क्या सचमुच खतरे में है बॉलीवुड?


बॉलीवुड लंबे समय से कुछ खास गिरोहों के कब्जे में है जिन्होंने मनोरंजन उद्योग को किसी माफिया की तरह अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया है।


संजय तिवारी
मनोरंजन Updated On :

नई दिल्ली/ मुंबई। मुंबई स्थित हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री पर जारी बवाल के बीच पहली बार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने बयान जारी किया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि “बॉलीवुड को बदनाम करने या उसे मुंबई से शिफ्ट करने का कोई षडयंत्र बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”

मुंबई में फिल्म और मल्टीप्लेक्स एसोशिएशन के सदस्यों के साथ हुई मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की बैठक के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से बयान में कहा गया है कि- “मुंबई न केवल देश की वित्तीय राजधानी है बल्कि मनोरंजन की राजधानी भी है। दुनिया भर में बॉलीवुड की फॉलोइंग है। फिल्म इंडस्ट्री बड़ी संख्या में रोजगार पैदा कर रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से बॉलीवुड की छवि खराब करने की कोशिश की गयी है, जो कि गलत है।”

सुशांत सिंह राजपूत की आत्म/हत्या के बाद उपजे बॉलीवुड में विवाद के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का यह बयान महत्वपूर्ण है। लेकिन यह बयान देने में शायद उन्होंने देर कर दी। बॉलीवुड लंबे समय से कुछ खास गिरोहों के कब्जे में है जिन्होंने मनोरंजन उद्योग को किसी माफिया की तरह अपने साम्राज्य का हिस्सा बना लिया है।

इन्हीं गिरोहों के बीच ड्रग्स माफिया का भी डेरा है और कभी इसी गिरोहों के जरिए अंडरवर्ल्ड भी आपरेट करता था। इसका परिणाम ये हुआ कि बॉलीवुड के नाम से मशहूर हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री धीरे धीरे माफिया इंडस्ट्री के रूप में परिवर्तित हो गयी। वरना कुछ दशक पहले तक मुंबई का बॉलीवुड न सिर्फ हिन्दीभाषी दर्शकों का गढ़ होता था बल्कि देश के अन्य भाषा-भाषी लोग भी बॉलिवुड में भाग्य आजमाने आते थे।

लेकिन समय और तकनीकि के साथ तेजी से हुए बदलाव के साथ बॉलीवुड अपने आप को नहीं बदल सका और देखते ही देखते दक्षिण के तेलुगु, तमिल और कन्नड फिल्म इंडस्ट्री बॉलीवुड से आगे निकल गयी। आज भारत में तेलुगु सिनेमा अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्में बना रहा है जो हिन्दी में डब होकर टीवी के जरिए उत्तर भारत तक पहुंच रही है। एसएस राजमौली की फिल्म बाहुबली ने तो सिनेमा जगत में इतिहास ही रच दिया।

बाहुबली पार्ट और टू ने मिलकर तीन हजार करोड़ के लगभग कारोबार किया। राजमौली की इन फिल्मों ने न सिर्फ भारत में बल्कि विदेशों में अच्छा कारोबार किया। पौराणिक मिथकों पर रची गयी बाहुबली ने न सिर्फ कहानी के स्तर पर बल्कि निर्माण और निर्देशन के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानकों को छुआ है।

कभी हिन्दी फिल्मों के मशहूर निर्माता निर्देशक रहे रामगोपाल वर्मा ने अपने आप को तेलुगु सिनेमा से ही जोड़ लिया है और हिन्दी फिल्म उद्योग से अलग हो गये हैं। रामोजी राव की हैदराबाद स्थित फिल्म सिटी आज मुंबई से ज्यादा सुविधा फिल्म निर्माण के लिए मुहैया करा रहा है जबकि मुंबई में कपूर परिवार को अपना पुश्तैनी आरके स्टूडियो बेचना पड़ गया।

एक समय था जब दक्षिण के निर्माता निर्देशक बॉलीवुड में अपना भाग्य आजमाने आते थे। एलवी प्रसाद, अदूर गोपालकृष्णन, मणिरत्नम, के राघवेन्द्र राव, रामगोपाल वर्मा या फिर हाल फिलहाल तक सक्रिय प्रियदर्शन जैसे दर्जनों नाम हैं जिन्होंने बॉलीवुड सिनेमा को समृद्ध किया। दक्षिण के अलावा बंगाल के कलाकारों और निर्देशकों का भी बॉलीवुड सिनेमा के विकास में महान योगदान रहा है।

बिमल रॉय जैसा प्रतिभाशाली निर्देशक क्या आज बॉलीवुड में मिलना संभव है? सत्यजीत रे की इकलौती हिन्दी फिल्म शतरंज के खिलाड़ी हिन्दी फिल्मों के लिए एक मानक की तरह है। गैर हिन्दी भाषी ऐसे सैकड़ों निर्माता, निर्देशक कलाकार हैं जिन्होंने बॉलीवुड को अपना कैरियर बनाया और बॉलीवुड ने भी उन्हें निराश नहीं किया। लेकिन आज के हालात क्या है?

आज के हालात ये हैं कि न सिर्फ दक्षिण के निर्माता निर्देशक दक्षिण की ओर लौट गये हैं बल्कि उत्तर के कलाकार अब दक्षिण में जाकर काम तलाश रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान चर्चा में आये सोनू सूद हों या आशुतोष राणा, सयाजी शिन्दे हो या काजल अग्रवाल। कभी बॉलीवुड के सितारे रहे ये अभिनेता अब सिर्फ तमिल या तेलुगु फिल्मों में ही नजर आते हैं।

इन्हीं फिल्मों के डब वर्जन के जरिए ये कलाकार दोबारा से हिन्दी भाषी इलाकों में पहुंच रहे हैं। जब हालात ऐसे हो गये हों कि कोई उभरता कलाकार या निर्देशक बॉलीवुड में जगह न बना पाये तो क्या सवाल नहीं उठना चाहिए कि बॉलीवुड के भीतर ऐसा क्या चल रहा है कि सिर्फ कुछ परिवार, घराने और गैंग के लोग ही फिल्मों में दिखाई दे रहे हैं?

अगर आज बॉलीवुड पर भाई भतीजावाद का आरोप लग रहा है तो वो इतना निराधार भी नहीं है। जिस खान कपूर गैंग पर बॉलीवुड में भाई भतीजावाद फैलाने का आरोप लगा है उसको अगर तथ्यों के साथ देखें तो आरोप मनगढ़ंत भी नहीं लगता। आखिर क्या कारण है कि बॉलीवुड के कुछ घरों और घरानों से स्टार लांच किये जाते हैं जबकि अभिनय की हसरत दिलों में लिए मुंबई पहुंचने वाले हजारों अनाम लोग गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं? जाहिर है इस सवाल का जवाब उद्धव ठाकरे के पास नहीं होगा। लेकिन इंडस्ट्री से जुड़े अन्य लोग जवाब भी तलाशेंगे और विकल्प भी।

ऐसे में अगर से विकल्प उभरकर सामने आता है कि हिन्दी फिल्म उद्योग किसी हिन्दीभाषी क्षेत्र में होना चाहिए, तो इस पर जरूर गंभीरता से विचार करना चाहिए। आखिर हिन्दी और भोजपुरी फिल्मों के लिए एक विकल्प उपलब्ध हो जाए तो इसमें बुराई क्या है? उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ग्रेटर नोएडा में फिल्म सिटी बसाने के प्रयास को इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए। यह कहना कि कुछ लोग बॉलीवुड को नष्ट करने की साजिश कर रहे हैं, पूरी तरह से गलत है।

आखिर तेलुगु सिनेमा अगर हैदराबाद में नये सिरे से खड़ा न होता को क्या बाहुबली जैसी फिल्म कभी बन पाती? इसलिए यह कहना कि हिन्दी भाषी इलाके में एक और फिल्म इंडस्ट्री विकसित हो जाने से बॉलीवुड सिनेमा खतरे में आ जाएगा, गलत है। बड़े पर्दे के सिनेमा का अगला पड़ाव मोबाइल है जहां वास्तविक सिनेमा एक बार फिर आकार ले रहा है।

नेटफ्लिक्स ने सिनेमा का जो नया रास्ता दिखाया है वह मल्टीप्लेक्स के लिए बड़ा खतरा है। लेकिन दुर्भाग्य से इस खतरे से निपटने के लिए बॉलीवुड के पास कोई हथियार नहीं है। सिनेमा जो नया आयाम हासिल करने जा रहा है उसमें स्वाभाविक तौर पर मुंबई के बॉलीवुड को खतरा है। बॉलीवुड को निपटना ही है तो इस खतरे से निपटे। वरना एक और फिल्म सिटी बस जाने से बॉलीवुड को क्या खतरा हो सकता है?



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