूं, तिरहुतीपुर ग्राम पंचायत में दो गांव हैं- एक सुंदरपुर कैथौली और दूसरा तिरहुतीपुर। मेरा घर सुंदरपुर कैथौली में है जबकि गोविन्दजी का औपचारिक कार्यक्रम तिरहुतीपुर गांव में रखा गया था जो मेरे घर से लगभग डेढ़ किमी दूर है। वैसे तो यह दूरी ज्यादा नहीं है लेकिन दोनों गांवों के बीच में बहने वाली बेसो नदी के कारण इसकी अनुभूति अधिक होती है। दुर्भाग्यवश कुछ महीने पहले नदी पर बना पुराना पुल टूट गया था जिसके कारण इस दूरी का एहसास और बढ़ गया था। टूटे पुल की बात से मैं थोड़ा चिंतित भी था। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि गोविन्दजी को तिरहुतीपुर कैसे ले जाया जाए?

उधर गोविन्दजी मेरी चिंता से बेखबर गांव में आकर प्रशन्न थे। वे जल्दी ही मेरे परिवार के सभी सदस्यों से घुलमिल गए। बता दूं कि गांव में मेरा एक संयुक्त परिवार है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस इलाके में संयुक्त परिवार की परंपरा अभी भी जीवित है। हालांकि इसके स्वरूप में बहुत बदलाव आ गया है। पहले जहां यह अतिशय केन्द्रित व्यवस्था हुआ करती थी, वहीं अब इसने ढीले-ढाले संघात्मक ढांचे का रूप ले लिया है। लेकिन जिस तेजी से स्थिति बदल रही है, उसे देख कर लगता है कि यह व्यवस्था अपने मौजूदा स्वरूप में बहुत देर तक नहीं चल पाएगी।

गांव में हमारा परिवार जिस घर में रहता है उसे दादाजी ने 1967 में बनवाया था। घर पर्याप्त बड़ा है, लेकिन पुराने डिजाइन का है। इसे एक किसान परिवार की जरूरत के हिसाब से बनाया गया था। उस समय पुरुष लोग प्रायः घर के बाहर दालान में ही रहते थे। मकान कुछ इस तरह बना है कि पुरुषों को आज भी आमतौर पर घर के बाहर ही रहना पड़ता है। इसमें किसी को कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन अपनी किताबों और लैपटाप के साथ मेरे लिए ऐसा कर पाना संभव नहीं था। इसलिए मैंने अपने लिए एक कमरे का इंतजाम कर लिया था।

26 अक्टूबर को गोविन्दाचार्य जी मेरे गांव में पहली बार नहीं आए थे। इसके पहले जुलाई 2018 में वे यहां आ चुके थे। उस बार जिज्ञासावश वे तिरहुतीपुर में कुछ लोगों से मिलने गए थे। तब गांव घूमते हुए अपने एक खेत की ओर इशारा करके मैंने मजाक में कहा था कि गोविन्दजी यहां आपका एक आश्रम बने तो कैसा रहेगा? गोविन्दजी मेरी बात सुन कर कुछ बोले नहीं, बस मुस्कुराते हुए जमीन के उस टुकड़े को देखने लगे जिस पर उस समय धान की फसल लहलहा रही थी।

अप्रैल, 2020 में जब गोविन्दजी ने तिरहुतीपुर को अपना स्थायी निवास बनाने का निर्णय लिया तो मुझे तुरंत वह जमीन और आश्रम वाली बात याद आ गई। इसके बाद मैंने घर वालों से बात करके लगभग डेढ़ एकड़ का वह भूखंड गोविन्दजी के प्रयोग के लिए मांग लिया। तब से लेकर अब तक वह जमीन खाली पड़ी है। कह सकते हैं कि वह जमीन अब गोविन्द जी की प्रतीक्षा कर रही है कि वे वहां आएं और अपना आश्रम बना कर केवल उस गांव को ही नहीं बल्कि देश के सभी गांवों को उम्मीद की एक नई रोशनी दिखाएं।

जब मैं 17 अक्टूबर, 2020 को गांव पहुंचा तो मेरे मन में किसी औपचारिक कार्यक्रम की कोई योजना नहीं थी। मैं तो बस इतना चाह रहा था कि गोविन्दजी आएं और कुछ दिन रहकर गांव को नजदीक से देखें। किंतु घर वालों को यह पर्याप्त नहीं लग रहा था। वे एक औपचारिक कार्यक्रम भी चाह रहे थे। मेरी भी इच्छा थी कि एक औपचारिक कार्यक्रम हो, लेकिन उससे जुड़े खर्चों को सोचकर मैं चुप था। जब इस मामले में घर वालों की ओर से ही पहल की गई तो मुझे बहुत खुशी हुई।

 वह बात जो सबके दिल को छू गईः

शुरुआती चर्चा के बाद 26 अक्टूबर वाले कार्यक्रम की कमान मेरे छोटे चाचा शरद सिंह ने अपने हाथ में ले ली। उन्होंने तिरहुतीपुर में घर-घर जाकर कार्यक्रम की सूचना दी और सबको दशहरा के दिन शाम 4 बजे उसी डेढ़ एकड़ जमीन पर जुटने के लिए कहा जिसे मैंने मिशन तिरहुतीपुर के लिए घर वालों से मांगा था।

तिरहुतीपुर गांव में केवट, राजभर और मुसहर जाति के लोग रहते हैं। वहां शिक्षा का स्तर बहुत दयनीय है। गोविन्दाचार्य का नाम वहां किसी ने नहीं सुना था। इसलिए मेरे सामने समस्या थी कि गोविन्दजी का परिचय किस रूप में करवाऊं। हालांकि यह समस्या चाचा जी को नहीं थी। उन्होंने सबको बताना शुरू किया कि गोविन्दाचार्य एक बड़े नेता हैं और वे तिरहुतीपुर को गोद लेकर गांव का विकास करेंगे। मैंने चाचाजी को ‘विकास’ के मुद्दे पर जब सावधान किया तो उन्होंने अपनी प्रस्तुति का अंदाज बदल दिया। इसके बाद जब गांव वाले पूछते कि नेताजी क्या करेंगे तो चाचाजी कहते कि दशमी के दिन शाम को आकर उन्हीं के मुंह से सुन लेना। बात कुछ रहस्यमय हो गई थी, इसलिए गांव में सब गोविन्दाचार्य जी को सुनने के लिए उत्सुक थे।

तिरहुतीपुर में कार्यक्रम की तैयारी 26 अक्टूबर की सुबह से ही शुरू हो गई थी। जब शाम होने को आई तो गोविन्दजी सहित हम सब पैदल ही कार्यक्रम स्थल की ओर चल दिए। हमें नदी पार करने में कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि टूटे हुए पुल को बिजली के खंभों के सहारे कामचलाऊ बना लिया गया था। गाड़ियां आर-पार नहीं जा सकती थीं, लेकिन पैदल नदी पार करने में कोई दिक्कत नहीं थी।

जब हम कार्यक्रम स्थल पर पहुंचे, तब तक गांव के लोग, विशेष रूप से महिलाएं और बच्चे वहां पहले ही पहुंच गए थे। सब जानना चाहते थे कि दिल्ली वाले नेता जी इस गांव को गोद लेकर क्या करेंगे। मंच पर विराजमान स्थानीय वक्ताओं ने गोविन्दजी की जब तारीफ करनी शुरू की तो उनकी अपेक्षाएं और बढ़ गईं। लेकिन गोविन्दजी ने माइक संभालते ही जैसे वज्रपात सा कर दिया। उन्होंने साफ-साफ कहा कि वे गांव को गोद नहीं लेंगे। यह बात सुन कर सब लोग हक्के-बक्के रह गए। मेरे चाचाजी कुछ ज्यादा ही परेशान हो गए, क्योंकि गोद लेने वाली बात उन्होंने ही सबको बताई थी। लेकिन यह परेशानी ज्यादा देर नहीं रही। गोविन्दजी ने तुरंत स्पष्ट किया कि वे गांव को गोद में नहीं ले रहे, बल्कि खुद गांव की गोद में बैठने के लिए आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि 100 साल पहले उनके पुरखे अपने गांव से बिछुड़ गए थे और आज तिरहुतीपुर के रूप में उन्हें फिर से एक गांव मिल गया है।

गोविन्दजी की ये भाव भरी बातें सबको बहुत अच्छी लगीं। सब खुश थे, लेकिन एक बात को लेकर मैं परेशान था। मुझे मालूम था कि फिलहाल हम गांव के लोगों की एक भी अपेक्षा पूरी करने वाले नहीं हैं। हमारी प्राथमिकता और गांव वालों की प्राथमिकता में अभी कहीं कोई मेल नहीं था।

गांव की जरूरत : हार्डवेयर या साफ्टवेयर?

गोविन्दजी का तिरहुतीपुर गांव में दशहरा वाला कार्यक्रम बहुत अच्छे से संपन्न हो गया। लोगों की अपेक्षा थी कि अब हम गांव के हार्डवेयर पर अर्थात स्कूल, पुल, सड़क, बिजली, पानी, कृषि, पशुपालन आदि पर काम करेंगे ताकि गांव को मॉडल गांव बनाया जा सके। लेकिन हम फिलहाल कुछ और सोच रहे थे। गांव के हार्डवेयर पर काम जरूरी है, उसके महत्व को हम भी स्वीकार करते हैं, लेकिन हमारी प्राथमिकता में गांव का हार्डवेयर नहीं बल्कि साफ्टवेयर था। यहां साफ्टवेयर से हमारा तात्पर्य उस मानसिकता से है जिससे गांव चलते आए हैं और आगे जिनसे गांवों को चलना चाहिए। हमारी इच्छा है कि गांव को गांव बनाए रखते हुए विकास हो। विकास के नाम पर गांव का गंवईंपन ही चला गया तो इसे उचित नहीं कहा जा सकता।

सवाल उठता है कि गांव और गंवईपन क्या है? ऐसी कौन सी विशेषता है जो किसी बस्ती को गांव बनाती है? इस प्रश्न का बड़ा अच्छा उत्तर एक फिल्म में मिलता है जिसका नाम है – नदिया के पार। पूर्वी उत्तर प्रदेश के गंवई परिवेश को लेकर 1982 में बनी इस फिल्म में नायिका गुंजा नायक चंदन के साथ उसके गांव जा रही है। कुछ दूर चलने के बाद वह पूछती है, “…कितनी दूर अभी कितनी दूर है, ऐ चंदन तोरा गांव हो…” जवाब में चंदन कहता है, “…जब कोई बुलाए लेके नाम हो…” अर्थात जहां पहुंचते ही लोग मुझे मेरा नाम लेकर पुकारने लगें, समझ लेना कि वही मेरा गांव है। गांव की इतनी सटीक परिभाषा आपको शायद ही कहीं और मिले।

असल में गांव वही है जहां आप सबको जानते हैं और सब आपको जानते हैं। गांव में आप का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। वहां आप हमेशा किसी के बेटे, भाई, पिता, पति, पत्नी जैसे अनगिनत रिश्तों को  साथ लेकर चलते हैं। संबंध और जान-पहचान आपकी शहर में भी हो सकती है, वो भी हजारों मे। लेकिन वहां आपकी पहचान केवल आपकी पहचान होती है। उस पहचान के साथ संबंधों का काफिला नहीं चलता। गांव में केवल आपका ही नहीं बल्कि आपके पुरखों का भी हिसाब रखा जाता है। उनके यश-अपयश दोनों से आपको दो-चार होना पड़ता है।

जीवंत संबंध एक ऐसा पहलू है जो दुनिया के सभी गांवों में दिखाई देता है। यहां डेसमंड मोरिस की किताब – The Human Animal: A Personal View of the Human Species का उल्लेख प्रासंगिक है। इसी नाम से लेखक ने बीबीसी के लिए 6 एपीसोड में एक टीवी सीरीज भी बनाई है। इसके तीसरे एपीसोड में एक सीन है जहां एक आदमी दिल का दौरा पड़ने का नाटक करता है। पहले यह नाटक लंदन जैसे बड़े शहर में एक भीड़भाड़ वाले पैदल मार्ग पर हुआ। दूसरी बार इसे एक छोटे से गांवनुमा कस्बे में दोहराया गया। प्रयोग का परिणाम अपेक्षित था। शहर में उसे मदद मिलने में कई घंटे लगे, जबकि गांव में उसे कुछ ही मिनटों में मदद मिल गई।

इस प्रयोग पर टिप्पणी करते हुए डेसमंड मोरिस कहते हैं कि मनुष्य बड़े शहरों में रहने तो लगा लेकिन उसका मन-मष्तिष्क और उसकी जैविक संरचना अभी भी गांव नुमा माहौल में ही ठीक से काम करती है। मोरिस का कहना है कि शहरों में रहने वाले मनुष्यों का अवचेतन मन अनजान मनुष्यों को दूर किसी जंगल में उगे पेड़े-पौधों से अधिक कुछ नहीं मानता। लेकिन वही मनुष्य जब गांव के परिवेश में आता है तो उसका व्यवहार बदल जाता है। वह अपने आस-पास के अनजान मनुष्यों, पशु-पक्षियों और यहां तक की कई निर्जीव वस्तुओं से भी भावनात्मक रिश्ता बना लेता है।

जब हम गांव के विकास की बात करते हैं तो हमें सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे हर छोटे-बड़े कार्य से  गांवों की यह मूल विशेषता और मजबूत होनी चाहिए, उसे कोई नुक्सान नहीं पहुंचना चाहिए। गांव जिन खूबियों के लिए जाने जाते रहे हैं उनकी सूची बड़ी लंबी है। उदारहण के लिए अपने आस-पास के प्रति सजग रहना, एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आना, भोलापन, श्रम करने की आदत, बड़ों का सम्मान, रिति-रिवाजों के प्रति श्रद्धा, संघर्ष की प्रवृत्ति, सहअस्तित्व की भावना, समाज के काम में बढ़चढ़कर हिस्सा लेना, संयमित उपभोग और प्रकृति का उसकी तमाम विविधताओं के साथ संरक्षण आदि ऐसी कई विशेषताएं हैं जो गांवों की निशानी हुआ करती थीं।

दुर्भाग्य से गांव की ये सारी खूबियां आज खतरे में हैं। कुछ लुप्त हो चुकी हैं और कुछ लुप्त होने की कगार पर हैं। आज के गांवों में दिखावा, स्वार्थ, एकाकीपन, आलस्य, लोभ और हताशा जैसी समस्याएं उफान पर हैं। ‘बाजार’ ने गांव के लोगों को ‘आजाद’ कर दिया है। उन्हें भरोसा है कि उनकी हर आवश्यकता की पूर्ति ‘बाजार’ कर देगा। अब गांव में भी लोग एक-दूसरे से बेपरवाह हो रहे हैं। आंखों की शरम बेमानी होती जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में जातीय दुराग्रह कमजोर हुआ है किंतु अभी भी उसकी जड़ें बची हैं। ये सारे दुर्गुण गांवों को अभाव, वैमनस्य और अपसंस्कृति की ओर ले जा रहे हैं।

जब हम गांव के साफ्टवेयर पर काम करने की बात करते हैं तो असल में हम गांव के पारंपरिक गुणों को सहेजने-संवारने और दुर्गुणों को समाप्त करने की बात करते हैं। हमारा मानना है कि यदि गांव का साफ्टवेयर अर्थात गांव की मानसिकता ठीक है तो समृद्धि के बाह्य चिन्ह अर्थात हार्डवेयर सहज ही प्रकट होने लगेंगे। ऐसी स्थिति में समृद्धि का आगमन संस्कृति के साथ होगा। लेकिन अगर मानसिकता वाले पहलू पर ध्यान नहीं दिया गया तो परिणाम ठीक नहीं होंगे। पहले तो समृद्धि आएगी ही नहीं और आ भी गई तो तमाम तरह की विकृतियों के साथ आएगी।

गांवों का हार्डवेयर ठीक करने में सरकारों की सक्रिय भूमिका हो सकती है लेकिन जब बात साफ्टवेयर की आती है तो उसमें सरकार कुछ खास नहीं कर पाती। यहां तो सामाजिक पहल से ही कुछ सार्थक परिणाम निकलते हैं। मिशन तिरहुतीपुर ने इसी बात को समझते हुए गांव के साफ्टवेयर को ठीक करना अपना प्राथमिक लक्ष्य माना है। मिशन ने अपने काम के जो 9 आयाम तय किये हैं, उनमें से 4 आयाम अर्थात शिक्षा, संगठन, मीडिया और ईवेंट्स को मुख्यतः गांव के साफ्टवेयर पर ही काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। शेष 5 आयामों- आधारभूत ढांचा, कृषि, व्यापार, उत्पादन और सेवा के क्षेत्र में भी हम साफ्टवेयर वाले पहलू को लेकर विशेष उपाय करने वाले हैं।

मुझे अच्छे से मालूम है कि किसी का मन या मानसिकता बदलना बहुत ही मुश्किल काम है। उस पर भी यह बदलाव जब एक-दो गांवों में ही नहीं बल्कि देश भर के गांवों में लाना हो तो इसे लगभग असंभव माना जा सकता है। लेकिन मैं निश्चिंत था। परिणाम की मुझे चिंता नहीं थी। मेरा ध्यान तो केवल उन प्रक्रियाओं का पालन करने पर था जिन्हें मैंने गोविन्द जी की संगत और अपने अध्ययन से जाना–समझा है।