वेंटिलेटर पर चिकित्सा व्यवस्था, वायरस ही नहीं, संसाधानों की कमी से भी लड़ रहे डॉक्टर्स


भारत सहित दुनिया के 186 देशों में कोरोना का कहर जारी है। हजारों जिंदगिया लील चुके इस वायरस
से लड़ने के लिए जहां दुनिया के तामाम देश अस्पतालों की सुविधानों में बड़ा
विस्तार किया है वहीं इस रोग से लड़ने के लिए भारत की तैयारी अभी भी अधूरी है और देश के डॉक्टर्स और अस्पतालों में जरुरी संसाधनों की भारी कमी देखी जा रही है।


भास्कर ऑनलाइन भास्कर ऑनलाइन
देश Updated On :

यदि आप कोरोना कवरेज़ की तस्वीरों को याद करेंगे तो पाएंगे कि चीन के डॉक्टर सफेद रंग के बॉडी कवर में दिखते हैं। वे सभी डॉक्टर सिर से लेकर पांव तक एक विशेष प्रकार की पोशाक पहनते थे। 
इस बॉडी कवर के कई पार्ट्स होते हैं जिन्हें पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट अर्थात PPE कहते हैं। कई तस्वीरों में बॉडी कवर पर भी छिड़काव किया जाता था कि उतारने के वक्त ग़लती से कोई वायरस शरीर के संपर्क में न आ जाए। इसे एक बार ही पहना जाता है और इसे उतारने के लिए अलग कमरे में जाना होता है और विशेष तरीके से उतार कर स्नान करना होता है जो उसी कमरे के साथ होता है तब जाकर डॉक्टर अपने कपड़ों में बाहर निकलता है। देश भर के डॉक्टर अपनी सुरक्षा के लिए ज़रूरी इन बुनियादी चीज़ों को लेकर बेहद चिंतित हैं। उनके होश उड़े हैं। जब वही संक्रमित हो जाएंगे तो इलाज कैसे करेंगे? 

वैसे ही देश में डॉक्टर कम हैं, नर्स कम हैं, अगर यही बीमार हो गए, तो क्या होगा? अगर डॉक्टर पूरी तरह से सुरक्षा के उपकरणों से लैस नहीं होंगे तो मरीज़ के करीब ही नहीं जाएंगे। तो अंत में इसकी कीमत मरीज़ भी चुकाएंगा।  भारत में इस वक्त कितने PPE उपलब्ध हैं? क्या आपको पता है कि भारत को हर दिन पांच लाख PPE की ज़रूरत है? कितना है पता नहीं। लेकिन एक रिपोर्ट के अनुसार सरकार ने इसके लिए सरकारी कंपनी HLL को आर्डर किया है कि वह मई 2020 तक साढ़े सात लाख PPE,  60 लाख N-95 मास्क और एक करोड़ तीन प्लाई मास्क तैयार कर दे। 

 क्या यह संकट देश से छुपाया गया? क्या सरकार सोती रही? आपको बता दें कि अभी दो दिन पहले ही बिहार के दरभंगा मेडिकल कालेज के डॉक्टरों ने काम करने से मना कर दिया है। उनके पास ज़रूरी दास्ताने और मास्क नही है। भागलपुर मेडिकल कालेज और पटना मेडिकल कालेज के डाक्टर और मेडिकल छात्रों के होश उड़े हैं कि बग़ैर सुरक्षा उपकरणों के कैसे मरीज़ के करीब जाएंगे। सरकार जानबूझ कर उन्हें मौत के मुंह में कैसे धकेल सकती है?  

एम्स के रेज़िडेंट एसोसिएशन ने डायरेक्टर को पत्र लिखा है। जब RDA ने एम्स के अलग अलग वार्ड में चेक किया कि आपात स्थिति में कितने पर्सनल प्रोटेक्टिव गियर हैं तो पता चला कि ज़्यादातर वार्ड में डॉक्टरों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी सामान नहीं हैं। RDA ने एम्स प्रशासन से अनुरोध किया है कि डॉक्टरों और नर्स के लिए PPE की पर्याप्त व्यवस्था की जाए। खबरों  के अनुसार जबलपुर में मध्यप्रदेश के चार कोरोना वायरस से पीड़ित मरीज़ भर्ती हैं। इस अस्पताल में N-95 मास्क सभी डॉक्टर के लिए नहीं हैं। रही बात PPE की तो वह है ही नहीं। क्या यह क्रिमिनल नहीं है? 

 दिसंबर, जनवरी और फरवरी गुज़र गया, इस मामले में क्या तैयारी थी? क्या हमारे डॉक्टरों की सुरक्षा उन्हें थैंक्यू बोलने से हो जाएगा, क्या उनके लिए सुरक्षा के उपकरण पर्याप्त मात्रा में पहले से तैयार नहीं होने चाहिए? तो फिर हम तैयारी के नाम पर क्या कर रहे थे? एक रिपोर्ट के अनुसार 18 मार्च को प्रधानमंत्री राष्ट्र के नाम संबोधन करते हैं। 19 मार्च को सरकार भारत में बने PPE के निर्यात पर रोक लगाती है। इसके तीन हफ्ते पहले यानि 27 फरवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बता दिया था कि कई देशों में PPE की सप्लाई बाधित हो सकती है। 

 तीन हफ्ते तक सरकार सोती रही। आखिर जनवरी से लेकर मार्च कर निर्यात की अनुमति क्यों दी गई? भारत में 30 जनवरी को पहला केस सामने आता है। 31 जनवरी को विदेश व्यापार निदेशालय हर प्रकार के PPE के निर्यात पर रोक लगता है। लेकिन 8 फरवरी को सरकार इस आदेश में संशोधन करती है। सर्जिकल मास्क और दास्तानों के निर्यात की अनुमति दे देती है। 25 फरवरी को जब इटली में संक्रमण से 11 मौतें हो चुकी थीं तब भारत सरकार एक बार और इस आदेश में ढील देती है। आठ नए आइटमों के निर्यात की अनुमति दे देती है। 

यानि 31 जनवरी के आदेश को पानी-पानी कर देती है।   नतीजा यह है कि आज भारत के डॉक्टरों और नर्स के पास सुरक्षा के उपकरण नहीं हैं? आज भारत के डॉक्टर सुरक्षित नहीं हैं। उन्हें संक्रमण का ख़तरा है।ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क की असोला कहती हैं कि मई 2020 तक HLL को साढ़े सात लाख PPE की सप्लाई करने को कहा गया है जबकि हर दिन 5 लाख PPE की ज़रूरत है। वहां अगर देखा जाए तो ऐसे विषयों की रिपोर्टिंग सिर्फ कुछ अख़बारों और वेबसाइट पर हो रही है। न्यूज़ चैनल अभी भी जागरूकता के नाम पर प्रोपेगैंडा कर रहे हैं। 

वहां केवल हाथ साफ कैसे रखें और बीमारी के लक्षण की बेसिक जानकारी दी जा रही है। तैयारी को लेकर सारी सूचनाएं नहीं हैं। वहीं जिम्मेदाराना पदों पर ऐसे ऐसे डॉक्टर बैठे हैं जो सरकार से दो सवाल नहीं कर सकते। क्या ये डॉक्टर दोषी नहीं हैं? प्रोपेगैंडा की भी एक सीमा होती है। यह वक्त तमाशे का नहीं है। आख़िर ढाई महीने से भारत क्या तैयारी कर रहा था कि डॉक्टर और नर्स के पास सुरक्षा के उपकरण तक नहीं हैं? 

एक रिपोर्ट के अनुसार स्वास्थ्य संगठनों के कार्यकर्ता स्वास्थ्य मंत्रालय, कपड़ा मंत्रालय के फैसलों को लेकर परेशान हैं। PPE के उत्पादन को लेकर सरकारी कंपनी HLL को नोडल एजेंसी बनाया गया है। ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वाला है कि HLL के एकाधिकार को खत्म किया जाए। ढाई महीनों में सरकार स्थानीय निर्माताओं को आर्डर कर सकती थी।



Related