इंडियन सन : पंडित रविशंकर की शख्सियत और उनके स्कैंडल को परत दर परत खोलती है ओलिवर क्रास्के की किताब


सितार वादक पंडित रविशंकर अपनी मृत्यु के आठ साल बाद भी रेलेवेंट हैं। आज भी उनके बारे में जितना कुछ लिखा जाये वो शायद कम ही पड़ेगा। बनारस में जन्मे पंडित रविशंकर ने सितार की दुनिया में जो ख्याति पाई वो अब बेंचमार्क के रूप में तब्दील हो चुकी है और हर सितार वादक उनके द्वारा स्थापित ऊंचाइयों को छूने की कोशिश करता है ना कि उसके आगे जाने की।


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सितार वादक पंडित रविशंकर अपनी मृत्यु के आठ साल बाद भी रेलेवेंट हैं। आज भी उनके बारे में जितना कुछ लिखा जाये वो शायद कम ही पड़ेगा। बनारस में जन्मे पंडित रवि शंकर ने सितार की दुनिया में जो ख्याति पाई वो अब बेंचमार्क के रूप में तब्दील हो चुकी है और हर सितार वादक उनके  द्वारा स्थापित ऊंचाइयों को छूने की कोशिश करता है ना कि उसके आगे जाने की। रविशंकर हिंदुस्तानी क्लासिकल म्यूजिक के एक स्तंभ हैं जिनके संगीत के योगदान को विश्व हमेशा याद रखेगा। चाहे वो सत्यजीत रे की अपू ट्रिलजी का संगीत हो या फिर बीटल्स के जार्ज हैरिसन के साथ उनकी जुगलबंदी या फिर 1999 में भारत सरकार का उनका नाम भारत रत्न के लिये मनोनीत करना – ये सभी कुछ रविशंकर के कद्दावर शख्सियत को उभारते हैं। 

रविशंकर का पश्चिमी देशों से इतना गहरा नाता रहा है कि उनके बारे में अधिकतर लेख बाहर के देशों के लोगों ने ही लिखा है। किताबों के मामले में भी कुछ वैसा ही है। भारतीय लेखकों की बनिस्बत पश्चिमी लेखकों ने उनको समझने की ज्यादा कोशिश की है। इसी कड़ी में लेखक ओलिवर क्रास्के की इंडियन सन एक और कोशिश है और मानना पड़ेगा कि उनकी ये कोशिश शानदार है और आपकी रुचि आखिरी पन्ने तक बांध कर रखेगी। इंडियन सन पंडित रविशंकर के हर पहलू को टटोलने की कोशिश करती है। अगर ये किताब उनके हुनर को सलाम करती है तो उनके स्कैंडल के ऊपर भी कई पन्ने समर्पित करती है। इंडियन सन, रविशंकर की एक आथराईज्ड बायोग्राफी है जिसके पीछे छुपा हुआ है सालों का शोध और इसके लेखक की शंकर परिवार के साथ निकटता। क्रास्के की ये किताब उनके बचपन और करियर के शुरुआती दिनों को भी अच्छी तरह से उभार कर पाठकों के सांमने लाती है। अपने भाई उदयशंकर के ट्रुप में जब वो बतौर डांसर परफार्म करते थे या फिर जब उन्होंने सितार की बारीकियां अपने गुरु उस्ताद अलाउद्दीन खान से सीखनी शुरू की या फिर जब वो 60 के दशक में अपने हुनर का परिचय पश्चिमी देशों में दिखाना शुरू किया। इन सभी घटनाओं को बड़े ही विस्तृत ढंग से किताब में वर्णन किया गया है। क्रास्के की कलम की धार को देखकर पता चलता है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति से वो भली भांति परिचित हैं। 

लेकिन ये कुछ ऐसी चीजें है जिनसे पाठक भली भांति परिचित है। अगर उनके जीवन के किसी पहलू से वो ठीक से परिचित नहीं हैं तो वो ये है कि रविशंकर के जीवन में स्कैंडलो की कमी नहीं थी। बहुत कम लोगों को जानकारी होगी की उनके महिला दोस्तों की संख्या 180 के ऊपर की थी। अपने शुरुआती दिनों में अपने भाई के ट्रुप के साथ जब वो यूरोप का दौरा कर रहे थे तो उसी दौरान उनकी वर्जिनिटी भी खत्म हो गई थी। आगे चल कर उन्होने अपने गुरु की बेटी अन्नपूर्णा से शादी की लेकिन उनकी ये शादी टिक नहीं पायी। इस शादी से आजाद होने के लिये रविशंकर इतने उतावले थे कि उन्होंने कई हथकंडे भी अपनाये जिनमें से एक ये भी था कि वो अपनी खुद की पत्नी को किसी गैर मर्द के साथ रंगे हाथों पकड़े। ये अब ओपन सिक्रेट है कि अन्नपूर्णा में भी संगीत का असीम टैलेंट और संभावनाएं थी जो रविशंकर की वजह से दब कर रह गई। रविशंकर का अपने बेटे शुभो के साथ के रिश्ते भी मधुर नहीं थे। उनको इस बात की हमेशा शिकायत रही की उनके बेटे में  सितार बजाने के हुनर नहीं थे और उसकी पत्नी एक विदेशी थी। क्रास्के ने इन सभी पहलुओं को अपनी किताब मे छुआ है। क्रास्के ने किताब में उनकी इस हरकत के पीछे की वजह भी बताई है। उनको अपने बचपन में दो कठिन मौकों से दो चार होना पड़ा था और ये वो मौके थे जब वो यौन शोषण का शिकार हुए थे। 

किताब में उनके लिखे हुये पत्रों का भी जिक्र किया गया है जो उन्होंने अपनी प्रेमिकाओं कमला चक्रवर्ती और मार्लिन सिल्वरस्टोन को लिखे थे। इन पत्रों को पढ़कर रविशंकर का अलग पहलू उजागर होता है – कामुक और बेहद ही चंचल। उनके लिखे हुये पत्र अंग्रेजी में हुआ करते थे लेकिन जब कभी भी उन्हें अपनी अंदर की कामुक इच्छाओ का वर्णन करना होता था तब उनकी भाषा बंगला हुआ करती थी और उनके पत्रों के एक्सक्लमेशन मार्क लिंग के रुप में हुआ करते थे। (सन 1967 से 1981तक कमला और रविशंकर दोनों पति-पत्नी थे, गौरतलब है कि उस दौरान भी रविशंकर ने अपनी पहली पत्नी अन्नपूर्णा को तलाक नहीं दिया था। कमला की पहली शादी मशहूर फिल्म निर्देशक अमिया चक्रवर्ती के साथ 1945 में हुई थी। अमिया ने 50 के दशक में अपने निर्देशन का जौहर दाग, पतिता, सीमा और देख कबीरा रोया जैसी फिल्मों से दिखाया था) 

इंडियन सन, रविशंकर की शख्सियत के साथ पूरा न्याय करती है। रविशंकर के ऊपर इसके पहले कई और किताबें भी आ चुकी हैं लेकिन किताब के लेखक की रविशंकर और उनके परिवार से सालों का परिचय इसको एक नया आयाम देती है। लॉकडाउन में इस किताब का आनंद आप उठा सकते हैं।