परदा है परदा :किस्सा एच.एस. रवैल की लैला मजनूं का


एच.एस. रवैल अपने समय के मशहूर निर्माता-निर्देशक थे। वह मुस्लिम सामाजिक फिल्मों के उस्ताद निर्देशक माने जाते थे।


अजय कुमार शर्मा
मनोरंजन Updated On :

एच.एस. रवैल अपने समय के मशहूर निर्माता-निर्देशक थे। वह मुस्लिम सामाजिक फिल्मों के उस्ताद निर्देशक माने जाते थे। “मेरे महबूब ” (1963) जैसी सुपरहिट फिल्म उन्होंने बनाई थी, परंतु “महबूब की मेहंदी ” (1977) के बाद टिकट खिड़की पर उनका जादू कम होने लगा था। इस बीच उनके दिमाग में विचार आया कि रोमियो और जूलियट और लैला मजनूं को जोड़कर एक फिल्म का निर्माण किया जाए जिसमें मजनू के हाथ में गुलाब के बदले तलवार हो ।

उस समय यह कल्पना बिल्कुल निराली थी कि लोक गाथा में केवल एक प्रेमी के रूप में चित्रित मजनूं, रोमियोनुमा लड़ाई के साथ साथ ढेर सारी तलवारबाजी और युद्ध भी करेगा। मजनूं की भूमिका के लिए उनकी पहली और आखिरी पसंद ऋषि कपूर थे और इसके कई कारण थे।

जहां राजकपूर उनके पड़ोसी थे और उनका बेटा राहुल चिंटू (ऋषि कपूर) का हमउम्र और दोस्त था वहीं वह “मेरा नाम जोकर” में राजकपूर का असिस्टेंट भी था। लैला की भूमिका के लिए एक नए चेहरे को लेने का निर्णय लिया गया और इसके लिए देशव्यापी खोज अभियान चलाया गया।

एक बड़ी रकम इस मुहिम पर खर्च की गई। चंडीगढ़ और अन्य कई बड़े शहरों में पूरे पूरे पेज के विज्ञापन जारी किए गए। लखनऊ और कोलकाता में भी घोषणा की गई कि लैला के लिए एक लड़की की तलाश है जिसका ऑडिशन ऋषि कपूर के साथ होगा। लेकिन सारी कोशिशें बेकार रहीं। अंत में लैला मिली तो पुणे फिल्म इंस्टिट्यूट में अभिनय का कोर्स कर रही रंजीता कौर के रूप में। वह इस भूमिका के लिए बिल्कुल उपयुक्त थीं। इस भूमिका के लिए वजन घटाने में उन्हें काफी समय लगा।

रवैल साहब एक बहुत ही सुलझे हुए निर्देशक थे।शॉट में बारीकी के लिए तो वह लगभग पागल से थे। वह किसी अभिनेता के क्लोजअप के पहले उसकी ड्रेस की जांच करने में करीब 10 मिनट लेते थे। पृष्ठभूमि में यदि ऊंट होते और उनके साथ किसी मुख्य कलाकार का क्लोजअप होता तो वह ऊंट की भी जांच करते। कई बार कलाकार खींजते पर वह टस से मस ना होते।

लैला मजनू के सेट सर्वथा भिन्न थे और इन्हें आर. के स्टूडियो में लगाया गया था।रेगिस्तान की छोटी से छोटी बारीकी का बहुत ध्यान रखा गया था। रेगिस्तान क्योंकि बहुत सारा प्रकाश सोख लेता था इसलिए कैमरामैन को अतिरिक्त प्रकाश की व्यवस्था करनी पड़ती थी। ऊपर से मुंबई की गर्मी और उमस… इतना ही नहीं पूरी कास्ट को रेशम के कपड़े पहनने पड़ते , बिग लगाने पड़ते और फिर इनके परीक्षण के लिए रवैल साहब इतना समय लेते हैं कि सारे लोग बेचैन हो उठते। रवैल साहब की एक और आदत थी की शॉट कितना भी बढ़िया हुआ हो वह एक या दो नहीं कई रीटेक लेते थे…

लैला मजनू एक वर्ष तक शूट की जाती रही और उसकी शूटिंग में 130 दिन लगे। क्योंकि यह एक पीरियड फ़िल्म थी इसलिए खर्चीली भी बहुत थी। कॉस्ट्यूम और भव्य सेट्स के अलावा लैला मजनू की अन्य विशेषताओं में था मदन मोहन का ऐतिहासिक सुमधुर संगीत । इसके सारे गाने बहुत बड़े हिट हुए थे।

फिल्म ने सफलता के झंडे गाड़ दिए, विशेषता उत्तर भारत में। यह वह दौर था जब अमिताभ वके लिए दर्शकों के पागलपन ने पूरे देश को तूफान की तरह अपनी चपेट में लिया हुआ था लेकिन इस तूफान में भी यह फिल्म खड़ी रह गई थी। “बॉबी” के बाद ऋषि कपूर की यह सबसे बड़ी हिट फिल्म थी।

चलते चलते

मजनूं की भूमिका के रेगिस्तान वाले अंश में ऋषि कपूर को उधड़ी हुई चमड़ी, फटे हुए होठ वाला और खून से लथपथ दिखना था । आज इन सब चीजों के लिए फिल्म में विशेष मेकअप कलाकार होते हैं लेकिन उस समय ऐसा कुछ नही था। मजनूं के रूप में अपने अभिनय को जीवंत बनाने के लिए ऋषि कपूर मेकअप का सामान लॉस एंजेल्स से खुद खरीद कर लाए थे। इसीलिए रेगिस्तान में भटकने वाले उनके यह दृश्य फिल्म प्रेमियों को आज तक याद हैं।